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ईरान-इजराइल संघर्ष: सीमाओं से परे एक युद्ध

1979 की इस्लामी क्रांति, जिसका नेतृत्व आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने किया और जिसने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाया, उसके बाद से ईरान में सर्वोच्च नेता की केंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित हुई।

Published by
सुबोध मिश्रा

अमेरिका और इजराइल बनाम ईरान के वर्तमान टकराव को केवल दो देशों के बीच युद्ध मान लेना वास्तविकता का सरलीकरण होगा। हालिया 12-दिवसीय संघर्ष भी महज़ सैन्य भिड़ंत नहीं था; उसकी जड़ें ईरान के भीतर चल रहे वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष में हैं।

1979 की इस्लामी क्रांति, जिसका नेतृत्व आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने किया और जिसने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाया, उसके बाद से ईरान में सर्वोच्च नेता की केंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित हुई। इस व्यवस्था की रक्षा के लिए बनी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) एक समानांतर सैन्य शक्ति के रूप में उभरी, जो नियमित सेना (आर्तेश) से अलग है।

आंतरिक दरारें: असली युद्धभूमि

हालिया संघर्ष के बाद ईरान में जो विरोध और दमन तेज हुआ, वह अचानक नहीं था। युवा और शिक्षित समाज कठोर धार्मिक नियंत्रण से असंतुष्ट है। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के नेतृत्व में सत्ता संरचना और आम जनता के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन का चुनाव, जिन्होंने कट्टरपंथी सईद जलीली को हराया, यह दर्शाता है कि राजनीतिक विविधता मौजूद है, परंतु अंतिम निर्णय की शक्ति अब भी सर्वोच्च नेता के पास है।

इस्लामी जगत की खामोशी

संघर्ष के दौरान मुस्लिम देशों ने बयान तो दिए, पर सैन्य समर्थन नहीं किया। कारण स्पष्ट है—ईरान और सऊदी अरब के बीच इस्लामी नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा। यमन में हूथी मिलिशिया को ईरान का समर्थन खाड़ी देशों के लिए चिंता का विषय रहा है। सऊदी अरब पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि ईरान परमाणु शक्ति बनता है, तो वह भी उस दिशा में कदम बढ़ाएगा।

परमाणु प्रश्न: असली कारण

ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस पूरे संकट का केंद्र है। इज़राइल के लिए यह अस्तित्व का प्रश्न है, अमेरिका के लिए अप्रसार नीति का मुद्दा, और खाड़ी देशों के लिए शक्ति संतुलन का।

रूस, चीन और वैश्विक समीकरण

रूस और चीन ने चेतावनी तो दी है, पर प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की संभावना कम है। रूस यूक्रेन में उलझा है और चीन आर्थिक हितों के कारण अमेरिका से सीधा टकराव नहीं चाहेगा।

भारत की संतुलित भूमिका

भारत के ईरान, इज़राइल, रूस और अमेरिका सभी से संबंध हैं. इसलिए भारत का रुख संतुलित और व्यावहारिक रहेगा. संभव है कि वह परदे के पीछे मध्यस्थता की भूमिका निभाए।

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