एआई के भविष्य, इनसानों की इस पर निर्भरता एवं एआई के प्रभाव, नौकरियों पर खतरा और रोजगार के नए अवसरों पर दुनियाभर में चर्चा हो रही है। दिल्ली में आयोजित एआई इंपैक्ट समिट-2026 में दुनियाभर के विशेषज्ञों ने कहा कि अगले तीन वर्ष में एआई 1,000 गुना तेजी से हमारी जिंदगी में दखल देगा। इन विषयों पर साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं एआई विशेषज्ञ अमित दुबे के साथ पाञ्चजन्य सहयोगी तृप्ति श्रीवास्तव ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं वार्ता के संपादित अंश-
कहा जा रहा है कि आगामी तीन वर्ष में एआई हमारी जिंदगी में हजार गुना दखल देगा। यह तकनीकी वास्तविकता है या बढ़ा-चढ़ा कर किया जा रहा प्रचार?
दैनिक जीवन में जो लोग थोड़ा बहुत भी एआई का प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें समझ में आ गया है कि खेल बदल गया है। यह तय है कि जिस तरह से चीजें बदल रही हैं, उसमें अगले दो साल में आप हर महीने, हर सप्ताह और हर दिन कुछ नया आश्चर्य देखेंगे। एआई इम्पैक्ट सम्मेलन बहुत प्रभावकारी रहा है। एआई क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बाद भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। लेकिन जिस तरह भारत ने कदम उठाया है, वह सराहनीय है। हमारे पिछले दस वर्ष के डेटा कहते हैं कि अगले दस साल एआई के होंगे और उसके अगले दस साल क्वांटम के होंगे और उसके बाद क्वांटम एआई के। हम क्वांटम में भी उछाल ले चुके होंगे।
नेशनल क्वांटम मिशन में सरकार ने 8000 करोड़ रुपये लगाए हैं। देश का पहला क्वांटम कंप्यूटर आने वाला है। 2022 भारत के जीडीपी में एआई का योगदान 12-13 अरब डाॅलर था। 2025 में यह बढ़कर लगभग 250 अरब डाॅलर हो गया है। यानी तीन साल के अंदर 13 अरब से 250 अरब की छलांग। अभी कहा जा रहा है कि अगले 5 साल में एआई जीडीपी में 10-15 प्रतिशत की हिस्सेदारी करेगा। 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था में 500 अरब डॉलर या उससे अधिक योगदान संभव है। संभावना 1 खरब डॉलर तक की भी है। हालांकि नौकरियों को लेकर चिंता है, लेकिन नई नौकरियां भी पैदा होंगी। खेती, स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यापार में एआई बड़े बदलाव लाएगा। इसके लिए शिक्षा प्रणाली में सुधार और रचनात्मक व मानवीय कौशल पर जोर देना आवश्यक होगा।

क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने से मानव पर निर्भरता कम हो जाएगी? यदि मशीनें मनुष्यों की जगह लेने लगें, तो नाैकरियों पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा?
जब भी कोई नवाचार या तकनीकी क्रांति होती है तो नौकरियां जाती हैं। जैसे कंप्यूटर आया था, तब भी लोग डरे थे या नौकरी गई थी। पर यह बदलाव होता है। एक तरह का काम दूसरे तरह के काम में बदल जाता है। जब मशीनें आईं और औद्योगिक क्रांति हुई, तब भी लोग मशीनों के विरोधी थे। यह सच है कि नौकरियां जाती हैं, लेकिन एक नए तरीके का वातावरण बन जाता है और नए तरीके की नौकरियां पैदा होती हैं। एआई पर जो स्टार्टअप्स आए हैं, वे नए तरीके की नौकरियां पैदा करेंगे। संभवतः शिक्षा प्रणाली में भी मूलभूत परिवर्तन करना पड़े, क्योंकि अभी तक जो शिक्षा मिलती रही है, वह एक तरीके से एआई से प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करती थी। लेकिन अब वह सारा काम एआई कर रहा है। ऐसे में आप एआई को परास्त नहीं कर सकते। इसलिए शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना होगा ताकि तकनीक सिखाई जाए। व्यक्ति को अपनी भूमिका स्वयं निर्धारित करनी होगी, बजाय इसके कि हम एआई से प्रतिस्पर्धा करें।
पिछले 20 वर्ष में संचार क्रांति के कारण हमारे अंदर बहुत से परिवर्तन आए हैं। पहले हम लोग 40-50 फोन नंबर आराम से याद रखते थे। डायरी भी नहीं रखते थे। लेकिन आज लोग स्मार्ट फोन के कारण फोन नंबर याद नहीं रखते। ये सब एक स्किल था, जो अब अप्रासंगिक हो चुका है। यह हमारा एक कौशल था कि हम याद रखते थे। लेकिन जैसे ही कैलकुलेटर का प्रयोग बढ़ा, लोग पहाड़े भूल गए। ये सारी चीजें नैसर्गिक हैं। इससे कोई डरने की जरूरत नहीं है। इन तकनीकों से हमारी कार्यक्षमता बढ़ी है। अब बहुत कुछ
बहुत आसान हो गया है। आपको यह समझना होगा कि शायद, आप ऐसी चीजों के लिए बने ही नहीं कि आप हर जगह मशीनों से प्रतिस्पर्धा करें।
एआई पर निर्भरता कितनी होनी चाहिए? ऐसा न हो कि एआई इनसानों को ही चलाने लग जाए।
एआई पर अत्यधिक निर्भरता गुणवत्ता और स्वतंत्र सोच को कमजोर कर सकती है, इसलिए इसका संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग जरूरी है। हर नई तकनीक की तरह एआई का दुरुपयोग भी हो रहा है, जैसे-डार्क वेब पर चैटजीपीटी से पहले ही फ्रॉड और मलवेयर टूल आ गए थे। डीपफेक और फर्जी खबरें गंभीर खतरा बन चुकी हैं। यह सच्चाई है कि किसी भी नवाचार का पहला प्रयोग अधिकतर नकारात्मक होता है, क्योंकि उसमें लाभ ज्यादा होता है। नकारात्मकता के लिए फंड की कमी नहीं होती। सकारात्मक लोगों को फंड की कमी होती है। यह एआई के साथ भी हो रहा है, आगे भी होगा। हाल में निर्मला सीतारमण का एक कथित वीडियो वायरल हुआ, जबकि सद्गुरु के खिलाफ एआई-जनित झूठी सामग्री चलाई गई। ऐसे अभियान प्रतिष्ठा, वित्तीय हितों और जनविश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं। सख्त नियम, जागरूकता और त्वरित कार्रवाई आवश्यक हैं, लेकिन कानून लागू करना चुनौतीपूर्ण है। एआई कंटेंट पर ‘एआई-जनित’ वाटरमार्क जैसे दिशानिर्देश आए हैं, फिर भी निगरानी और नियंत्रण बड़ी चुनौती बने हुए हैं। भले ही 90 प्रतिशत लोग इस तरह के फर्जीवाड़े को समझ जाएं, लेकिन अपराधियों के लिए 10 प्रतिशत लोगों का भरोसा भी पर्याप्त होता है। इसलिए यही कारण है कि सख्त दिशानिर्देश, जागरूकता और त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी हैं।
आपको क्या लगता है जितनी तेजी से एआई बढ़ रहा है उतनी ही तेजी से कानून बना कर इन पर लगाम लगाया जा सकता है?
हमने कानून बनाने में देर कर दी। जैसे डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन के लिए 2015 से प्रयास चल रहे थे और आज भी वह लागू नहीं हो पाया। ऐसे में हमारा डाटा तो अब चला ही गया। अब कोई कानून बना भी दिया तो जो डाटा गया, वापस नहीं आ सकता। हाल ही में देखा कि हमारे जो पड़ोसी देश संकट में पड़ गए, क्योंकि सोशल मीडिया को नहीं रोक पाए। आपको जानकर हैरानी होगी कि बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां छोटे देशों की बात नहीं सुनतीं। इसलिए कानून को बड़े स्तर पर आक्रामकता के साथ लागू करना होगा। ऐसा न हो कि हमारे हाथ से अवसर निकल जाए।
एआई के खतरे और बदलते कामकाजी माहौल में आम नागरिकों के लिए खतरा सबसे अधिक कहां है? खासकर मीडिया, बैंकिंग, लीगल, आईटी व कॉल सेंटर जैसे क्षेत्रों में भविष्य और बेरोजगारी से बचने के लिए क्या कर सकते हैं?
आप गौर से देखिए, कॉल सेंटर में कर्मचारियों के साथ मशीन जैसा व्यवहार किया जाता है। कॉल सेंटर में लंबे समय तक काम करना कठिन हो गया है। पहले ह्यूमन एजेंट्स मशीन की तरह लगातार कॉल संभालते थे, जिससे मानसिक दबाव बढ़ता था। ग्राहक गालियां देता है, फिर भी उन्हें शांत रहते हुए काम करना पड़ता है। अब ये काम धीरे-धीरे चैटबॉट और एआई सिस्टम्स संभालने लगे हैं, जो इनसानी भावनाओं के साथ जवाब देने में सक्षम हैं। इसलिए ऐसे क्षेत्र के लोगों को एआई के साथ प्रतिस्पर्धा करने की बजाय एआई का स्मार्ट इस्तेमाल करना और नए कौशल सीखना आवश्यक है, ताकि वे अपने भविष्य और बेरोजगारी से सुरक्षित रह सकें।
क्या कड़े कानून बनाने से समस्याएं हल हो जाएंगी?
मेरे विचार से कानून जरूरी है, लेकिन केवल कानून से सारी समस्याएं हल नहीं होंगी। असली बदलाव तब आता है, जब लोग भीतर से जागरूक हों। जब तक लोगों को स्वयं यह महसूस नहीं होगा कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम उनके बच्चों के लिए हानिकारक है, तब तक वास्तविक सुधार नहीं होगा। जैसे हम किसी गलत काम से केवल कानून के डर से नहीं रुकते, बल्कि इसलिए रुकते हैं, क्योंकि हमारी अंतरात्मा हमें रोकती है। यदि शिक्षा व जागरूकता के माध्यम से यह समझ विकसित की जाए कि बच्चों के मानसिक विकास के लिए संतुलित डिजिटल उपयोग जरूरी है, तभी सार्थक बदलाव संभव है।
कितना आसान है एआई सीखना? हर व्यक्ति के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह इसे सीख सके? उसके लिए क्या समाधान हो सकता है?
एआई की खास बात यह है कि आपको अधिक सीखने ही जरूरत ही नहीं पड़ती। आज के समय में एआई सीखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए केवल इंजीनियर होना जरूरी नहीं। 25 साल के युवा से लेकर 70-75 वर्ष के व्यक्ति तक, सही प्रशिक्षण और दृष्टिकोण के साथ कोई भी इस क्षेत्र में अवसर पा सकता है। उदाहरण के लिए, पहले हमारे पास इन्वेस्टिगेशन के लिए सीडीआर या आईपीडीआर एनालिसिस के टूल होते थे, जिनके लिए 6 दिन से 1 महीने की ट्रेनिंग होती थी। हमें कॉल डेटा रिकॉर्ड में ढूंढना पड़ता था कि कौन-कौन कॉल कर रहा था, प्रॉक्सिमिटी, लोकेशन, दिन या रात के कॉल आदि। एआई यह सब सेकंडों में कर देता है। बस आपको सही तरीके से एक्सप्लेन करना होगा कि आप क्या चाहते हैं। चाहे ऐप बनवाना हो, वेबसाइट होस्ट करना हो-एआई यह सब कर देगा।

एआई से शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि सेवाएं सस्ती होंगी या महंगी? जैसे-ओरल कैंसर पहचान एप या किसान-मिट्टी मौसम विश्लेषण एप का आर्थिक असर क्या होगा?
कोई चीज महंगी इसलिए नहीं होती कि वह कम है, बल्कि इसलिए कि उसकी उपलब्धता सीमित कर दी जाती है। एआई से उत्पादन इतना तेज होगा कि कीमतें गिरेंगी और सीधे उत्पादक या किसान लाभ उठाएंगे। यही डेमोक्रेटाइजेशन है। 20-30 साल में खाना, घर, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसी मूल जरूरतें मशीन और एआई से इतनी सहज हो जाएंगी कि अधिकांश मुफ्त हो सकती हैं। शुरुआत में एआई कंटेंट लोकप्रिय होगा, लेकिन धीरे-धीरे लोग इंसानी क्रिएटिविटी की ओर लौटेंगे। जैसा जापान, ऑस्ट्रेलिया और चीन में देखा गया, नाबालिगों के इंटरनेट उपयोग को रेगुलेट करना जरूरी है। भारत में भी कानून होना चाहिए ताकि बच्चों के मस्तिष्क और विकास पर अत्यधिक स्क्रीन टाइम का असर न पड़े।
भारत एआई के क्षेत्र में बाकी देशों के मुकाबले निर्णायक कदम उठा सकता है? क्या भविष्य में भारत विश्व का नेतृत्व कर सकता है?
भारत सफल नेतृत्व के लिए तैयार है, विश्व को इसका अहसास करा दिया है। एआई का नकारात्मक उपयोग हो रहा है, तो उसे रोकने के लिए सभी को साथ आना होगा। अन्यथा इसका लाभ अपराधी उठाएंगे। गाइडलाइन आप अपने देश के लिए बना भी लेंगे, पड़ोसी देश के लिए नहीं। कोई पड़ोस में बैठ कर अपराध करेगा तो आप कैसे रोकेंगे? इसके लिए भारत एक लीड ले रहा है। सौभाग्य से हम एक ऐसी स्थिति में हैं विश्व बिरादरी को भारत पर विश्वास अधिक है। ऐसी परिस्थिति में भारत को नेतृत्व करने के लिए चुना जा सकता है। भारत ने एआई समिट के माध्यम से अपनी क्षमता का संदेश विश्व को दे दिया है। जरूरत बस एआई आधारित नीति, नियम और कानून के साथ एआई और आईटी के लिए अलग से मंत्रालय स्थापित करने की है, ताकि काम सुगमता से किया जा सके।

















