अंबाला । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने कहा कि संघ ने सौ वर्षों की यात्रा में अपनी दशा बदलीहै, दिशा नहीं बदली, उसी के भरोसे हमें समाज का विश्वास प्राप्त हो रहा है।
संघ को खड़ा करने में सौ साल लगे और अनुकूलता तो पिछले 20 वर्षों से लगातार बढ़ रही है, परंतु उससे पहले का पूरा समय उपेक्षाऔर विरोध में बीता। बहुत कठिन परिस्थितियों में स्वयंसेवकों को कार्य को आगे बढ़ाना पड़ा।
पंजाब प्रवास के बाद हरियाणा पहुंचे सरसंघचालक
बता दें कि सरसंघचालक जी पंजाब प्रवास के बाद शुक्रवार को हरियाणा के अंबाला पहुंचे। उनका 28 फरवरी तक हरियाणा का दो दिवसीय प्रवास है। हरियाणा प्रवास के पहले दिन उन्होंने पुलिस डीएवी स्कूल के मैदान में आयोजित ‘द्विनगर तरुण स्वयंसेवक एकत्रीकरण’ में स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया।
इस दौरान मंच पर प्रांत संघचालक प्रताप सिंह, विभाग संघचालक रमाकांत और जिला संघचालक प्रदीप खेड़ा उपस्थित रहे।
संस्कार और अहंकार से बचने का संदेश
इस अवसर पर सरसंघचालक जी ने संघ के संस्कार और अनुकूल वातावरण में उत्पन्न होने वाले अहंकार के भाव से बचने के लिए पौराणिक कथाके माध्यम से समझाया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी मां से अथाह प्रेम करने वाले तीन सगे भाइयों और एक रानी की कहानी भी सुनाई। दोनों प्रसंगों में उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि व्यक्ति अपने कार्य और उद्देश्य को फलीभूत करते समय किन विषयों पर ध्यानकेंद्रित करे, ताकि उसके परिणाम केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी हितकारी हों।
उन्होंने कहा कि संघ नेभी सौ वर्षों की यात्रा में अपनी दशा बदली है, दिशा नहीं बदली उसी के भरोसे हमें समाज का विश्वास प्राप्त हो रहा है।
बढ़ते कार्यक्रमों के बीच सावधानी की आवश्यकता
सरसंघचालक जी ने कहा कि आज संघ के कार्यक्रम बड़े हो रहे हैं, यह सुखद दृश्य है, जो समाज की कृपा और हमारी मेहनत का फल है, लेकिनहमें चिंतन भी करना होगा। अब और अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोग समीक्षा की दृष्टि से संघ को देख रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि सौ वर्षों में हम एक विशिष्ट पद्धति, आचार-विचार और संस्कारों के साथ आगे बढ़े हैं।
इस दौरान क्षेत्र प्रचारक प्रमुख बनवीर जी, क्षेत्र कार्यवाह रोशनलाल, सह क्षेत्र कार्यवाह किस्मत कुमार, हेमराज, अंबाला सह जिलासंघचालक ओंकार सिंह, कृष्ण सिंघल, सीताराम व्यास और सरदार जसबीर सिंह उपस्थित रहे।
















