मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक वाग्देवी की भोजशाला को लेकर लंबे समय से चल रहे सरस्वती मंदिर बनाम कमाल मौला मस्जिद विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की विस्तृत रिपोर्ट ने कई नई जानकारी को प्रकाश में ला दिया है। 98 दिनों तक चले वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद तैयार की गई 2189 पन्नों की रिपोर्ट में मांडू और धार के संग्रहालयों में सुरक्षित रखी गई प्राचीन मूर्तियों को भी साक्ष्य के रूप में शामिल किया गया है।
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद हिंदू पक्ष ने इसे अपने दावे की पुष्टि बताया है, दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष है कि मानने को तैयार नहीं, वह रिपोर्ट पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे पूर्व के सर्वे निष्कर्षों के विपरीत बता रहा है। ऐसे में अब इस बहुचर्चित मामले में अंतिम निर्णय की दिशा में नजरें अदालत पर टिकी हैं।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री का कहना है, “ये रिपोर्ट कोर्ट के आदेश पर आई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने हजारों वर्षों के साक्ष्य बड़ी मेहनत से एकत्र कर अपनी रिपोर्ट में आज प्रमाण के रूप में कि ये हिन्दू मंदिर वाग्देवी का ही है, आज सभी के सामने रख दिए हैं। इस रिपोर्ट से यह भी साफ हो गया है कि इस स्थल से कमाल मौला का कोई लेनादेना नहीं है। हमारी पिटिशन न्यायालय में है। साक्ष्य और प्रमाणों के आधार पर यह तय हो गया है कि धार की भोजशाला वास्तवम में वाग्देवी का मंदिर ही है।”
कोर्ट के निर्देश पर हुआ 98 दिन का सर्वे
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यह सर्वे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के निर्देश पर 22 मार्च 2024 से 27 जून 2024 तक किया था। इसके बाद जुलाई 2024 में विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय को सौंपी गई। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी को हाईकोर्ट को भोजशाला के वास्तविक धार्मिक स्वरूप पर सुनवाई कर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। बीते सोमवार को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने सभी पक्षकारों को निर्देश दिया कि वे अपनी आपत्तियां और दावे लिखित में प्रस्तुत करें। अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 को तय की गई है।
मांडू-धार की मूर्तियां बनीं अहम साक्ष्य
दरअसल इस रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें भोजशाला परिसर से पूर्व में प्राप्त और अब संग्रहालयों में सुरक्षित रखी गई मूर्तियों को भी साक्ष्य के रूप में शामिल किया गया है। जिसमें शामिल हैं, मांडू के छप्पन महल संग्रहालय में संरक्षित नायिका प्रतिमा, धार जिला संग्रहालय में सुरक्षित अर्धनारीश्वर प्रतिमा और धार किले में संग्रहित 11वीं शताब्दी की भगवान कुबेर की प्रतिमा। रिपोर्ट के अनुसार ये तीनों प्रतिमाएं पूर्व में भोजशाला परिसर की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थीं। सर्वे में यह भी उल्लेखित है कि परिसर के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षित स्थापत्य खंड, शिलालेख और अन्य अवशेष हिंदू पक्ष के दावे को बल देते हैं।
एएसआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि वैज्ञानिक जांच, उत्खनन, स्थापत्य अवशेषों, शिलालेखों, कला और मूर्तियों के विश्लेषण के आधार पर वर्तमान कमाल मौला मस्जिद का निर्माण प्राचीन मंदिरों के अवशेषों का उपयोग करके किया गया था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मौजूदा संरचना का निर्माण बाद की शताब्दियों में किया गया और इसमें समरूपता, डिजाइन या एकरूपता पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के प्रदेश संयोजक आशीष जनक कहते हैं, “वास्तव में इस एएसआई रिपोर्ट से दूध का दूध पानी का पानी हो गया है। पूरी हकीकत सभी के सामने आ चुकी है। वहां अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमांए मिली हैं जो साफ बता रही हैं कि ये हिन्दू मंदिर है। हम निरंतर सफलता की ओर बढ़ रहे हैं। साक्ष्य स्वयं प्रमाण दे रहे हैं। पूर्व में किस तरह से साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश हुई हैं, यह भी इस रिपोर्ट से सभी के सामने आ चुका है। इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है। अंतत: जीत हमारी ही होगी और हमारी वाग्देवी पुन: प्रतिष्ठित होंगी। ”
परमार वंश और राजा भोज का संदर्भ
सर्वे के दौरान एएसआई को कुल 94 मूर्तियां और मूर्तिकला के टुकड़े प्राप्त हुए। इनमें से कई मूर्तियां खंडित अवस्था में थीं या उन्हें छेनी अथवा धारदार हथियार से काटकर विकृत किया गया था। मौजूदा ढांचे में प्रयुक्त स्तंभों, बीमों और खिड़कियों पर चार भुजाओं वाले देवताओं की आकृतियां उकेरी गई हैं। इनमें गणेश, ब्रह्मा अपनी पत्नियों सहित, नरसिंह, भैरव, विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियां, मानव एवं पशु रूपांकन शामिल हैं। पशु आकृतियों में शेर, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, सांप, कछुआ, हंस और अन्य पक्षियों के चित्रण का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। इसके साथ ही पौराणिक रूपांकनों में कीर्तिमुख और व्याल जैसी मिश्रित आकृतियों का भी जिक्र है।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के प्रदेश उपाध्यक्ष और याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने कहा कि “रिपोर्ट से यह सिद्ध होता है कि पूरी संरचना परमार वंश से संबंधित है और इसका निर्माण राजा भोज और उनके पूर्वजों ने कराया था।” उनके अनुसार यह संरचना लगभग 950 से 1000 वर्ष पुरानी है। साथ ही उन्होंने बताया कि 98 दिन तक किए गए वैज्ञानिक सर्वे की कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में मांडू के छप्पन महल संग्रहालय में रखी नायिका और धार के जिला संग्रहालय में सुरक्षित अर्धनारीश्वर के साथ ही धार किला में संग्रहित 11 वीं शताब्दी की भगवान कुबेर की मूर्तियों को भी भोजशाला में मंदिर होने के साक्ष्य के रूप में शामिल किया गया है। ये तीनों मूर्तियां पूर्व में भोजशाला परिसर की खोदाई के दौरान मिली थीं।
भोज उत्सव समिति के संयोजक अशोक जैन का इस संबंध में कहना रहा कि उनकी याचिका का उद्देश्य पहले दिन से ही स्पष्ट रहा है, यदि यह मस्जिद है तो मुस्लिम समुदाय को सौंप दी जाए और यदि मंदिर है तो हिंदू समुदाय को दिया जाए। उन्होंने दावा किया कि रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि मूल संरचना मंदिर की है और बाद में उसके अवशेषों का उपयोग कर अन्य निर्माण किया गया। इससे साफ है कि ये हिन्दू मंदिर हमारी आराध्या ज्ञान की वाग्देवी का है।
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एएसआई टीम और तकनीकी प्रक्रिया
उल्लेखित है कि करीब 2000 से अधिक पृष्ठों में तैयार इस रिपोर्ट को एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक आलोक त्रिपाठी के नेतृत्व में तैयार किया गया है। टीम में जुल्फिकार अली, भुवन विक्रम, गौतमी भट्टाचार्य, मनोज कुमार कुर्मी, इज़हार आलम हाशमी, आफताब हुसैन, शंभूनाथ यादव और नीरज कुमार मिश्रा सहित विशेषज्ञ शामिल थे। सर्वे के दौरान नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग कर उत्खनन, सामग्री विश्लेषण और संरचनात्मक अध्ययन किया गया। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि यह स्थल देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर हो सकता है।
धार में जश्न
हाईकोर्ट में सुनवाई के बाद धार में हिंदू संगठनों ने आतिशबाजी कर खुशी जाहिर की। भोज उत्सव समिति के पदाधिकारियों ने इसे हिंदू समाज की ऐतिहासिक विजय बताया है। अब सभी पक्षों को अपनी आपत्तियां और सुझाव न्यायालय में प्रस्तुत करने हैं। 16 मार्च 2026 को होने वाली सुनवाई में एएसआई रिपोर्ट के प्रत्येक बिंदु पर विस्तृत बहस होने की संभावना है।

















