ऑस्ट्रेलिया के इस्लामिक स्कूलों में लड़कियों के पीरियड्स की निगरानी: निजता का घोर उल्लंघन
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ऑस्ट्रेलिया के इस्लामिक स्कूलों में लड़कियों के पीरियड्स की निगरानी: निजता का घोर उल्लंघन

ऑस्ट्रेलिया में मुस्लिम स्कूलों में लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान अलग कमरे में भेजा जाता है और रिकॉर्ड रखे जाते हैं। छात्राओं के आरोप: शर्मिंदगी और भेदभाव। क्या यह बॉडी ऑटोनॉमी का उल्लंघन है?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Feb 27, 2026, 10:51 am IST
in विश्व
Austrelia Islamic School girl

प्रतीकात्मक तस्वीर

क्या वर्ष 2026 में किसी भी स्कूल से यह कल्पना की जा सकती है कि वह लड़कियों के मासिक चक्र की नियमित निगरानी करेगा और वह मासिक वाली लड़कियों के साथ सही व्यवहार नहीं करेगा? यह किसी की कल्पना में आ ही नहीं सकता है, परंतु कथित रूप से विकसित कहे जाने वाले ऑस्ट्रेलिया में यह हो रहा है और यह एक इस्लामिक स्कूल में हो रहा है।

onenation.org.au के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया के एक इस्लामिक स्कूल में उन लड़कियों को अलग कमरे में भेज दिया जाता है, जिनके मासिक आए हुए होते हैं और उन्हें नमाज पढ़ने वाले कमरे में नहीं आने दिया जाता है। news.com के अनुसार, विक्टोरिया में कुछ इस्लामिक स्कूल्स में यह बताने के लिए बाध्य हैं कि उनके मासिक अर्थात पीरियड्स आए हुए हैं और कई कॉलेज ऐसे हैं, जो छात्राओं के मासिक चक्र पर निगरानी रख रहे हैं।

मुस्लिम छात्राओं के गंभीर आरोप

मुस्लिम स्कूल्स की छात्राओं ने कई प्रकार की अजीब रिवाजों का आरोप लगाया है। उनके अनुसार मासिक वाली लड़कियों को नमाज की जगह “पीरियड” या “रैग” कमरों में भेजा जाता है और टीचर्स यह रेकॉर्ड्स रखते हैं कि उनके मासिक को कितना समय हो गया है। अर्थात पहला दिन है, दूसरा दिन या फिर कौन सा दिन है।

सोशल मीडिया पर इसे लेकर काफी हंगामा मचा हुआ है, हालांकि इस मामले को लेकर इलिम कॉलेज की चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव, आयनुर सिमसिरेल ने कन्फ़र्म किया कि पीरियड्स के लिए नमाज़ से छुट्टी मिलने पर लड़कियों को गर्ल्स रूम नाम की एक “सुपरवाइज़्ड जगह” में ले जाया जाता था। “इस्लामिक रीति-रिवाज़ में यह अच्छी तरह से माना जाता है कि पीरियड्स वाली महिलाओं को बाहर रखा जाए”

लड़कियों से भेदभाव

लड़कियों का कहना है कि यह बहुत शर्मनाक है कि उन्हें हर महीने इस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है और इसे उन्होनें निजता का उल्लंघन बताया है। यह घटना इसलिए और भी शर्मनाक है क्योंकि यह लड़कियों की निजता का उल्लंघन तो करती ही है, मगर साथ ही यह लड़की की बॉडी ऑटोनॉमी अर्थात देह की स्वायत्ता का भी उल्लंघन है। किसी भी इंसान का शरीर उसका अपना होता है, और स्कूल या कोई भी संस्था उस पर किसी भी तरह की निगरानी नहीं कर सकती है, फिर चाहे वह मजहब के आधार पर ही क्यों न हो। यह किसी भी तरह से मजहबी जरूरत नहीं हो सकती है क्योंकि इससे लड़की को पूरे कॉलेज के सामने एक असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसमें लड़कियों की सहमति कितनी ली जाती है, यह भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यदि बिना सहमति के किसी भी तरह की निगरानी उसकी एक प्रकार से जासूसी हो जाती है।

लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर

लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है। वे अपने शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया के प्रति शर्मिंदगी का अनुभव करने लगती हैं और उन्हें जब यह लगता है कि एक प्रक्रिया के कारण उन्हें समाज और परिवार में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है तो वे अपने ही शरीर से नफरत करने लगती हैं।

one nation की नेता Pauline Hanson ने एक्स पर पोस्ट लिखा और कई और गंभीर आरोप लगाए हैं।

As reported yesterday, Islamic schools are excluding girls who are menstruating. Appallingly, young students have been forced to disclose their periods to teachers who keep records of their menstrual cycles and send them to so called “period rooms”.

This is 2026. Treating young… pic.twitter.com/huRQ9GqJcQ

— Pauline Hanson 🇦🇺 (@PaulineHansonOz) February 26, 2026

लड़कियों पर कन्वर्जन का दबाव

उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि छात्राओं पर कई और तरह के दबावों के भी आरोप हैं। उन्हें अपने मासिक चक्र के क्रम को तो बताने के लिए बाध्य किया ही जाता है, मगर साथ ही इन विशेष कमरों में धर्म बदलने वाले वीडियो दिखाए जाते हैं। पौलीन का कहना है कि 2026 के ऑस्ट्रेलिया में इस प्रकार की घटनाएं अक्षम्य हैं और इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि सोशल मीडिया पर लोग यह भी कह रहे हैं कि ऑस्ट्रेलिया में जितने भी इस्लामिक स्कूल्स भी हैं, उन्हें सरकार ही पैसा दे रही है।

लोग कह रहे हैं कि किसी भी आधुनिक देश में ऐसा किसी भी लड़की के साथ नहीं होना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया में लोग अब बढ़ती हुई इस्लामिक कट्टरता पर आवाज उठा रहे हैं। पश्चिमी सिडनी का काउन्सलर भी मुस्लिम है और अहमद आउफ ने 26 जनवरी को मनाए जाने वाले ऑस्ट्रेलिया डे के विषय में यह कहा था कि इसे नहीं मनाया जाना चाहिए क्योंकि यह एक “हालकॉस्ट/holocaust” का आरंभ था और चूंकि यह ऐतिहासिक रूप से गलत है, इसलिए इस दिन को नहीं मनाया जाना चाहिए।

इतना ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया से भी लगातार शरणार्थियों द्वारा श्वेत लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले सामने आते रहे हैं और लोग विरोध भी कर रहे हैं, परंतु विरोध करने वालों को दक्षिणपंथी और असहिष्णु कहकर नकार दिया जाता है। पौलीन की इस पोस्ट पर एक यूजर ने एक और चौंकाने वाली बात की है। एक यूजर ने लिखा कि “सिर्फ़ इतना ही नहीं हो रहा है। माता-पिता, खासकर माताएं अपनी बेटियों को पीरियड्स रोकने के लिए दवा दे रही हैं। पीरियड्स या 15 साल की उम्र में लड़कियों के लिए पर्दा करना ज़रूरी हो जाता है, जिसे इस्लाम में ज़िम्मेदारी की उम्र माना जाता है।“ लोग प्रश्न कर रहे हैं कि तुष्टीकरण के लिए बेटियों की निजता को दांव पर लगाना कितना उचित है?

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