प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल की ऐतिहासिक दूसरी यात्रा को केवल आज की धार्मिक या सामयिक भू-राजनीतिक दृष्टि से देखना बौद्धिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा। राष्ट्रों के संबंध केवल धर्म से संचालित नहीं होते; वे सभ्यतागत स्मृति, रणनीतिक आवश्यकता, आर्थिक हित और राष्ट्रीय सुरक्षा के जटिल संतुलन पर आधारित होते हैं।
प्राचीन सभ्यताओं का राजनीतिक पुनरुत्थान
भारत और इजरायल केवल आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं हैं; वे प्राचीन सभ्यताओं के राजनीतिक पुनरुत्थान का प्रतीक हैं। हिंदू धर्म की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप से परे अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, कंबोडिया और थाईलैंड तक फैली रही हैं। इसी प्रकार यहूदी धर्म की ऐतिहासिक उपस्थिति पश्चिम एशिया के अनेक क्षेत्रों-आज के इराक, यमन, सऊदी अरब आदि-में विद्यमान थी।
सातवीं शताब्दी और यहूदी समुदायों का इतिहास
सातवीं शताब्दी में जब इस्लाम का उदय हुआ, तब अरब प्रायद्वीप में विशेषकर मदीना में अनेक यहूदी जनजातियां रहती थीं। बाद के राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप अनेक यहूदी समुदाय विस्थापित हुए और अंततः यरूशलम तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में संगठित हुए, जो आज के इजरायल का केंद्र है। यह ऐतिहासिक तथ्य उस धारणा को चुनौती देता है कि यहूदी केवल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप से आकर बसे “बाहरी” समुदाय थे। इजरायल राज्य की स्थापना 1948 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और होलोकॉस्ट के पश्चात वैश्विक परिस्थितियों के बीच हुई, किंतु यहूदी सभ्यता की जड़ें उससे कहीं अधिक प्राचीन हैं।
हिंदू समुदाय का ऐतिहासिक विस्तार
इसी प्रकार हिंदू समुदाय कभी वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के क्षेत्रों में व्यापक रूप से उपस्थित थे। समय के साथ राजनीतिक और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों ने उस परिदृश्य को बदल दिया। इतिहास यह सिखाता है कि सभ्यताएं स्थिर नहीं रहतीं; वे उत्थान, पतन और पुनरुत्थान के चक्र से गुजरती हैं। भारत और इजरायल दोनों को प्राचीन बहुसंख्यक सभ्यताओं के आधुनिक राजनीतिक रूप के रूप में देखा जा सकता है।
धार्मिक संरचनात्मक समानताएं
दोनों धर्मों में कुछ संरचनात्मक समानताएं भी हैं। दोनों ही धर्म प्राचीन, गैर-प्रचारवादी (non-proselytizing) परंपराएं हैं और पवित्र भू-भाग से गहराई से जुड़े हैं। दोनों में पारिवारिक संस्था, शिक्षा, आचार-व्यवहार, आहार संबंधी नियम और धार्मिक अनुशासन को महत्व दिया जाता है। हिंदू दर्शन का ‘कर्म’ सिद्धांत और यहूदी परंपरा का ‘मिद्दा केनेगेद मिद्दा’ (जैसा कर्म वैसा फल) नैतिक उत्तरदायित्व की समान अवधारणा को दर्शाते हैं।
रणनीतिक और आर्थिक हितों पर आधारित संबंध
किन्तु केवल धार्मिक समानताएं किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति निर्धारित नहीं करतीं। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संबंधों का निर्धारण रणनीतिक और आर्थिक हितों के आधार पर होता है। भारत-इजरायल संबंध रक्षा सहयोग, कृषि प्रौद्योगिकी, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और नवाचार के क्षेत्र में व्यावहारिक साझेदारी पर आधारित हैं। इजरायल भारत के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक है, जबकि भारत एशिया में इजरायल का एक महत्वपूर्ण आर्थिक और कूटनीतिक साझेदार है।
अरब देशों के साथ संतुलित संबंध
महत्वपूर्ण बात यह है कि इजरायल के साथ संबंध भारत के अरब या मुस्लिम-बहुल देशों के साथ संबंधों के विरोध में नहीं हैं। भारत के संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर जैसे देशों के साथ ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में गहरे संबंध हैं। इसी प्रकार कई मुस्लिम-बहुल देशों ने भी अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के आधार पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आधुनिक कूटनीति वैचारिक आग्रहों की बजाय व्यावहारिक हितों पर आधारित होती है।
रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित विदेश नीति
अतः भारत-इजरायल संबंधों को किसी “धार्मिक गठबंधन” के रूप में चित्रित करना विश्लेषणात्मक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है- जहां वह अमेरिका, रूस, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों सभी के साथ संतुलित संबंध रखता है।
इतिहास से सह-अस्तित्व का संदेश
इतिहास का स्पष्ट संदेश है कि किसी समुदाय की ऐतिहासिक उपस्थिति को नकारना स्थिरता नहीं लाता। स्थायी शांति और राष्ट्रीय आत्मविश्वास तभी संभव है जब हम इतिहास की जटिलताओं को स्वीकार करते हुए पारस्परिक सम्मान और रणनीतिक स्पष्टता के साथ सह-अस्तित्व की दिशा में आगे बढ़ें।
















