वन्दे मातरम् : राष्ट्रीय एकता का अमर मंत्र
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वन्दे मातरम् : राष्ट्रीय एकता का अमर मंत्र

‘वन्दे मातरम्’ केवल स्वतंत्रता आंदोलन का नारा नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय एकात्मता का प्रतीक है। यह गीत देशभर में जागरूकता और एकता फैलाने वाला महामंत्र बना, जिसने प्रजातांत्रिक, पंथनिरपेक्ष और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत माता की साकार पहचान स्थापित की

Written byइन्दुशेखर तत्पुरुषइन्दुशेखर तत्पुरुष
Feb 26, 2026, 08:20 am IST
in विश्लेषण
अवनीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा बनाई गई भारत माता की पेंटिंग

अवनीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा बनाई गई भारत माता की पेंटिंग

वन्दे मातरम् का महत्व केवल इसलिए नहीं कि यह स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे चर्चित नारा बन गया और संपूर्ण देश में स्वतंत्रता सेनानी इसे मंत्र की तरह जपते थे। वह तो था ही, पर इससे कहीं बड़ा कारण यह था कि आधुनिक युग में भारत की राष्ट्रीय एकात्मता का सूत्र पहली बार इसी ने गढ़ा। हजारों वर्ष के इतिहास में किसी एक गीत, संदेश या उद्घोष ने पूरे देश में ऐसी एकता की लहर पैदा नहीं की, जैसी वन्दे मातरम् ने की। यह असाधारण ऐतिहासिक घटना थी। इसकी गहन विवेचना के बिना हम इसका पूरा महत्व नहीं समझ सकते। भारत की पराधीनता का एक हजार वर्ष का कालखंड राष्ट्रीय एकता के विखंडन का भी काल था। यद्यपि यह एकात्मता राजनैतिक स्तर पर ही खंडित हुई थी। धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक दृष्टि से भारत कभी बिखरा नहीं, तथापि राजनैतिक स्तर पर हुए इस विखंडन के घोर दुष्परिणाम देश की जनता ने भोगे। सबसे बड़ी क्षति यह हुई कि एक प्रदेश के लोग दूसरे के सुख-दुख से उदासीन बने रहे। एक राज्य में मंदिर तोड़े जाते रहे, तो दूसरा उत्सव मनाता रहा।

एक राज्य आतताइयों द्वारा रौंदा जाता, तो दूसरा तीर्थयात्रा करता। एक राजा मुगल दरबार में हाजिरी लगाता, तो दूसरा युद्धभूमि में जीवन बिताता और तीसरा इन सब से अनभिज्ञ जनता से कर वसूलता रहा। इस काल में चाणक्य-चंद्रगुप्त जैसा कोई राजनैतिक व्यक्तित्व या महानायक नजर नहीं आया, जो पूरे देश को एकसूत्र बांध सके। देश की एकता केवल धार्मिक-सांस्कृतिक ताने-बाने पर टिकी रही। भारत इसी कारण बचा, क्योंकि यह चिरपुरातन सांस्कृतिक राष्ट्र है। आधुनिक पश्चिमी राजनैतिक राष्ट्रों की तरह होता तो कब का नष्ट हो जाता। हमारी खोई राजनैतिक एकता पहली बार 20वीं सदी के आरंभ में प्रकट होती है और इसका आधार बनता है वन्दे मातरम्।

बंग भंग में महामंत्र

1905 में अंग्रेजों ने केवल बंगाल प्रांत को ही खंडित किया, किंतु वेदना समूचे भारत ने महसूस की। पूरे देश में उबाल आ गया और गांव-गांव में ‘वन्दे मातरम्’ का जयघोष गूंजने लगा। यह नारा नहीं, महामंत्र बन गया। कलकत्ता से सैकड़ों कोस दूर दक्षिण के मद्रास तक, युवा तमिल क्रांतिकारी कवि सुब्रह्मण्यम भारती इसकी डोर से खिंचे हुए कलकत्ता पहुंचे, भगिनी निवेदिता के चरणों में माथा टेका और गीत का तमिल अनुवाद कर मद्रास के हर बच्चे के कंठ में उतार दिया। पंजाब के लोकनायक लाला लाजपत राय गरजे, ‘जब तक जीभ है, वन्दे मातरम् कहता रहूंगा।’ छोटे-छोटे विद्यार्थी स्कूलों में इसका घोष लगाते, तो ब्रिटिश सरकार इसे अपराध मानकर पीछे पड़ जाती। देश में नया परिदृश्य उभर रहा था। प्रश्न यह है- एक नारे से ऐसा जादू कैसे संभव हुआ? यह जानने के लिए ‘वन्दे मातरम्’ की पृष्ठभूमि जाननी होगी। उन राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन करना होगा, जिनमें बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इस अमर गीत की रचना की।

सुविदित है कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इस बांग्ला-संस्कृत मिश्रित गीत की रचना 9 नवंबर, 1875 को की, जो बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) का अंग बना। ‘आनंदमठ’ लिखकर उन्होंने वास्तव में भारत माता की साकार मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की। इस बीजतत्त्व को न समझे तो ‘वन्दे मातरम्’ का भावप्रवाह ग्रहण नहीं किया जा सकता। यह उपन्यास लगभग 120 वर्ष पूर्व बंगाल के संन्यासी विद्रोह पर आधारित है, जहां ब्रह्मचारी संन्यासी भारत माता की पूजा करते हैं। इस प्रकार ‘आनंदमठ’ आधुनिक पुराण की भांति भारत को माता रूप में जनमानस में प्रतिष्ठित करता है। वस्तुतः ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ की वैदिक अवधारणा आधुनिक काल में अंग्रेजों को चुनौती देते हुए भारत माता के स्वरूप में अवतरित हुई और इसके मंत्रद्रष्टा बने कविवर बंकिमचंद्र। बंगाल में पूर्व से ही राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले गीतों की परंपरा चल रही थी, जो अंग्रेजी दमन और ‘गॉड सेव द किंग’ (या गॉड सेव द क्वीन) का प्रत्युत्तर थी। भारतभक्ति का यह लोकसंस्कार पराधीन मन को भाया और भारत माता देश भर में वंदनीय हो गई।

राष्ट्रीय चेतना का प्रथम मंच

‘वन्दे मातरम्’ की रचना प्रक्रिया समझने के लिए बंगाल के ‘हिंदू मेला’ की पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। 1867 में चैत्र संक्रांति पर प्रारंभ यह मेला सामान्य उत्सव न रहकर राष्ट्रीय भावना और स्वदेशी चेतना के जागरण का सांस्कृतिक मंच बन गया। इसमें गीत-संगीत, नाटक, कला प्रदर्शन, खेलकूद, कुश्ती के साथ देशभक्ति कविता पाठ और व्याख्यान होते थे। यहां ‘हिंदू’ शब्द धार्मिक न होकर सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक था। ‘नेशनल मित्र’ नाम से विख्यात बंगाली लेखक-कवि नबगोपाल मित्र द्वारा शुरू किए गए हिंदू मेले को राजनारायण बसु, मनोमोहन बसु, गणेन्द्रनाथ ठाकुर, देवेंद्रनाथ ठाकुर आदि प्रबुद्धजनों का सहयोग मिला। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर ने मेले के अवसर पर देशभक्ति गीत रचा, ‘मिले सबे भारत संतान, एकतान गाहो गान।’

इस ओजपूर्ण गीत में कवि ने भारत माता का जयगान करते हुए इसकी संतानों को महान परंपराओं का स्मरण कराया और एकता का आह्वान किया, जिससे भारत माता का मुख उज्ज्वल हो। इसी तरह, कवि गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने ‘हिंदू मेला’ के लिए बांग्ला गीत लिखा, ‘लज्जय भारत-यश’, जो विदेशियों द्वारा भारत माता की लूट की पीड़ा व्यक्त करता है। ऐसे गीतों, कविताओं और व्याख्यानों से यह मेला भारतीयों में आत्मगौरव जगाता, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध साहस भरता तथा राष्ट्रीयता की भावना प्रज्वलित करता। इसे प्राचीन हिंदू राष्ट्रीयता के पुनर्जागरण का प्रथम प्रयास माना जा सकता है। इसने कालांतर में वीर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदुत्व चिंतन का मार्ग प्रशस्त किया। ‘वन्दे मातरम्’ इसी पृष्ठभूमि का गीत है। ‘आनंदमठ’ के कलेवर में ‘वन्दे मातरम्’ इस तरह विन्यसित हो गया मानो इसके लिए ही उपन्यास रचा गया हो। जैसे पहले से निर्मित कोई दिव्य प्रतिमा भव्य मंदिर निर्माण की बाट जोहती हुई, संदूक में लिपटी धरी हो और वास्तु सम्मत मंदिर निर्माण हो जाने पर जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा की गई हो।

शिखर से विखंडन तक

दिव्य शक्ति से यह गीत शीघ्र ही देश की धड़कन बन गया। 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे स्वरबद्ध कर गाया। ‘वन्दे मातरम्’ की शक्ति का वास्तविक प्रमाण बंगभंग आंदोलन है। 1905 का बंगाल विभाजन भारत-विभाजन का लघुरूप था। 1947 के मुकाबले तब राष्ट्रीय जागरण सीमित था और ब्रिटिश शासन अधिक शक्तिशाली, किंतु बंग विभाजन के विरोध में उठे देशव्यापी तूफान ने अंग्रेजों को झुकाया और उन्हें विभाजन रद्द करना पड़ा। इस देशव्यापी संघर्ष का आधार ‘वन्दे मातरम्’ ही था। भारत के बाहर भी इसके प्रति देशभक्त भारतीयों के मन में अपार श्रद्धा थी।

मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में भारत का जो प्रथम ध्वज फहराया, उस पर ‘वन्दे मातरम्’ अंकित था। देश का दुर्भाग्य रहा कि एक सांप्रदायिक दल ने इस गीत में हिंदू देवी-देवताओं की वंदना को आधार बनाकर इसका बहिष्कार कर दिया। इससे भी लज्जास्पद बात यह कि कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं ने भी मुस्लिम लीग की आपत्तियों को शिरोधार्य करते हुए सांप्रदायिक तुष्टिकरण के लिए गीत को खंडित कर दिया। विडंबना देखिए कि भारत-विभाजन की मांग करने वाली लीग ने ही ‘वन्दे मातरम्’ के विखंडन की मांग रखी और जिन्होंने इसे स्वीकार किया उन्हीं नेताओं ने आगे चलकर भारत-विभाजन को भी स्वीकार कर लिया।

1909 के अमृतसर मुस्लिम लीग अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने इसे ‘सांप्रदायिक नारा’ बताकर विरोध किया। 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन की घटना को कौन भूल सकता है? मौलाना मुहम्मद अली अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे थे। प्रख्यात संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने जैसे ही ‘वन्दे मातरम्’ गाना शुरू किया, मुहम्मद अली ने यह कहकर विरोध किया कि यह मुस्लिम भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। किंतु पलुस्कर दृढ़ रहे और पूरा गीत गाया। उन्होंने मौलाना से कहा, ‘यह राष्ट्रीय मंच है, मस्जिद नहीं।’ इसके बाद मौलाना मंच छोड़कर चले गए।

अंतत: मुस्लिम नेताओं के घोर विरोध और कांग्रेसी नेताओं की तुष्टिकरण नीति के कारण 1937 के फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन में गीत को स्थायी रूप से खंडित कर दिया गया। अधिवेशन में इसके केवल आरंभिक दो छंद स्वीकार किए गए, शेष चार मुस्लिम आपत्तियों के कारण हटा दिए गए। देश-विभाजन तो 1947 में हुआ, किंतु इसका पूर्वरूप 10 वर्ष पूर्व ही प्रकट हो गया, जब ‘वन्दे मातरम्’ का विभाजन हुआ था। मंत्र को खंडित कर हम देवता को नहीं बचा सकते थे। वास्तविकता यह है कि ‘वन्दे मातरम्’ में जिन हिंदू प्रतीकों और देवियों का उल्लेख है, वे सृष्टि के सुख-समृद्धि और मंगल की देवियां हैं।

गीत के हिंदू प्रतीक और अवधारणा मूलतः सर्वपंथ-सम्मान करने वाले हैं। हिंदू अवधारणा प्रजातांत्रिक और सेकुलर चरित्र की है। ‘आनंदमठ’ इसका उज्ज्वल साक्ष्य है। आनंदमठ’ का एक प्रसंग है। संतान सेनानियों ने अंग्रेज व मुस्लिम सेनाओं को परास्त कर दिया। उनकी कोठियों पर संन्यासियों का कब्जा हो गया। गुरु सत्यानंद शिष्यों से कहते हैं, ‘‘इस समय यह समूचा प्रदेश हमारे अधिकार में आ गया है। अब यहां हमारा कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। अत: इस वीर भूमि में तुम लोग संतान-राज्य प्रतिष्ठित करो। प्रजा से कर वसूल करो और सैन्य संग्रह करो। ‘हिंदुओं का राज्य हो गया’ सुनकर बहुतेरी संतान-सैन्य तुम्हारे झंडे के नीचे आ जाएगी।’’

इस पर उनके विजेता शिष्य जीवानंद बोले, ‘‘महाराजाधिराज! यदि आज्ञा हो तो इसी जंगल में आपका सिंहासन स्थापित कर सकते हैं।’’ यह सुनकर सत्यानंद कुपित हो गए। बोले-‘‘क्या कहा? क्या मुझे केवल कच्चा घड़ा समझ लिया है? हम राजा नहीं, संन्यासी हैं। इस प्रदेश के राजा स्वयं बैकुण्ठनाथ हैं, जहां प्रजातंत्र-राज्य स्थापित होगा। नगर अधिकारी के बाद तुम्हीं लोग कार्यकर्ता होगे। मैं तो ब्रह्मचर्य-शक्ति के अतिरिक्त कुछ स्वीकार न करूंगा। अब तुम लोग अपने-अपने काम में लगो।’’

गुरुदेव के वचनों में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं। पहला, हिंदू राज्य स्थापित हो गया। दूसरा, हिंदुओं के राज्य में गुरु या कोई भी योद्धा शासक नहीं, रक्षक मात्र है। शासक तो प्रभु हैं। तीसरा, प्रजातंत्र राज्य स्थापित होगा और वास्तविक कार्यकर्ता जनता होगी। इसका समेकित तात्पर्य यही है कि हिंदू राज्य की अवधारणा मूलतः प्रजातांत्रिक और भेदभाव-रहित है। विजेता स्वयं को ईश्वर प्रतिनिधि मानकर लोकतांत्रिक प्रणाली को ही स्वीकार करता है। 1882 में बंकिमचंद्र चटर्जी जिस हिंदू राज्य की स्थापना का स्वप्न देखते हैं, वह पूर्णतः लोकतांत्रिक है। यह घटना स्वतंत्रता प्राप्ति से 65 वर्ष पूर्व की है।

Topics: सांस्कृतिक राष्ट्रबंग-भंगहिंदू मेलाभारत मातास्वतंत्रता आंदोलनपाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय एकात्मताबंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायवन्दे मातरम्आनंदमठमहामंत्र
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इन्दुशेखर तत्पुरुष
वरिष्ठ साहित्यकार [Read more]
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