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देश के विकास और प्रगति में भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका

भारतीय टीवी मीडिया की राजनीतिक कवरेज, टीआरपी संस्कृति और विकासात्मक मुद्दों की अनदेखी पर विश्लेषण।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत) — edited by Shivam Dixit
Feb 25, 2026, 07:26 pm IST
inभारत, मत अभिमत

मैंने पिछले रविवार 22 फरवरी को प्रधानमंत्री जी की ‘मन की बात’ देखी। भारत के लाखों नागरिकों के साथ 30 मिनट के इस संवाद की 131वीं कड़ी में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के विभिन्न हिस्सों से कई फील-गुड कहानियों पर प्रकाश डाला। प्रारंभ में, मन की बात रेडियो और ट्रांजिस्टर के माध्यम से भारत के लोगों के साथ संवाद करने का एक साधन था, जो देश के दूर-दराज के हिस्से तक पहुंचने का सबसे सुलभ तरीका था। अब मन की बात एक विजुअल ट्रीट है, जिसे सभी टीवी चैनलों और विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया जाता है। वर्तमान कड़ी में, पीएम मोदी ने नई दिल्ली में ग्लोबल एआई इम्पैक्ट समिट के सफल आयोजन पर भी प्रकाश डाला।

एआई शिखर सम्मेलन और मीडिया कवरेज की तुलना

इसकी तुलना मुख्यधारा के टीवी चैनलों द्वारा एआई शिखर सम्मेलन के मीडिया कवरेज से करें, जिसमें उनका ध्यान एक चीनी रोबोट पर और युवा कांग्रेस के सदस्यों द्वारा शर्टलेस विरोध प्रदर्शन पर अधिक रहा। वास्तव में, मीडिया पर, शिखर सम्मेलन की पूरी सफलता को एक निजी विश्वविद्यालय की एक लापरवाही से नकारा जा रहा था। हाल के दिनों में बड़ी संख्या में टीवी चैनलों को देखने के बाद, मैं राजनीतिक रिपोर्टिंग पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के फोकस के बारे में लिखने के लिए बाध्य हूं, जिसमें देश में विकासात्मक गतिविधियों का बहुत कम या कोई कवरेज नहीं है। दुर्भाग्य से इनमें से कई टीवी चैनल सनसनीखेज समाचारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक शुद्ध व्यावसायिक इकाई बन गए हैं, जिनका अधिकांश समय राजनीति के इर्द-गिर्द केंद्रित रहता है।

भारत में निजी समाचार चैनलों की स्थिति

भारत में 918 निजी सैटेलाइट टीवी चैनल हैं। इनमें से लगभग 400 टीवी चैनल समाचार और समसामयिक मामले के समर्पित चैनल हैं, जो हिंदी, अंग्रेजी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में प्रसारित होते हैं। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन फ्री-टू-एयर टीवी चैनलों का प्रसारण करता है। डीडी समाचार चैनलों को छोड़कर, अधिकांश निजी समाचार चैनलों का ध्यान देश में राजनीतिक माहौल पर बार-बार ध्यान केंद्रित करने पर लगा रहता है। इन चैनलों में देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे विकास, खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में हो रही विकास की कहानी पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। ये निजी चैनल लाइव रिपोर्टिंग और प्राइम टाइम टीवी डिबेट के माध्यम से राजनीतिक कवरेज को ग्लैमर प्रदान करते हैं। ज्यादातर चैनल पूरा दिन राजनीति के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं।

स्व-नियमन, टीआरपी और समाचारों का ‘तमाशा’

भारत में, समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण (News Broadcasting Standards Authority,NBSA) टीवी समाचार चैनलों को स्व-विनियमित करता है, जबकि प्रसारण सामग्री शिकायत परिषद (Broadcasting Content Complaints Council,BCCC) टीवी सामग्री के खिलाफ शिकायतों की जांच करती है। स्व-नियमन का तंत्र टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) की दौड़ में डूब गया है, जो निजी चैनलों को विज्ञापन के माध्यम से भारी राजस्व प्राप्त कराता है। वास्तव में, 30 मिनट के समाचार कार्यक्रम में वास्तविक समाचार सामग्री मुश्किल से 15 मिनट से थोड़ी अधिक होती है, बाकी समय विज्ञापनों या आत्म-प्रचार के लिए समर्पित होता है। जाहिर है, स्व-नियमन ने काम नहीं किया है और समाचारों को ‘तमाशा’ के रूप में प्रस्तुत करने से टीवी चैनलों को अधिक दर्शक मिलते हैं।

सोशल मीडिया और तथ्यात्मक सटीकता का संकट

बड़ी संख्या में टीवी चैनलों को लोग, खासकर युवा अपने स्मार्टफोन पर देखते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर हजारों निजी चैनल हैं, जो हर तरह की खबरें फैलाते हैं। सोशल मीडिया में खबरें सनसनीखेज, तथ्यात्मक अशुद्धियों और अतिशयोक्ति से भरी हुई होती हैं। तथ्यात्मक सटीकता पर बहुत कम जांच होने के कारण, सोशल मीडिया पर सामग्री सच्चाई और निष्पक्षता से परे होती है। इसलिए, यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि हमारे निजी समाचार चैनल सच्चाई और सटीकता पर ध्यान केंद्रित करके रेपोर्टिंग करें। टीवी चैनलों के लिए, राजनीति पर ध्यान केंद्रित करना आसान तरीका है क्योंकि इसके लिए किसी गहन रिपोर्टिंग की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसी ज्यादातर खबरें स्टूडियो में आराम से बैठकर बनाई जा सकती हैं।

जमीनी रिपोर्टिंग और विकास परियोजनाओं की जांच की आवश्यकता

लोगों को प्रभावित करने वाले लाइव मुद्दों पर रिपोर्टिंग के लिए विस्तृत शोध और अध्ययन की आवश्यकता होती है। पत्रकारों को यह देखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है कि हमारे देश में विकासात्मक गतिविधियां कैसे होती हैं। उदाहरण के लिए, अगर हमारे मीडिया ने मनरेगा, MGNREGA (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) से चल रही परियोजनाओं की जमीनी स्तर पर सावधानीपूर्वक जांच की होती, तो महात्मा गांधी के नाम पर चल रहा भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो गया होता। इसलिए सरकार को एक संशोधित वीबी-जी राम जी(Viksit Bharat- Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) लाना पड़ा। मीडिया को अब नई योजना के सही कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और कार्यदिवसों को प्रति परिवार 125 तक बढ़ाने पर केंद्रित है।

मीडिया की सामाजिक जिम्मेदारी और सकारात्मक पत्रकारिता

मीडिया का प्राथमिक उद्देश्य सटीकता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी होना चाहिए। सूचना अधिभार (information overload) के युग में, मीडिया, विशेष रूप से निजी समाचार और करंट अफेयर्स चैनलों को अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों को फिर से परिभाषित करना पड़ सकता है। इन चैनलों को ओछी राजनीति, अपराध और मनोरंजन पर ध्यान कम करना होगा। इसके स्थान पर युवाओं को प्रेरित करने वाली सकारात्मक कहानियों को प्रमुखता मिलनी चाहिए। कुछ निजी समाचार चैनल ऐसी कहानियों को कवर करते हैं, लेकिन वे बहुत कम हैं। सनसनीखेज कहानियों के बजाय, मीडिया को विभिन्न विकास परियोजनाओं, शासन की गुणवत्ता, पर्यावरण के मुद्दों, स्वास्थ्य, चिकित्सा देखभाल, शिक्षा, कैरियर के अवसरों आदि पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऐसे कई और समकालीन मुद्दे हैं जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को हमारे नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं को सकारात्मक और आशावादी बनाने की दिशा में अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

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