China के Nuclear Test का अमेरिका ने किया पर्दाफाश! क्या फिर शुरू होगी न्यूक्लियर हथियारों की होड़?
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China के Nuclear Test का अमेरिका ने किया पर्दाफाश! क्या फिर शुरू होगी न्यूक्लियर हथियारों की होड़?

जापान, दक्षिण कोरिया, स्वीडन और जर्मनी जैसे देश अमेरिकी परमाणु छतरी से निराश होकर अपने विकल्प तलाश ही रहे हैं। इससे अप्रसार का अंत हो सकता है और परमाणु प्रसार में तेजी आ सकती है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Feb 24, 2026, 07:32 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
राष्ट्रपति ट्रम्प और राष्ट्र्पति जिनपिंग (File Photo)

राष्ट्रपति ट्रम्प और राष्ट्र्पति जिनपिंग (File Photo)

चीन की रणनीति, कूटनीति और सामरिक नीति हमेशा कई परतों तले ढकी रही है। विरले ही उसकी थाह पाई जाती है। वह परमाणु संपन्न कम्युनिस्ट सत्ता दुनिया के किस देश के संदर्भ में अपनी रणनीति में कब—क्या बदलाव कर लेगी, कहना हमेशा ही मुश्किल रहा है।

अमेरिका से हाल में चीन के संदर्भ में उभरे कुछ आरोपों ने वैश्विक परमाणु स्थिरता को लेकर नए सिरे से सवाल खड़े किए हैं। द डिप्लोमैट पत्रिका के ताजे अंक के अनुसार, चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किए हैं, जो परमाणु हथियारों की एक नई होड़ को जन्म दे सकते हैं। तर्क दिया गया है कि चीन की तेजी से बढ़ती परमाणु शक्ति, अमेरिका और रूस की नई डिलीवरी प्रणालियों के परीक्षणों के साथ मिलकर, दुनिया को एक नए परमाणु युग की ओर धकेल रही है। चीन की यह परमाणु अक्खड़ता न केवल चीन-अमेरिका में चल रही रस्साकशी पर असर डालेगी, बल्कि वैश्विक स्थिरता, परमाणु अप्रसार के मानदंडों और भविष्य के निरस्त्रीकरण समझौतों को भी खतरे में डाल सकती है।

गुपचुप किया परीक्षण

द डिप्लोमैट में प्रकाशित आलेख में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि चीन ने संभवत: जून 2020 में एक परमाणु परीक्षण किया था। अभी गत 6 फरवरी को जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र के निरस्त्रीकरण सम्मेलन में अमेरिकी उप विदेश मंत्री थॉमस डिनानो ने कहा भी था, “पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने परमाणु विस्फोटों को छिपाने के लिए विशेष तकनीकें अपनाईं, क्योंकि वे जानते थे कि यह परीक्षण प्रतिबंध प्रतिबद्धताओं का खुला उल्लंघन है। चीन ने ‘डिकप्लिंग’ पद्धति का उपयोग किया, जो भूकंपीय निगरानी को कमजोर करती है।” सामान्यतः व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) कार्यालय ऐसे परीक्षणों का पता लगा लेता है, लेकिन इस बार चीन की ऐसी चालाकी से यह संभव ही नहीं हो सका।

अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर

गत 17 फरवरी को अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर ने कजाकिस्तान के एक निगरानी स्टेशन के भूकंपीय आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि ये आंकड़े खनन या भूकंप से उठने वाली तरंगों से मेल नहीं खाते, बल्कि ये केवल परमाणु परीक्षण से ही संभव हैं।

चीन का इनकार

इधर चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। चीन का कहना है कि अमेरिका के पास कोई तथ्यात्मक प्रमाण नहीं है। परमाणु विशेषज्ञ जेफरी लुइस ने एक्स पर इस बारे में लिखा है कि सीटीबीटी संधि ‘परमाणु विस्फोट’ प्रतिबंधित करती है, लेकिन इसकी परिभाषा अस्पष्ट है। न तो अमेरिका ने और न ही चीन ने इसे मंजूरी दी है, इसलिए तकनीकी रूप से उल्लंघन का सवाल विवादास्पद है। फिर भी, यदि प्रमाण मजबूत साबित हुए, तो इसकी देखादेखी अन्य देश भी परीक्षण शुरू कर सकते हैं।

यह पहली बार नहीं है जब चीन पर ऐसे आरोप लगे हैं। अप्रैल 2020 में द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लोप नूर परीक्षण स्थल पर असामान्य गतिविधियों की रिपोर्ट छापी ​थी, जहां कम शक्ति वाले विस्फोटों के लिए विशेष कक्ष बनाए गए थे। 2025 के एक शोध पत्र में रेनी बाबियार्ज और जेसन वांग ने 2020-2024 के बीच उस साइट के एकाएक विस्तार का उल्लेख किया था, जो नए परमाणु हथियार डिजाइनों के परीक्षण की तैयारी दर्शाता है।

पेंटागन की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, चीन डीएफ-26 मिसाइल और एच-6एन बॉम्बर के लिए 10 किलोटन से कम मारक क्षमता वाले हथियार विकसित कर रहा है, जो सीमित परमाणु उपयोग के लिए उपयुक्त हैं।

फिर शुरू होंगे परीक्षण!

डिप्लोमैट में प्रकाशित आलेख आगे ‘न्यू स्टार्ट संधि’ का भी जिक्र करता है, जो 2026 में खत्म हो चुकी है। अमेरिकी उप विदेश मंत्री डिनानो ने कहा कि अमेरिका ने अपनी अधिकांश तैनात परमाणु शक्तियों को सीमाबद्ध रखा है, जबकि रूस ने केवल आंशिक अनुपालन किया है। चीन तो संधि से बाहर था। अत: चीनी हथियारों पर कोई सीमा, पारदर्शिता या नियंत्रण नहीं है। अब अमेरिका अपनी आधुनिकीकरण योजनाएं पूरी करेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो समान आधार पर परीक्षण फिर शुरू करने की मांग कर ही चुके हैं।

सतह से मार करने वाली चीन की इंटरकांटिनेंटल मिसाइल का बीजिंग में प्रदर्शन (File Photo)

रूस ने दिसंबर 2025 में पोजीडॉन परमाणु टॉरपीडो का परीक्षण किया था, जिसे राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बहुत बड़ी सफलता बताया था। यदि अमेरिका परीक्षण शुरू करता है, तो यह परीक्षण गैर-परमाणु देशों को भी प्रेरित करेगा। जापान, दक्षिण कोरिया, स्वीडन और जर्मनी जैसे देश अमेरिकी परमाणु छतरी से निराश होकर अपने विकल्प तलाश ही रहे हैं। द डिप्लोमैट के लेख ने चेतावनी भरे स्वर में कहा है कि इससे अप्रसार का अंत हो सकता है और परमाणु प्रसार में तेजी आ सकती है।

भारत के लिए निहितार्थ भारत ने 1974 और 1998 के परीक्षणों के बाद ‘नो फर्स्ट यूज’ का स्वैच्छिक प्रतिबंध लगाया हुआ है। इस लिए भारत की दृष्टि से यह चिंताजनक स्थिति है। चीन की सीमा पर तैनाती (अग्नि, ब्रह्मोस) और नो फर्स्ट यूज नीति के बावजूद, लोप नूर जैसी गतिविधियां असंतुलन पैदा कर सकती हैं। ऐसे में, भारत को क्वाड और मालाबार जैसे मंचों पर सक्रियता बढ़ानी होगी।

समाधान मौजूद है

इस स्थिति से बचने के तीन व्यावहारिक समाधान ध्यान में आते हैं। एक, डेटा साझा करना। दो, जोखिम कम से कम करने संबंधी कोई केंद्र होना और, तीन, निरस्त्रीकरण के छोटे छोटे समझौते करना। सीटीबीटी संधि को लागू करने और बहुपक्षीय वार्ता पर जोर देना आवश्यक जान पड़ता है। अन्यथा, शीत युद्ध जैसी ताकत की होड़ एक बार फिर से दिख सकती है।

 

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Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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