राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्येय पवित्र, मानवतावादी, ईश्वरीय व अहंकाररहित है, इसलिए स्थापना से अनंतकाल तक की यात्रा सुगमता के साथ होना निश्चित है। विशेषकर अहंकार रहित होने के कारण, क्योंकि अहंकारयुक्त सोच ही संस्कारों को विकारों में बदल देती है, मति भ्रष्ट कर देती है जिससे पतन का होना निश्चित हो जाता है।
विश्व शांति व विश्व बंधुत्व के लक्ष्य को प्राप्त करेगा संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह अन्याय एवं अधर्म का मुकाबला करने के लिए समाज के मुट्ठीभर लोग भी यदि अपने पुरुषत्व एवं अपने अंदर के साहस और शौर्य को प्रेरित कर जगा दें तो कमजोर से कमजोर दिखने वाला समाज किसी भी प्रकार की समस्या का मुकाबला ठीक उसी प्रकार कर सकता है जिस प्रकार मुट्ठीभर क्रांतिकारियों के प्रयासों से भारत में आजादी की नींव रखी गयी थी। वैश्विक स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा का होना कठिन व कांटों से भरा जरूर लगता है परंतु समुद्र मंथन से ही अमृत निकलेगा। मानवता अंततः विजयी होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व शांति व विश्व बंधुत्व के लक्ष्य को प्राप्त करेगा। यही कथन, सही कथन है।
प्रकृति से जुड़ा है संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जानता है कि प्रकृतिसत्ता के खेल बहुत निराले हैं। प्रकृतिसत्ता जिससे जो कुछ करवाना चाहती है, करवा ही लेती है। सतयुग से लेकर अब तक जब-जब आवश्यकता पड़ी, प्रकृति ने तमाम विभूतियों को धरती पर माध्यम बनाकर भेजा। कोई दीर्घकाल के लिए आया तो कोई अल्पकाल के लिए किंतु जिसको जो भी जिम्मेदारी मिली, उसका बखूबी निर्वहन किया और फिर प्रकृतिसत्ता की योजनानुरूप एवं आदेश से वापस चला गया, क्योंकि वे सभी प्रमुख पवित्र आत्माएं किसी खास मकसद के लिए माध्यम मात्र बन कर आई थीं। प्रभु श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सम्राट विक्रमादित्य, सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, आचार्य चाणक्य, गुरुनानक, महर्षि वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास, साईंबाबा, स्वामी प्रभुपाद, लहरी महाशय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस आदि।
प्रकृति अपना नायक स्वयं चुनती है
सतयुग से लेकर अब तक तमाम ऋषि-मुनि, विद्वान, साधु-संत एवं महात्मा किसी न किसी खास मकसद के लिए धरा पर अवतरित हुए और अपने काम पूरा करके चले गये। इनमें से कुछ पवित्र आत्माएं अभी भी धरती पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सूक्ष्म शक्तियों के साथ उपस्थित हैं। आवश्यकता पड़ने पर व्यक्ति, राष्ट्र एवं समाज कल्याण के लिए अपनी कृपा बरसाती रहती हैं। उनका आशीर्वाद अनवरत मिल रहा है किंतु प्रकृति की सम-सामयिक, दीर्घकालिक एवं अल्पकाल्कि योजनाओं के साथ ऐसी भी योजनाएं होती हैं जो युगों के बीच के संक्रमण कालों के लिए भी होती हैं और अंनतकालीन होती हैं। अब यह प्रकृति पर ही निर्भर करता है कि वह किससे, कब, क्या और कितना करवाना चाहती है?
विजयादशमी के दिन संघ की स्थापना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विक्रमी संवत् 1982 की विजयादशमी (27 सिंतंबर 1925) को महाराष्ट्र के नागपुर में आद्य सरसंघचालक परम पूज्य डा. हेडगेवार जी के द्वारा की गई। विजयादशमी के ही दिन संघ की स्थापना होना महज एक संयोग नहीं था बल्कि ईश्वरीय विधान था। आज कुछ लोग भले ही यह कहें कि संघ अकाट्य कैसे है और वह अनंतकाल तक कैसे कार्यरत रह सकता है? इस संदर्भ में कुछ बिंदुओं पर दृष्टि डालना बहुत जरूरी है। संघ की एक प्रमुख विशेषता यह है कि विचाराधारा आधारित संगठन है। ईश्वरीयरूपी प्रकृतिसत्ता ने निश्चित कार्य के लिए चुना है, इसलिए कि ठीक उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसकी स्थापना पवित्र दिन हुई, जिसने अग्निरुपी प्रतीक भगवा रंग के ध्वज को अपना गुरू बनाया व अनवरत 100 वर्षों से निरंतरता बनाए हुए है। विश्व में शांति व विश्व बंधुत्व के साथ, विश्व में मानव धर्म के रूप में प्राकृतिक धर्म की स्थापना हेतु प्रकृतिसत्ता ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निमित्त बनाया है जिसको कामयाबी मिलना अवश्यंभावी है।

संघ की नियमित प्रार्थना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नियमित प्रार्थना लम्बे समय तक या जीवनपर्यन्त मात्र उपस्थित रहकर करने वाली आराधना की साधना से स्वयंसेवकों को संघ प्रमुख के विचारों को तरंगों के माध्यम से जोड़ती हुई संघ को एक राष्ट्र, एक रूप, विश्व बंधुत्व, एकरूपता, एक विचारधारा में बांधे रखती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ईश्वरीयरूपी प्रकृतिसत्ता द्वारा ब्रह्मंड में जब भी कोई प्राणी किसी भी रूप में हो, किसी भी धर्म का हो या कहीं भी हो, नियमित रूप से कम से कम 12 वर्षों तक किसी स्थान पर, किसी प्रार्थना, ईश्वर के किसी भी रूप या स्वरूप इत्यादि का स्मरण करता है, उच्चारण करता है या सुनता है या सुनाता है तो उसे ईश्वरीय शक्ति की अनुभूति स्वयं ही होने लगती है जिसे शब्दों में बांध पाना या व्याख्या कर पाना मुश्किल है इसलिए नागपुर या दिल्ली स्थित संघ कार्यालय या अन्य स्थान के 12 वर्षों से स्वयंसेवकों की तीर्थस्थली बने हुए हैं जहां से वह निरंतर ऊर्जा ग्रहण करते रहते हैं। यही कृत्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अकाट्य होने का कारण बन जाते हैं।
आरएसएस की व्यापकता और संगठन शक्ति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यापकता और संगठन शक्ति जग जाहिर है परंतु न तो स्वयंसेवक उसका दिखावा करते हैं और न ही उसका प्रयास अपितु इसके विपरीत संयमित और विवेकपूर्ण रहते हैं। ऐसा कई बार विषम परिस्थितियों में देखने को मिला है, जब वैश्विक विघटनकारी शक्तियों या नकारात्मक मानसिकता के लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उकसा कर अराजकता का माहौल बनाने के असफल प्रयास किये हैं, इसलिए भी अकाट्य है। संघ पर कई बार प्रतिबंध लगे, अनगिनत स्वयंसेवकों की हत्याएं हुईं और बहुत ही व्यापक स्तर पर हमले हुए, किंतु संघ ने कभी संयम नहीं खोया। इतना सब होने के बावजूद संघ का संयमित होना निश्चित रूप से इस बात का द्योतक है कि प्रकृति संघ को इतना सब कुछ सहन करने की शक्ति दे रही है। यह सब बिना ईश्वरीय प्रेरणा एवं कृपा के संभव नहीं हैै। किसी भी वैश्विक स्तर की संस्था का विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में इस हद तक संयमित रहना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। इससे यह साबित होता है कि प्रकृतिसत्ता संघ से अनंतकाल तक के लिए कुछ विशेष कार्य करवाना चाहती है। कठिन से कठिन परिस्थिति का हल संयम और विवेक से ही संभव है।
संघ का दायित्व और कार्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठन, को विशेषकर भारत में कहीं भी किसी प्रकार की आपदा या अप्रिय घटना के संकेतों के माध्यम से पहले ही अनुभूति होकर हलचल होने लगती है, ठीक जिस प्रकार से मानव शरीर में किसी भी अंग के स्पंदन से पूरे शरीर में सक्रियता होती है, प्रतिरक्षा प्रणाली अपना कार्य करने लग जाती है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सजग है, ज्वलंत है व निरंतरता बनाए हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दायित्व और कार्य तब और भी कठिन हो जाता है जब विश्व में आज के ‘युवा भारत’ की ऊर्जा को युवा संस्कारों सहित सामथ्र्यवान बना कर राष्ट्र निर्माण में पंख लगा रहे हैं जिससे भारत की युवा शक्ति पाश्चात्य की चकाचैंध व उपभोक्तावादी संस्कृति से विमुख भी हो सके, यही संघ का ध्येय है, लक्ष्य भी है जो अकाट्य है।
संघ की कार्यशैली 100 वर्ष से संयमित और विवेकपूर्ण हैं
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां, कार्यशैली व क्षमताएं पिछले 100 वर्ष से संयमित हैं, संगठित हैं, विवेकपूर्ण हैं, सर्वत्र हैं, सर्वव्यापक हैं, सर्वस्पर्शी हैं, जात-पात रहित हैं, प्राकृतिक मानवधर्मानुकूल हैं, विकृतिरहित हैं, सादे जीवन व न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीने की हैं, पाश्चात्य प्रभाव से अप्रभावित हैं इत्यादि इसलिए संघ अकाट्य है। महापुरुषों ने तीन प्रकार के दोस्तों की व्याख्या की हुई है जिसमें पहला वह है जो आपातकाल में आपदा के समय खड़ा रहे, दूसरा वह जो शीशे की छवि के समान हमारे साथ दुख-सुख में हमारा सहयोगी बन सके और तीसरा वह जिससे हम अपने मन के विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। इन तीनों प्रकार के दोस्तों को समाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारित कार्यकर्ताओं मंे देखता व पाता है इसलिए संघ अकाट्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को छपने एवं प्रचार पाने की कोई उत्सुकता नहीं होती है, उनका जोर इसलिए छद्म प्रचार पर नहीं रहता बल्कि संस्कारों का प्रचार-प्रसार करने पर रहता है जिसके कारण कार्य करने की क्षमताएं अधिक हो जाती हैं व विस्तार कार्य अपने आप बोलते हैं इसलिए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अकाट्य है।
संघ ने स्वयं को प्रकृति के अनुरूप ढाला
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आप को ईश्वरीय कृपा से प्रकृतिनुरूप ढाला है क्योंकि प्रकृति का यह अकाट्य सिद्धांत है कि उसने सृष्टि के संचालन के लिए सब कुछ मुफ्त में दिया है, किंतु किसी भी कीमत पर उसका दोहन न हो। यह भी अपने आप में सत्य है कि पूर्ण रूप से मानव धर्म के लिए वही संगठन कार्य कर सकता है जो प्रकृति के अनुरूप हो यानी प्रकृति से उतना ही ले जितनी उसे आवश्यकता हो। उसके अंदर प्रकृति का दोहन करने की भावना व लोभ-लालच न हो। प्रकृति का दोहन होते ही प्रकृति अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर देती है। प्रकृति की यदि मोटे तौर पर व्याख्या की जाये तो कहा जा सकता है कि क्षिति, जल, पावक, गगन-समीरा यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु। मोटे तौर पर यही पंचतत्व ही प्रकृतिसत्ता के रूप में साक्षात रूप में विद्यमान हैं। इन पंचतत्वों का जब तक संतुलन बना हुआ है तब तक सब ठीक है। जहां थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा, समझो तहस-नहस हुआ।
प्रकृतिसत्ता के निर्देशों का पालन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अक्षरशः प्रकृतिसत्ता के निर्देशों का पालन कर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में संघ वसुधैव कुटुम्बकम्, विश्व बंधुत्व, वैश्विक शांति, अहिंसा परमो धर्मः, जियो और जीने दो, सत्य, सरलता एवं न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ आगे बढ़ रहा है। आज संघ एवं उसके स्वयंसेवक जिस प्रकार कार्य में लगे हुए हैं उससे यह उम्मीद है कि भविष्य में घोर कलयुग में भी भारत एवं पूरे विश्व को सतयुग और त्रेता युग की जीवनशैली एवं कार्यप्रणाली का आभास होने लगेगा। वास्तव में इसी दिन का इंतजार भारत एवं पूरे विश्व को हैै। सत्य, सरलता, सादगी, प्रेम, भाईचारा ही संघ की पहचान है। इसके साथ ही संघ की एक प्रमुख विशेषता यह है कि संघ ने सिर्फ देना सीखा है। कुछ लेना उसकी प्रवृत्ति में नहीं है। देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें एवं तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें या न रहें। इस प्रकार का मंत्र आत्मसात करते हुए सेवा भाव प्रत्येक स्वयंसेवक में विद्यमान है। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि संघ अकाट्य क्यों है और अंनत काल तक क्यों रहेगा?
कार्य का श्रेय लेने की प्रवृत्ति नहीं
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह कहता है कि वह कुछ नहीं करता मगर सब कुछ करता है, इसी में छुपा है प्रकृतिनुरूप ईश्वरीय अनुकम्पा का राज जिसमें संघ को निमित्त बनाकर कार्य करवाएं हैं इसलिए संघ का कथन भी सही है क्योंकि प्रकृतिनुरूप है। यहां यह भी समझना और समझाना उपयुक्त होगा कि जिस प्रकार राम की सेना में सभी राम नहीं थे, हनुमान की सेना में सभी हनुमान नहीं थे परंतु उनकी वैतरणी में बैठकर सभी पार हो गये थे, विपरीत इसके रावण की नैया में जो बैठा वह नष्ट हो गया, डूब गया, ठीक इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैतरणी में बैठकर लोग विश्व बंधुत्व व विश्व शांति में अपना योगदान देकर ईश्वरीय इच्छाओं के अनुरूप अपने भविष्य को सुधार सकते हैं और सुधार भी रहे हैं।
संघ के स्वयंसेवक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के मन में सदैव विश्व बंधुत्व, एवं वैश्विक शांति का भाव रहता है। इंसानियत, मानवता एवं मानवधर्म के सभी मापदंडों को पूरा करते हुए संघ सदैव अपने कार्यों में लगा रहता है। सही अर्थों में देखा जाये तो प्रकृतिसत्ता भी तो यही चाहती है कि संघ पूरी तरह प्रकृतिनुरूप कार्य करता रहे। संघ की नौका में जो भी सवार होता है, बिना किसी संकोच के इन्हीं भावों एवं विचारों के साथ स्वतः आगे बढ़ता रहता है। विचारधारा के माध्यम से संघ की एकरूपता ही उसकी पहचान है। भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में संघ एक ही विचारधारा एवं नियम के अनुरूप कार्य करता है। रामायण एवं महाभारत काल में जिस प्रकार स्वयं नारायण ने अवतार लेकर अनीति-अधर्म के मार्ग पर भी चलने वालों को मोक्ष प्रदान किया था, उसी प्रकार संघ भी भारत सहित पूरे विश्व में बिना किसी ईष्र्या, द्वेष एवं भेद के सभी के कल्याण के लिए कार्य कर रहा है। सर्वत्र इस बात की चर्चा होती रहती है कि संघ का कार्य ही ईश्वरीय कार्य है। आज समाज में बड़े जोर-शोर से इस बात की चर्चा होती है कि संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अणु है व उसकी शक्ति के बराबर है।

संघ के कार्य अनंतकाल तक चलें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी प्रकृतिसत्ता ने किसी खास मकसद के लिए माध्यम बनाया है। प्रकृतिसत्ता ने संघ के लिए कोई समय सीमा भी निर्धारित नहीं की है, बल्कि उसे अनंतकाल के लिए चुना है। अनंतकाल तक वही संगठन चल सकता है जिसकी कार्यप्रणाली, नीतियां और नीयत, राष्ट्र एवं समाज के लिए प्रकृतिनूरूप एवं अकाट्य हों और अंनतकाल तक के लिए स्वीकार्य हों। किसी संगठन एवं व्यक्ति के साथ यदि ऐसा संयोग बनता है तो निश्चित रूप से इस प्रकार की स्थितियां ईश्वरीय प्रेरणा एवं कृपा से ही निर्मित हो पाती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इस दृष्टि से यदि विश्लेषण किया जाये तो स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है कि संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है, क्योंकि उसके कार्य प्रकृतिनूरूप हैं, अकाट्य हैं, उसका यश, उसकी गाथा अनंतकाल तक चलती रहेगी। ईश्वरीय इच्छा भी यही है कि संघ के कार्य अनंतकाल तक इस धरा पर चलते रहें। ऐसा वक्त की भी जरूरत है। यह भी अपने आप में अटूट सत्य है कि कोई भी संगठन अनंतकाल तक तभी अपना अस्तित्व बचाये रख सकता है, जब वह सभी जाति, धर्म एवं संप्रदाय से ऊपर उठकर इंसानियत, मानवता या यूं कहें कि मानव धर्म पर आधारित हो।
संघ की शाखा में भारत माता की वंदना
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक जब शाखा में जाते हैं तो भारत माता यानी भारत भूमि की आराधना- वंदना करने के साथ ही पूरे विश्व के कल्याण एवं उत्थान की चर्चा करते हैं। संघ की प्रार्थना, संघ की शाखा एवं कार्यप्रणाली भी निश्चित रूप से ईश्वरीय प्रेरणा से ही निर्धारित हुई है। परमपूज्य डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार जी (1925-1940), परमपूज्य माधव सदाशिव गोलवलकर जी (गुरू जी) (1940-1973), परमपूज्य मधुकर दत्तात्रेय जी (1973-1994), परमपूज्य प्रो. राजेंद्र सिंह जी उर्फ रज्जू भैया (1994-2000), परमपूज्य के.एस सुदर्शन जी (2000-2009) एवं परमपूज्य डाॅ. मोहन भागवत जी का 2009 से लेकर अब तक का नेतृत्व मात्र कोई संयोग नहीं है बल्कि यह सब ईश्वरीय प्रेरणा से ही हुआ है। गुरुदक्षिणा के माध्यम से जुटाई गयी राशि से संघ की गतिविधियों का संचालन भी ईश्वरीय कृपा से ही संभव हुआ है। इसकी विचारधारा में मात्र इंसानियत, मानवता, मानवधर्म, समस्त सृष्टि आदि का कल्याण ही है। इसके साथ ही संघ सामूहिकता के साथ कार्य करता है।
संघ में सब समान
संघ का शीर्ष नेतृत्व जिस प्रकार की भाषा बोलता है वही भाषा शाखा के सभी स्वयंसेवक भी बोलते हैं यानी ऊपर से नीचे तक सब कुछ एक समान। सबके लिए एक ही व्याख्या चाहे वह किसी भी स्तर का अधिकारी हो या एकदम साधारण सा स्वयंसेवक। संघ एवं स्वयंसेवकों की आवश्यकताएं एकदम न्यूनतम हैं, जिससे उन्हें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऊल-जुलूल कार्य करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। शताब्दी वर्ष में परिवर्तन के पांच आयाम- सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन (नैतिक मूल्यों पर आधारित परिवार), स्वदेशी आधारित जीवनशैली एवं नागरिक कर्तव्यबोध भी ईश्वरीय प्रेरणा से ही तय हुए हैं।
संघ में दूरदर्शिता एवं पारदर्शिता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में दूरदर्शिता एवं पारदर्शिता कूट-कूट कर भरी है। संघ के जितने भी संगठन, विभाग एवं प्रकल्प हैं, सभी दूरदर्शिता एवं पारदर्शिता के प्रतीक हैं। आज भारत सहित वैश्विक स्तर पर कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां संघ का कार्य नहीं चल रहा हो। संघ जहां कार्य कर रहा है, वहां उसके परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर एकल विद्यालय, वनवासी प्रकल्प इत्यादि। जबसे संघ के संगठन भारतीय मजदूर संघ ने कार्य करना प्रारंभ किया, तबसे मजदूरों के धरने-प्रदर्शन लगभग बंद हैं क्योंकि संघ की प्रेरणा सदैव यही रहती है कि देश के प्रत्येक नागरिक एवं संगठन सिर्फ राष्ट्र निर्माण के लिए कार्य करें न कि राष्ट्र के लिए किसी भी तरह से समस्या बनें इसलिए पूर्ण शोध व विश्लेषण के बाद डंके की चोट पर यह स्थापित हो जाता है कि विश्व शांति व विश्व बन्धुत्व की स्थापना हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अकाट्य है, प्रकृतिनुरूप है, उद्देश्य पूर्ति तक अनंतकालीन है।
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