शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह ऐसा नाम है जिसका स्मरण होने से आज भी देशवासियों के बदन में बिजली सी कौंध जाती है, ऐसा हो भी क्यों न, जब उनका जन्म ही ऐसे परिवार में हुआ जिसके पांच-पांच सदस्यों ने देश की आजादी के यज्ञ में अपनी आहूति डाली हो। स्वामी दयानंद सरस्वती के परम शिष्य सरदार अर्जुन सिंह भगत सिंह के दादा, क्रान्तिकारी किशन सिंह उनके पिताजी, पंजाब माता के नाम से विख्यात विद्यावती उनकी माता जी, क्रान्तिकारी स्वर्ण सिंह और अजीत सिंह उनके चाचा जी थे। क्रान्तिकारी अजीत सिंह जिनका जन्म 23 फरवरी, 1881 को हुआ और उन्होंने सारा जीवन अपने देश व उनकी स्वतंत्रता के लिए होम कर दिया, संयोग से उनका स्वर्गारोहण भी उस दिन हुआ जब देश ने सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को तोड़ा अर्थात 15 अगस्त, 1947 को। मानो उन्होंने मानव जन्म ही देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए लिया हो।
अपने लेख ‘स्वाधीनता संग्राम में पंजाब का पहला उभार’ में भगत सिंह ने लिखा है – ‘जो युवक लोकमान्य के प्रति विशेष रूप से आकर्षित हुए थे, उनमें कुछ पंजाबी नौजवान भी थे। ऐसे ही दो पंजाबी जवान किशन सिंह और मेरे आदरणीय चाचा सरदार अजीत सिंह जी थे।’ क्रान्तिकारी अजीत सिंह का जन्म 23 फरवरी 1881 को जिला जालंधर के खटकडक़लां गाँव में हुआ, भगत सिंह के पिता किशन सिंह उनके बड़े भाई थे। छोटे भाई थे स्वर्ण सिंह जो 23 साल की ही उम्र में स्वाधीनता संग्राम के दौरान जेल में मिले तपेदिक रोग से गुजऱ गए थे। तीनों के पिता अर्जुन सिंह भी उन दिनों आजादी संग्राम से जुड़े थे।
भारत माता सोसायटी की स्थापना और किसान आंदोलन
1906 में दादा भाई नैरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता कांग्रेस हुई जहाँ वे बाल गंगाधर तिलक से बेहद प्रभावित हुए और वहाँ से लौट कर दोनों भाइयों, किशन सिंह और अजीत सिंह, ने भारत माता सोसाइटी की स्थापना की और अंग्रेजी विरोधी किताबें छापने शुरू किए। 1907 में सरकार तीन किसान विरोधी कानून लेकर आयी, जिसके विरुद्ध पंजाब के किसानों में भयंकर रोष की भावना पैदा हुई। अजीत सिंह ने आगे बढ़ कर किसानों को संगठित किया और पूरे पंजाब में सभाओं का सिलसिला शुरू हुआ, जिनमें पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेस नेता व स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय को बुलाया गया।
इन तीन कानूनों का जिक्र भगत सिंह ने अपने उपरोक्त लेख में किया है- ‘नया कालोनी एक्ट, जिसके तहत किसानों की जमीन जब्त हो सकती थी।’ मार्च 1907 की लायलपुर की एक बड़ी सभा में झंग स्याल पत्रिका के संपादक लाला बाँके दयाल, ने एक मार्मिक कविता- ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ पढ़ी, जिसमें किसानों के शोषण की व्यथा वर्णित है, जो इतनी लोकप्रिय हुई कि उस किसान प्रतिरोध का नाम ही कविता के नाम पर पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन पड़ गया।
इसे भी पढ़ें: दिल्ली JNU में बवाल: ABVP पर वामपंथी कैडर का हमला, क्या है पूरा मामला?
किसानों को किया जागरुक
21 अप्रैल 1907 में रावलपिंडी की मीटिंग में अजीत सिंह ने जो भाषण दिया, उसे अंग्रेज सरकार ने बहुत ही बागी और देशद्रोही भाषण माना। पंजाब भर में ऐसी 33 बैठकें हुई, जिनमें से 19 में अजीत सिंह ही मुख्य वक्ता थे। भारत में अंग्रेज सेना के कमांडर लार्ड किचनर को आशंका हुई कि इस आंदोलन से सेना और पुलिस के किसान घरों के बेटे बगावत कर सकते हैं और पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने भी अपनी रिपोर्ट में ऐसी ही आशंका जताई तो अंग्रेज सरकार ने मई 1907 में ही ये कानून रद्द कर दिए, लेकिन आंदोलन के नेताओं-लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को 1818 की रेगुलेशन-3 में छह महीने के लिये बर्मा की मांडले जेल में निष्कासित कर दिया, जहां से उन्हें 11 नवंबर 1907 को रिहा किया गया।
तिलक ने बताया किसानों का राजा
मांडले से लौटते ही अजीत सिंह, सूफी अंबाप्रसाद के साथ दिसंबर 1907 कि सूरत कांग्रेस में भाग लेने गए, जहां लोकमान्य तिलक ने अजीत सिंह को किसानों का राजा कह कर एक ताज पहनाया, जो आज भी बंगा के भगत सिंह संग्रहालय में प्रदर्शित है। सूरत से लौट कर अजीत सिंह ने पंजाब में तिलक आश्रम की स्थापना की, जो उनके विचारों का प्रसार करता था।
चालीस भाषाओं के ज्ञाता
अंग्रेज़ सरकार उनके विद्रोही विचारों के कारण उनके खिलाफ कुछ बड़ी कार्रवाई करने की योजना बना रही थी, जिसे देखते हुए अगस्त-सितंबर 1909 में सूफी अंबा प्रसाद के साथ अजीत सिंह कराची से समुद्री जहाज़ पर सवार होकर ईरान चले गए। 1914 तक ईरान, तुर्की, पेरिस, जर्मनी व स्विट्जरलैंड में रह कर, जहां वे कमाल पाशा, लेनिन, ट्रॉट्स्की जैसे विदेशी क्रांतिकारियों व लाला हरदयाल, वीरेंदर चट्टोपाध्याय और चम्पक रमन पिल्लै जैसे भारतीय क्रांतिकारियों से मिले। मुसोलिनी से भी वे वहीं मिले थे।
विदेश प्रवास व गदर पार्टी के संपर्क
1914 में वे ब्राज़ील चले गए और 18 साल तक वहीं रहे। वहाँ वे गदर पार्टी के संपर्क में रहे, गदरी क्रांतिकारी रत्न सिंह तथा बाबा भगत सिंह बिलगा से वे मिलते रहे। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वे कुछ समय अर्जेंटीना में भी रहे। जीविका के लिए वे विदेशियों को भारतीय भाषाएँ पढाते थे और भाषा प्रोफेसर पद पर भी रहे, वे चालीस भाषाओं के वे ज्ञाता हो चुके थे। अजीत सिंह भतीजे भगत सिंह को बाहर बुलाना चाहते थे और भगत सिंह को ये फिक्र थी कि उनके चाचा विदेश में ही न गुजऱ जाए।
1932 से 1938 तक अजीत सिंह यूरोप के कई देशों, लेकिन ज़्यादातर स्विट्जरलैंड में रहे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे इटली में आ गए थे। इटली में वे नेताजी सुभाष बोस से मिले और वहाँ 11000 सैनिकों का आजाद हिन्द लश्कर भी बनाया। विश्व युद्ध समाप्त होने पर उन्हें खराब स्वास्थ्य के बावजूद जर्मनी की जेल में कैद रखा गया। रिहा होने के बाद दो महीने लंदन में रह कर उन्होंने स्वस्थ होने पर ध्यान दिया और 7 मार्च 1947 को वे 38 साल बाद भारत लौटे। खराब स्वास्थ्य के कारण वे गाँव नहीं जा सके और उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए जुलाई 1947 में डलहौजी जाना पड़ा। वहीं पर 14-15 अगस्त 1947 की मध्य रात में हिंदुस्तान में ब्रिटिश राज खत्म होने पर प्रधानमंत्री नेहरू का भाषण सुन कर सुबह करीब 3.30 पर उन्होंने जय हिन्द कह कर सदा के लिए आँखें मूँद लीं।
भगत सिंह पर था अजीत सिंह का प्रभाव
अजीत सिंह और उनका परिवार आर्य समाज से खासा प्रभावित था और इसका प्रभाव भगत सिंह पर भी पड़ा। अजीत सिंह पंजाब के उन पहले आंदोलनकारियों में से एक थे, जिन्होंने खुले तौर पर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। अपने भतीजे भगत सिंह के लिए भी उन्होंने क्रांति की नींव रखने का काम किया। सरदार अजीत सिंह की याद में डलहौजी के पंजपुला में एक समाधि बनाई गई है, जो अब देशवासियों के लिए मशहूर प्रेरणास्थल है।

















