देश राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है और आज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र क्रांतिकारी के अहम योद्धा श्री पुलिन बिहारी दास जी की 150 वीं जयंती है। उस के दौर में अहम नाम श्री पुलिन बिहारी दास जी का शामिल रहा। उनकी जयंती पर कोलकाता में विशेष स्मरण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उनके पौत्र श्री बिस्वरंजन दास ने बताया कि 28 जनवरी 1877 को जन्मे पुलिन बिहारी दास को क्रांतिकारियों का क्रांतिकारी कहा जाता है। वे ढाका अनुशीलन समिति के संस्थापक रहे और जिसे उस दौर में क्रांतिकारी युवाओं का प्रमुख केंद्र और क्रांतिकारियों का मंदिर माना जाता था। उनके शिष्यों में एक नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी है।
पुलिन बिहारी दास ने 1906 में ढाका में अनुशीलन समिति को संगठित रूप दिया
उनके पौत्र ने बताया कि भारत के इतिहासकारों ने यह उल्लेख किया है श्री पुलिन बिहारी दास जी ने 1906 में ढाका में अनुशीलन समिति को संगठित रूप दिया। इस संगठन का उद्देश्य युवाओं को शारीरिक, मानसिक और क्रांतिकारी प्रशिक्षण देकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ तैयार करना था। समिति की शाखाएं तेजी से फैलीं और इसने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित आधार दिया। कई क्रांतिकारी, जो आगे चलकर अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हुए जैसे चिटगांव शस्त्रागार कांड के नायक सूर्य सेन इसी व्यापक क्रांतिकारी नेटवर्क और विचारधारा से प्रेरित माने जाते हैं।

बिस्वरंजन जी के अनुसार उनके दादा को द्रोण की उपमा इसलिये दी जाती है, क्योंकि क्रांतिकारी भूपेश चंद्र नाग, जिन्हें 1908 में पुलिन बिहारी दास जी के नेतृत्व में सशस्त्र अभियान में सक्रिय सदस्य एवं ब्रिटिशराज के खिलाफ गतिविधियों चलते गिरफ्तार किया गया,दूसरा नाम श्याम सुंदर चक्रवर्ती जो पुलिन जी के प्रमुख सहयोगी व अनुशीलन समिति के अभियानों में भाग लेने के चलते 1908 के आंदोलन में गिरफ्तार हुए। ढाका में अनुशीलन समिति के सशस्त्र कार्यकर्त्ताओं में कृष्ण कुमार मित्र,सुबोध मलिक और अश्विनी कुमार दत्त क्रांतिकारी अभियानों में कार्यरत रहे।उन्होंने बताया कि हाल ही में रिलीज हुई विवेक अग्निहोत्री का बहुचर्चित फिल्म द बंगाल फाइल्स के अहम पात्र गोपाल पाठा भी पुलिन जी के शिष्यों में से एक थे।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार भी हुए थे प्रभावित
इसी दौर में लगभग 1910 के आसपास, जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कोलकाता में मेडिकल शिक्षा ले रहे थे, तब वे भी बंगाल के क्रांतिकारी माहौल व उनके दादा के संपर्क में आए। इसी दौरान डॉ. हेडगेवार ने अनुशीलन समिति से जुड़े युवाओं और गतिविधियों को नजदीक से देखा, समझा और उस संगठित राष्ट्रवादी ऊर्जा से प्रभावित हुए। यही अनुभव आगे चलकर संगठनात्मक सोच के विकास में सहायक बना। उनके पौत्र आज करीब 65 वर्ष के है।वह कहते हैं कि अपने दादा से जुड़े घटनाक्रमों को उन्होंने परिवार और इतिहास के पन्नों में से जाना है। गौरव की अनुभूति इसलिए भी होती है,क्योंकि उनकी रगों में एक महान क्रांतिकारी का खून है। दादा जी का पूरा जीवन लगातार संघर्ष से भरा रहा। ब्रिटिश सरकार ने उन पर कई मामलों में सख्त कार्रवाई की, गिरफ्तार किया और कठोर यात्नाएं दीं,मगर काला पानी सेल्युलर जेल तक की सजा झेलने के बाद भी उनका मनोबल नहीं टूटा। बाद के वर्षों में उन्होंने युवाओं में शारीरिक सशक्तिकरण और अनुशासन की भावना जगाने पर जोर दिया। उनके जन्म से करीब 15 साल पहले 17 अगस्त 1949 को कोलकाता में उनका निधन हुआ था, लेकिन दादा का उनका नाम क्रांतिकारी इतिहास में स्थायी रूप से अमर व्यक्तित्व के रुप में दर्ज है ।
अपने क्रांतिकारी दादाजी की 150वीं जयंती पर आयोजित रन फार द नेशन कार्यक्रम में शामिल होने के उपरांत हुई बातचीत में श्री बिस्वरंजन दास जी गौरवांवित महसूस कर रहे थे।नेताजी सुभाष चंद्र बोस के वंशज राजशेखर बसु के पौत्र सौम्या शंकर बसु ने बातचीत में बताया कि यह दौड़ युवाओं को पितामह के उस विचार से जोड़ने के लिए आयोजित की गई है, जिसमें वे स्वस्थ शरीर और सुदृढ़ मन को राष्ट्र निर्माण की बुनियाद मानते थे। यह दौड़ स्वामी विवेकानंद के पैतृक घर से श्याम बाजार 5 पाइंट तक आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र और युवा शामिल हुए। इस तरह एक सदी से भी अधिक समय बाद श्री पुलिन बिहारी दास जी का नाम फिर से युवाओं के बीच राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और त्याग की प्रेरणा बनकर गूंजता दिखाई दिया।

















