लोकसभा के चुनाव 2024 में असम के धुबरी लोकसभा सीट से कांग्रेस पार्टी के रकीबुल हुसैन ने असम के बड़े मुस्लिम नेता ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल को पराजित किया था। उस चुनाव के दौरान यह हार 10,12,476 मतों के अंतर से थी, जो देश में सबसे अधिक थी।
धुबरी लोकसभा की सीट का परिणाम काफी चाैंकाने वाला था, क्योंकि अजमल लगातार तीन बार से इस सीट से बड़े मतों के अंतर से जीत कर संसद पहुंच रहे थे। धुबरी लोकसभा सीट के अंतर्गत 11 विधानसभा की सीटों में एक पर भी बदरुद्दीन अजमल बढ़त बनाने में सफल नहीं हुए।
लोकसभा परिणाम के बाद उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस रकीबुल हुसैन को लोकसभा में पार्टी का नेता या उपनेता अवश्य बनाएगी। खासकर तब, जब विगत लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी बहरामपुर से चुनाव हार गए थे। रकीबुल हुसैन के जीत का अंतर कांग्रेस पार्टी के एक तिहाई से अधिक 34 सांसदों की जीत के कुल अंतर से भी अधिक था।
रकीबुल हुसैन का राजनीतिक जीवन काफी उज्जवल रहा हैं। वे सांसद बनने से पूर्व असम विधानसभा में विपक्ष के उपनेता थे। उन्होंने 2011 के असम विधानसभा चुनाव में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत को सामगुरी सीट से लगभग 20,000 मतों से हराया था। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को नेता और असम के जोरहाट से लोकसभा के सांसद गौरव गोगोई को उपनेता पद के लिए चुना। गौरव गोगोई को यह पद केवल नेहरू-गांधी परिवार व राहुल से निकटता के कारण दिया गया। यह निर्णय कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं और बड़े मुस्लिम मतदाता वर्ग के लिए बहुत पीड़ादायक था।
कांग्रेस की कारगुजारियां
लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी से इसका बदला लेना शुरू कर दिया। महाराष्ट्र में मालेगांव सेंट्रल विधानसभा सीट से 96.73 प्रतिशत मत प्राप्त करके धुले सीट जीतने वाली कांग्रेस पार्टी को महज छह महीने बाद विधानसभा चुनाव में इस सीट पर महज 3.13 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ। विदित हो कि धुले लोकसभा सीट के अंतर्गत आनेवाली छह विधानसभा की सीटों
में कांग्रेस को केवल मालेगाव सेंट्रल पर 1,94,327 वोट मिले।
कांग्रेस 3,831 मतों से बढ़त बनाकर भाजपा को हराकर सीट जीतने में सफल रही। रकीबुल हुसैन के साथ कांग्रेस पार्टी के द्वारा किए गए नाइंसाफी का परिणाम उनके द्वारा खाली किए गए सीट सामगुरी के उपचुनाव में भी देखने को मिला। जब भाजपा के दीप्लू रंजन शर्मा ने बड़े मतों के अंतर से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार तंज़ील हुसैन को पटखनी दी। कांग्रेस पार्टी के लिए यह हार और भी ज्यादा पीड़ादायक थी, क्योंकि इस उपचुनाव में बदरुद्दीन अजमल ने भी कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था। अतएव यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कांग्रेस पार्टी अपनी कारगुजारियों से असदुद्दीन ओवैसी और इनके जैसे दलों को मजबूत कर रही है।

शून्य सीट पर सिमटना
कांग्रेस पार्टी का मुस्लिम नेताओं के साथ इस तरह के भेदभाव का असर लोकसभा के चुनाव के बाद हुए विधानसभा के चुनावों में भी बड़े पैमाने पर देखने को मिला।
लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस पार्टी ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में भी कमजोर और लचर प्रदर्शन किया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो लगातार तीसरी बार शून्य सीट पर सिमट कर रह गई है।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी महज एक सीट कस्तूरबा नगर पर दूसरे पायदान पर रही थी और तीन विधानसभा की सीटों पर जमानत बचा सकी थी। दिल्ली में लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर कांग्रेस पार्टी के लिए मतदान किया था। इसके कारण पार्टी ने मुस्लिम बहुल सुल्तानपुर माजरा,चांदनी चौक, मटियामहल, बल्लीमारान, सीमापुरी, सीलमपुर और बाबरपुर विधानसभा की सीटों पर बढ़त हासिल की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में इन सभी सीटों पर कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई। इसका एकमात्र कारण कांग्रेस का दोहरा चरित्र रहा है।
बिहार में कमजोर प्रदर्शन
इसी तरह, बिहार विधानसभा चुनाव-2025 में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत काफी कमजोर रहा। वहां कांग्रेस 19 सीटों से मात्र छह सीटों पर सिमट गई। बिहार में मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के बिहार से तीन सांसदों में सीमांचल इलाके से दो सांसद हैं। वहां भी कांग्रेस को करारी हार मिली है। यह तब हुआ है, जब राहुल गांधी ने भी अपने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में सीमांचल इलाके में बहुत समय दिया था। कांग्रेस पार्टी के विधानसभा में पार्टी के नेता और दो बार के कदवा से विधायक शकील अहमद खान भी अपनी सीट बचाने में नाकाम रहे हैं। पूर्णिया जिले की मुस्लिम बहुल सीट कस्बा, जिस पर कांग्रेस पार्टी लगातार तीन बार से चुनाव जीत रही थी, इस बार कांग्रेस पार्टी हार गई।

दूरी बनाते सहयोगी दल
महाराष्ट्र में संपन्न हुए निकाय चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी और इसके सहयोगी दलों को पूरे राज्य में मुस्लिम मतदाताओं के हाथों मुंह की खानी पड़ी है। मुस्लिम मतदाताओं ने इन दलों के बदले असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और शेक आसिफ शेक रशीद की इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ महाराष्ट्र को बड़े पैमाने पर मतदान किया है।
कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में मुस्लिम बहुल सीट सागरदिघी विधानसभा सीट पर 2023 में उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को हराकर 1972 के बाद पहली बार जीतने में सफल हुई थी। मगर कांग्रेस पार्टी के राज्य में इकलौते विधायक बायरन विश्वास जीतने के तुरंत बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लिया। मेघालय में कांग्रेस पार्टी 2023 के विधानसभा चुनाव में पांच सीट जीतकर मुख्य विपक्षी दल थी। लेकिन उसके सभी विधायक सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी में शामिल हो गए और कांग्रेस पार्टी मेघालय राज्य में भी शून्य सीटों वाली पार्टी बन गई।
कांग्रेस पार्टी के मुस्लिम मतदाता वर्ग में घटे जनाधार के मद्देनजर अब अन्य सहयोगी दल कांग्रेस से दूरी बनाते जा रहे हैं। हाल ही में केरल में कांग्रेस की सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने कोझिकोड बैठक में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट गठबंधन में अधिक सीटों की मांग की है। उधर, तमिलनाडु में भी द्रमुक उसे कम सीटें देना चाह रही है। द्रमुक ने 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 25 सीटें दी थीं।

















