77 करोड़ की 33 सरकारी जमीनें वक्फ के नाम : कैग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, जानिए कैसे वक्‍फ बोर्ड करता है कब्जा
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77 करोड़ की 33 सरकारी जमीनें वक्फ के नाम : कैग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, जानिए कैसे वक्‍फ बोर्ड करता है कब्जा

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2018-23 रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के 20 जिलों में 77 करोड़ रुपये मूल्य की 33 सरकारी भूमि वक्फ बोर्ड के नाम दर्ज पाए जाने का खुलासा।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Shivam Dixit
Feb 21, 2026, 03:42 pm IST
inभारत, मध्य प्रदेश

जिन्‍हें भरोसा नहीं होता और जो अब तक वक्‍फ बोर्ड को मासूम मानते हैं, उनके लिए ये सूचना उनकी आंख खोल देनेवाली है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2018-23 अवधि की ऑडिट रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में सरकारी संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 फरवरी 2026 को मप्र विधानसभा में पेश इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के 20 जिलों में 77 करोड़ रुपये मूल्य की 33 ऐसी संपत्तियां वक्फ बोर्ड के नाम पंजीकृत पाई गईं हैं, जोकि पूरी तरह से राजस्व अभिलेखों में स्पष्ट रूप से सरकारी भूमि के रूप में दर्ज थीं।

दरअसल इस तरह से कुल जांची गई 81 वक्फ संपत्तियों में से 41 प्रतिशत का सरकारी होना और फिर भी ‘वक्फ’ के नाम दर्ज होना यहां प्रशासनिक समन्वय पर तो प्रश्नचिह्न लगाता ही है, साथ में भूमि अभिलेख प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सीधा सवाल उठाता है। रिपोर्ट के अनुसार जिन 81 वक्फ संपत्तियों का परीक्षण किया गया, उनमें से 33 संपत्तियां कुल 2,09,639.48 वर्ग मीटर क्षेत्रफल के साथ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थीं। इनमें कई जमीनें सामुदायिक प्रयोजन के लिए आरक्षित हैं। इसके बावजूद इन्हें वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर लिया गया।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इन संपत्तियों का पंजीकरण हाल के वर्षों में हुआ है। ऐसे में इसे पुरानी तकनीकी गलती या रिकॉर्ड अद्यतन की समस्या बताना तथ्यात्मक रूप से कमजोर तर्क प्रतीत होता है।

कलेक्टरों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि संबंधित जिलों के कलेक्टरों ने इन पंजीकरण प्रक्रियाओं को रोकने या निरस्त करने के लिए प्रभावी दिशा-निर्देश जारी नहीं किए। कुछ मामलों में आपत्तियां दर्ज की गईं, पर इसके बावजूद पंजीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी और संपत्तियां वक्फ बोर्ड के नाम दर्ज हो गईं। यदि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि का स्वामित्व स्पष्ट था तो संबंधित विभागों के बीच समन्वय क्यों नहीं हुआ। क्या पंजीयन विभाग, राजस्व विभाग और वक्फ बोर्ड के बीच सूचना का आदान-प्रदान पर्याप्त नहीं था? कैग का स्‍पष्‍ट कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी विसंगति नहीं मानी जा सकती है, यह तो निगरानी और जवाबदेही की कमी का साफ मामला दिखाई देता है।

टेक्निकल मिस्टेक का तर्क और कैग की असहमति

राज्य सरकार ने अपने जवाब में इसे टेक्निकल मिस्टेक बताया। सरकार का तर्क था कि वक्फ अधिनियम 1995 में जिला प्रशासन से एनओसी लेने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि राजस्व रिकॉर्ड के कंप्यूटरीकरण के दौरान स्वामित्व कॉलम में सरकारी दर्ज हुआ। लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने इस स्पष्टीकरण को अस्वीकार कर दिया। रिपोर्ट में उल्लेख है कि कई संपत्तियों का पंजीकरण हाल के वर्षों में हुआ है, जिससे तकनीकी त्रुटि का तर्क कमजोर पड़ता है। यदि भूमि हाल में ही वक्फ के नाम दर्ज हुई है, तो प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक सत्यापन क्यों नहीं हुआ, यह प्रश्न रिपोर्ट के केंद्र में है।

विवादित जिलों में फैला मामला

रिपोर्ट में जिन जिलों और संपत्तियों का उल्लेख है, वे राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैली हैं। उदाहरणस्वरूप आगर मालवा के सुसनेर क्षेत्र का जमुनिया गांव, अनूपपुर के कोटमा और बिजुरी क्षेत्र, बालाघाट, भिंड का मेहगांव, भोपाल का हुजूर क्षेत्र, बुरहानपुर, छतरपुर, देवास और टीकमगढ़। भोपाल के हुजूर क्षेत्र में मस्जिद हिनोतिया, मदीना मस्जिद महावड़िया, कब्रिस्तान कमलानगर और कब्रिस्तान कानासेया का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है। इसी तरह बुरहानपुर की मदीना मस्जिद मदरसा, छतरपुर की वक्फ ईदगाह और दरगाह हजरत सैयद वली कब्रिस्तान व कुआं, देवास और टीकमगढ़ के कब्रिस्तान भी सूची में शामिल हैं। इनमें से कई संपत्तियां सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि बताई गई हैं, जिससे विवाद और गहरा हो जाता है।

वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न

रिपोर्ट में मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। बजट अनियमितता, नियमित ऑडिट का अभाव और स्टाफ की कमी जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है। यदि संस्थागत ढांचा ही कमजोर हो, तब संपत्तियों के सर्वे, संरक्षण और सत्यापन में त्रुटियां होना स्वाभाविक है।

देशव्यापी संदर्भ में बढ़ती चुनौतियां

उल्‍लेखित है कि यह मामला मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। देशभर में वक्फ संपत्तियों की संख्या 8 लाख से अधिक और कुल क्षेत्रफल लगभग 6 लाख एकड़ से ज्यादा बताया जाता है। 2022-23 में कर्नाटक में कृषि भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित किए जाने को लेकर विवाद हुआ था। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु, बिहार समेत कई राज्‍यों में भी वक्फ संपत्तियों के स्वामित्व और लीज प्रबंधन को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। अनेक मामले अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे, जहां यह स्पष्ट किया गया कि स्वामित्व निर्धारण साक्ष्यों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

प्रशासनिक लापरवाही

मध्य प्रदेश के संदर्भ में मूल प्रश्न यही है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि सरकारी थी तब वक्फ के नाम पंजीकरण की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई। यदि आपत्तियों के बावजूद पंजीकरण हुआ है तो इसका अर्थ है कि ये सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, पूरा मामला योजनाबद्ध षड्यंत्र का है।

इस संबंध में विश्‍व हिन्‍दू परिषद (विहिप) के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता विनोद बंसल का कहना है, “ये समाज की चिंता और सरकार की कैग रिपोर्ट के माध्‍यम से स्‍वीकृति है जो बार-बार ‘वक्‍फ’ के कुकर्मों का पर्दाफाश करती है। अभी तक समाज वक्‍फ के कारण से निजि संपत्‍त‍ियों को लेकर चिंतित था, लेकिन अब ये सरकारी संपत्‍त‍ियों से जुड़ा प्रमाण सामने आया है कि कैसे ‘वक्‍फ बोर्ड’ शासकीय संपत्‍त‍ियों पर अपनी नजरे गढ़ाए बैठा है।”

बंसल कहते हैं, “मप्र की सरकार को चाहिए वो अविलम्‍ब इसकी जांच कराए, इस षड्यंत्र के पीछे छिपे अधिकारियों के खिलाफ निर्णायक निर्णय ले, साथ ही वक्‍फ से जुड़ी इसके पूर्व की संपत्‍त‍ियों की भी जांच नए सिरे से सरकार को करे, ताकि आगे इस तरह की घटनाएं दोबारा न हो सकें।” साथ ही उन्‍होंने कहा कि मामले में सरकार ऐसे कदम उठाए जिनसे अन्‍य राज्‍य भी प्रेरणा ले सकें। विहिप प्रवक्‍ता विनोद बंसल ने इस दौरान दिल्‍ली की उन 123 बेशकीमती संपत्‍त‍ियों का हवाला भी दिया, जिन पर वक्‍फ ने अवैध रूप से कब्‍जा कर रखा था और उसे जागरुक नागरिकों के चलते न्‍यायालय से आए निर्णय के बाद सरकार को वापिस सौंपना पड़ा है।

दूसरी ओर जब उक्‍त प्रकरण में जब मध्य प्रदेश राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल से संपर्क करने का प्रयास किया तो उनका मोबाइल नंबर लगातार बंद पाया जाता रहा। वहीं एडवोकेट आशुतोष कुमार झा का कहना है कि “मध्‍य प्रदेश की सरकारी संपत्‍त‍ियां जो नियम विरुद्ध वक्‍फ बोर्ड ने अपनी सूची में दर्शायी हैं, उन्‍हें राज्‍य की डॉ मोहन सरकार को हर हाल में वापिस लेना चाहिए, इसके लिए प्रक्रिया बहुत आसान है, जोकि स्‍वयं शासन के अधिकारी जानते हैं, वे उसका पालन करें।” उनका यह भी कहना है कि “ ये 77 करोड़ रुपये की 33 संपत्तियों का मामला है जोकि शासन प्रणाली की अब परीक्षा लेगा कि वास्‍तव में प्रशासन तटस्‍थ है या नहीं। सीएजी की रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि राज्‍य में भूमि अभिलेख प्रबंधन, विभागीय समन्वय और संस्थागत जवाबदेही में व्यापक सुधार की आवश्यकता है।”

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डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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