धन्‍य है ऐसी माता... पहचान की गरिमा की कथा : छांदोग्योपनिषद से बॉम्बे हाईकोर्ट तक, जानिए सिंगल मदर की संघर्ष कहानी
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धन्‍य है ऐसी माता… पहचान की गरिमा की कथा : छांदोग्योपनिषद से बॉम्बे हाईकोर्ट तक, जानिए सिंगल मदर की संघर्ष कहानी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि सिंगल मदर भी बच्चे की पूर्ण अभिभावक है। अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गरिमा और पहचान के अधिकार को मान्यता देते हुए कोर्ट ने स्कूल रिकॉर्ड से पिता का नाम हटाने की अनुमति दी।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Shivam Dixit
Feb 20, 2026, 11:28 pm IST
inभारत, महाराष्ट्र
bombay high court

bombay high court

भारतीय परंपरा में सत्य की प्रतिष्ठा जीवन के निर्णायक क्षणों में होती रही है। छांदोग्योपनिषद की एक मार्मिक कथा बालक सत्यकाम से जुड़ी आज बहुत याद आ रही है, जिसका संदेश ही यही है कि व्‍यक्‍ति की पहचान से जुड़ा रक्त संबंधों से भी ज्‍यादा यदि कुछ सत्य है तो वह व्‍यक्‍ति की गरिमा है।

कथा के अनुसार बालक सत्यकाम विद्याध्ययन की आकांक्षा लेकर ऋषि गौतम के आश्रम पहुँचा। गुरु ने औपचारिक प्रश्न किया, तुम किस गोत्र के हो। बालक के पास उत्तर नहीं था। वह अपनी माँ के पास लौटा। माँ ने शांत और निर्भीक स्वर में कहा, बेटा, युवावस्था में मैं कई स्थानों पर रही। तुम्हारे पिता कौन हैं, यह मैं निश्चित रूप से नहीं जानती। मेरा नाम जबाला है, तुम स्वयं को जबाला-पुत्र कहो।बालक ने वही सत्य जाकर गुरु को कह दिया। सुनकर ऋषि भावविभोर हो उठे।

उन्होंने कहा, धन्य है ऐसी माता, जिसने तुम्हें सत्य का पाठ पढ़ाया। जो सत्य बोलने का साहस रखता है, वही ब्रह्मविद्या का अधिकारी है और उन्होंने बालक को अपने आश्रम में प्रवेश दे दिया। उस क्षण वंश नहीं, विवेक जीता; गोत्र नहीं, गरिमा प्रतिष्ठित हुई और यही भारतीय परंपरा है। वस्‍तुत: यही स्वर सदियों बाद हाल ही में आए बॉम्बे हाईकोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले में सुनाई देता है, जहाँ अदालत ने कहा कि सिंगल मदर भी पूर्ण गार्जियन है और बच्चे की पहचान किसी ऐसे पिता से क्यों जोड़ी जाए जिसका उसके जीवन से कोई संबंध ही नहीं।

न्यायालय का निर्णय

दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ, जिसमें जस्टिस विभा कांकणवाड़ी और जस्टिस हितेन वेणुगावकर शामिल थे, के समक्ष एक दुष्कर्म पीड़ित मां की याचिका आई। डीएनए टेस्ट से जैविक पिता सिद्ध हो चुका था, किंतु उसने बच्चे से अलग रहना चुना। जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम दर्ज था। स्कूल ने संशोधन से इनकार किया तो मां-बेटी अदालत पहुँचीं। पीठ ने स्पष्ट कहा कि बच्चे की नागरिक पहचान के लिए सिंगल मदर को पूर्ण अभिभावक मानना कोई दया या दान नहीं है, यह संविधान के प्रति निष्ठा है। न्‍यायालय ने प्रश्न उठाया कि जब पिता जीवन में अनुपस्थित है तो बच्चे की सार्वजनिक पहचान उससे क्यों जोड़ी जाए।

अनुच्छेद 21 और 14 : गरिमा का अधिकार

न्‍यायालय ने अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन का अधिकार सिर्फ अस्तित्व का नहीं है, यह सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है। पहचान भी उसी गरिमा का हिस्सा है। किसी ऐसे गैर मौजूद अभिभावक से बच्चे की पहचान जबरन जोड़ना उसकी गरिमा पर आघात है।

अनुच्छेद 14 के तहत अदालत ने माना कि पहचान को सिर्फ पिता के जरिए तय करना कोई तटस्थ प्रशासनिक नियम नहीं है। यह पितृसत्तात्मक सोच से उपजा ढांचा है, जिसमें वंश को पुरुषों की संपत्ति समझा गया। जब मां अकेली गार्जियन है तो स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम हटाकर मां का नाम और सरनेम दर्ज करना किसी सार्वजनिक उद्देश्य को नुकसान नहीं पहुँचाता।

स्कूल रिकॉर्ड : सार्वजनिक दस्तावेज की जिम्मेदारी

पीठ ने कहा कि स्कूल रिकॉर्ड निजी कागज न होकर सार्वजनिक दस्तावेज है, जो बच्चे के साथ वर्षों तक चलता है और आगे उसकी पढ़ाई तथा पेशेवर जीवन में भी इस्तेमाल होता है। केवल फॉर्मेट के कारण पिता का नाम अनिवार्य रखना और मां का नाम वैकल्पिक बनाना दस्तावेजी असमानता को दोहराना है। प्रशासन को सिंगल मदर्स के अधिकारों को व्यावहारिक स्तर पर मान्यता देनी होगी।

जाति के प्रश्न पर संतुलित दृष्टि

उपरोक्‍त निर्णय में बच्ची की जाति बदलने के अनुरोध पर अदालत ने संतुलित रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि जाति को मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता और स्कूल जाति प्रमाणन संस्था नहीं है। परंतु यदि रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटि है और वास्तविक सामाजिक तथा कानूनी स्थिति कुछ और है तो सुधार संभव है। राहत इस प्रकार दी जानी चाहिए कि प्रक्रिया की ईमानदारी बनी रहे और बच्चे का हित भी सुरक्षित रहे।

उपनिषद से वर्तमान तक : पहचान का पुनर्पाठ

जब हम उपनिषद की कथा को याद करते हैं तो पाते हैं कि वहाँ भी प्रश्न गोत्र का था, वंश का था और उत्तर था सत्य। गुरु ने कहा था कि जो सत्य बोलता है वही ब्रह्मविद्या का अधिकारी है। आज यही नए संदर्भों में न्‍यायालय भी कह रहा है कि जो मां अपने बच्चे का पालन पोषण अकेले करती है वही पूर्ण अभिभावक है। दोनों प्रसंगों में मूल स्वर एक है, पहचान की जड़ें गरिमा में हैं, केवल जैविक संबंध में नहीं। उपनिषद में ऋषि ने सामाजिक रूढ़ि को तोड़ा। हाईकोर्ट ने प्रशासनिक रूढ़ि को चुनौती दी। दोनों जगह सत्य और न्याय ने मिलकर एक नई राह बनाई।

सत्‍य फिर प्रतिष्‍ठित हुआ

कहना होगा कि यह निर्णय उन हजारों महिलाओं के लिए आश्वस्ति है जोकि अकेले अपने बच्चों का भविष्य संवार रही हैं। यह बताता है कि राज्य और समाज अब उस दिशा में बढ़ रहे हैं जहाँ पहचान का आधार सिर्फ पिता का नाम नहीं हो सकताह है, इसका सीधा संबंध तो वास्तविक पालन-पोषण ही हो सकता है। सदियों पहले आश्रम के प्रांगण में जो सत्य बोला गया था, वह आज अदालत के कक्ष में संवैधानिक भाषा बनकर गूंजा है।

पहचान का अधिकार और गरिमा का अधिकार अकेले कानूनी शब्द नहीं हो सकते हैं, यह निश्‍चित ही उस मां की अस्मिता और उस बच्चे के आत्मसम्मान का प्रश्न हैं जिसके जीवन से ये जुड़ा हुआ है। अंत में यही कि धन्य है ऐसी माता, जोकि सत्य और साहस से अपने बच्चे की पहचान गढ़ती है और धन्य है वह न्याय जिसमें कि उस पहचान को सम्मान देने का सामर्थ्‍य है।

Topics: Vibha KankanwadiHiten VenugavkarChandogya Upanishadसिंगल मदर अधिकारअभिभावक कानूनपहचान का अधिकारमहिला सशक्तिकरणBombay High Courtअनुच्छेद 14संवैधानिक अधिकारअनुच्छेद 21
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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