हाल ही में पूर्वोत्तर भारत (असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम) में एक ऐसी सेवा यात्रा हुई, जिसमें पूरे भारत से 156 चिकित्सकों और चिकित्सा शास्त्र के 165 छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। ये चिकित्सक और छात्र देश के नामी अस्पतालों और चिकित्सा महाविद्यालयों से जुड़े हैं। ये सभी अपने खर्च से सबसे पहले गुवाहाटी पहुंचे।
बात हो रही है 23वीं ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ की। गुवाहाटी में इन सभी चिकित्सकों और छात्रों को 52 दलों में बांटा गया और पूर्वोत्तर के 60 से अधिक जिलों में भेजा गया। बड़े शहरों में आधुनिक सुविधाओं के बीच रहने वाले ये चिकित्सक और छात्र एक सप्ताह तक गांवों में रहे और वहां चिकित्सा शिविरों में आम लोगों के स्वास्थ्य की जांच की, उन्हें उचित सलाह दी और यह भी आश्वासन दिया कि यदि कोई भी दिक्कत हो तो नि:संकोच संपर्क करें।
कुछ शिविर तो बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और तिब्ब्त की सीमा पर लगे। जिन मरीजों को दवाइयों की जरूरत थी, उन्हें दवाइयां दी गईं। विशेष बात यह रही कि यात्रा दल में एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद के भी चिकित्सक शामिल थे। इनमें अधिकतर की आयु 35 वर्ष से नीचे की थी। महिला चिकित्सकों की संख्या 55 रही। एलोपैथ के 200 से अधिक, आयुर्वेद के 25 से ज्यादा और होम्योपैथी के पांच शिविर आयोजित हुए।
इस यात्रा का शुभारंभ 1 फरवरी को गुवाहाटी स्थित सेवा भारती जनजातीय छात्रावास में आयोजित एक कार्यक्रम में हुआ। इसके मुख्य अतिथि थे असम के राज्यपाल श्री लक्ष्मण प्रसाद आचार्य। उन्होंने आह्वान किया कि इस यात्रा के माध्यम से सरकार की लोककल्याणकारी योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें, ताकि समाज उनका समुचित लाभ उठा सके, और इस उद्देश्य को भी यात्रा का अभिन्न अंग बनाया जाए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख श्री पराग अभ्यंकर ने ‘परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम्’ को केंद्र में रखते हुए इस यात्रा का उद्देश्य सभी के समक्ष रखा।
उन्होंने कहा कि परोपकार, सेवा और करुणा ही मानव जीवन का मूल धर्म है तथा चिकित्सा सेवा के माध्यम से समाज के दुःख को कम करना ही इस यात्रा की आत्मा है। नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन (एन.एम.ओ.) के अध्यक्ष डॉ. सी.बी. त्रिपाठी ने बताया कि किस प्रकार एन.एम.ओ. देशभर में इस प्रकार की यात्राओं के माध्यम से चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े चिकित्सकों एवं चिकित्सा छात्रों के बीच राष्ट्रभावना, सेवा-संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना जागृत करता है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे सेवा भारती, दिल्ली के अध्यक्ष श्री रमेश अग्रवाल।
यात्रा की पृष्ठभूमि
यात्रा की पृष्ठभूमि के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, असम क्षेत्र के सह सेवा प्रमुख श्री सुरेंद्र तालखेडकर कहते हैं, ”भारतीय समाज की मूल चेतना में यह भाव सदैव विद्यमान रहा है कि समाज का कोई भी वर्ग वंचित, उपेक्षित या पीड़ित न रहे। यही भावना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवा कार्यों की प्रेरणा रही है। समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक सेवा पहुंचाने के इसी संकल्प को साकार करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं।
इसी भावभूमि से प्रेरित होकर गुवाहाटी के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह निश्चय किया कि पूर्वोत्तर भारत के सुदूर और दुर्गम अंचलों में रहने वाले अपने भाइयों और बहनों तक न केवल पहुंचा जाए, बल्कि उनके जीवन, संस्कृति, खान-पान, स्वच्छता, पोषण, पारिवारिक संस्थाओं और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं को गहराई से समझा जाए तथा उन्हें शेष भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक धारा से जोड़ा जाए।”
उन्होंने यह भी बताया, “भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय से स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से चुनौतियों का सामना करता रहा है। यहां भारी वर्षा, विस्तृत पहाड़ी भू-भाग, घने वन और बिखरी हुई आबादी के कारण चौबीस घंटे सामान्य स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना कठिन होता है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न जनजातीय और जातीय समूहों की अपनी-अपनी परंपराएं, रीति-रिवाज और अंधविश्वास कई बार आधुनिक एवं वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियों को अपनाने में बाधा उत्पन्न करते हैं। इन परिस्थितियों को समझते हुए यह अनुभव किया गया कि केवल संस्थागत व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के बीच जाकर विश्वास स्थापित करना आवश्यक है।”

अभिनव प्रयोग
इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक अभिनव प्रयोग प्रारंभ किया गया, जिसमें देश-विदेश से चिकित्सकों और मेडिकल छात्रों को आमंत्रित कर पूर्वोत्तर भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने की योजना बनाई गई। इस उपक्रम को ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ नाम दिया गया। भारत के विभिन्न चिकित्सा महाविद्यालयों से चयनित शिक्षक, मेडिकल छात्र और पैरामेडिकल कर्मियों को प्रेरित किया गया कि वे पूर्वोत्तर भारत में आकर सुदूर गांवों में पांच से सात दिन तक निवास करें और वहां के ग्रामीणों के आतिथ्य में रहकर निःशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करें। यह सेवा केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि चिकित्सकों और ग्रामीणों के बीच आपसी विश्वास और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम भी बनी है।
इस व्यापक सेवा अभियान के संचालन की जिम्मेदारी सेवा भारती, पूर्वांचल को सौंपी गई। सेवा भारती पूर्वांचल एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी स्थापना 1998 में गुवाहाटी में हुई थी। 2005 में सेवा भारती, पूर्वांचल ने नेशनल मेडिकोज ऑर्गेनाइजेशन (एन.एम.ओ.) तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ वरिष्ठ चिकित्सकों के सहयोग से ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ का औपचारिक शुभारंभ किया।
आरोग्य मित्र योजना
इस सेवा यात्रा को निरंतर और प्रभावी बनाए रखने के लिए सेवा भारती, पूर्वांचल ने आरोग्य मित्र परियोजना को सशक्त किया। पूर्वांचल के 3,000 से अधिक गांवों में प्रशिक्षित आरोग्य मित्र कार्यरत हैं, जो प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। इन्हें व्यक्तिगत स्वच्छता, पोषण, रोग-निवारण तथा आधुनिक चिकित्सा सेवाओं के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर लोग अवैज्ञानिक उपचारों पर निर्भर होने के बजाय सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों से जुड़ सकें। आरोग्य मित्र एक सुव्यवस्थित प्रणाली के अंतर्गत प्रखंड, जिला, मंडल और राज्य स्तर पर कार्य करते हैं। ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ पूरी तरह स्वैच्छिक होती है। चिकित्सक और मेडिकल छात्र अपने-अपने प्रस्थान स्थल से गुवाहाटी तक की यात्रा का खर्च स्वयं वहन करते हैं, जबकि शिविर स्थलों तक की आगे की व्यवस्था सेवा भारती, पूर्वांचल द्वारा की जाती है।
ऐसे की जाती है तैयारी
प्रत्येक ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ से काफी पहले अनुभवी चिकित्सकों द्वारा संभावित दवाओं की सूची तैयार की जाती है। इस सूची को गुवाहाटी के चिकित्सा महाविद्यालयों और अस्पतालों के वरिष्ठ चिकित्सकों द्वारा संशोधित कर अंतिम रूप दिया जाता है। इसके पश्चात् सेवा भारती, गुजरात के सहयोग से दवाइयां मंगाई जाती हैं। गुवाहाटी पहुंचने पर इन दवाओं को छांटकर विभिन्न शिविरों में यात्रा प्रारंभ होने से पहले पहुंचा दिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविरों की आवश्यकता इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनकी कमी के कारण लोगों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और शिक्षा के अभाव में कई रोके जा सकने वाले रोग गंभीर रूप ले लेते हैं। ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ के माध्यम से चलाए जा रहे ये शिविर न केवल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराते हैं, बल्कि स्वास्थ्य शिक्षा के माध्यम से रोग-निवारण और दीर्घकालिक जागरूकता भी उत्पन्न करते हैं।
सनातन दृष्टि
इस सेवा यात्रा का नामकरण भारतीय सभ्यता की प्राचीन चिकित्सा परंपरा से प्रेरित है। आयुर्वेद के आदिपुरुष भगवान धन्वन्तरि को देवताओं का चिकित्सक और भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश के साथ प्रकट होने वाले धन्वन्तरि, स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगमुक्ति के प्रतीक हैं। भारतीय परंपरा में चिकित्सा को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा और साधना माना गया है, और ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ इसी सनातन दृष्टि का आधुनिक स्वरूप है।‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ वस्तुतः भारत की उस सभ्यतागत चेतना का प्रतीक है, जिसमें करुणा, सेवा, विज्ञान और संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
यात्रा का समापन 8 फरवरी को गुवाहाटी में ही हुआ। इस अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें यात्रा में लगे चिकित्सकों, छात्रों और अन्य कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही।
पहली सेवा यात्रा
2005 में पहली ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ हुई। इसमें 9 चिकित्सक और 8 मेडिकल छात्र शामिल हुए थे। उन्होंने 25 शिविरों के माध्यम से 5,009 रोगियों को लाभ पहुंचाया था। 22वीं ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ में 18 राज्यों से 210 चिकित्सक, 149 मेडिकल छात्र तथा 46 पैरामेडिक्स और नर्सों ने भाग लिया, जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन से आए चिकित्सक भी शामिल थे। पिछले वर्ष पूर्वोत्तर राज्यों में 250 चिकित्सा शिविर आयोजित किए गए, जिनमें 9,861 पुरुष, 12,539 महिलाएं और 5,763 बाल रोगी लाभान्वित हुए थे।
लाभान्वित हुए 30,000 लोग
23वीं ‘धन्वन्तरि सेवा-यात्रा’ से लगभग 30,000 लोग लाभान्वित हुए। इस यात्रा को सफल बनाने के लिए सेवा भारती,पूर्वांचल और अन्य संगठनों के करीब 3,500 कार्यकर्ताओं ने दिन-रात मेहनत की। सबसे बड़ी बात यह होती है कि शिविरों में जिन रोगियों को देखा जाता है, उनसे लगातार संपर्क भी रखा जाता है। जिन रोगियों को बाहर के किसी अस्पताल में दिखाने की जरूरत होती है, तो उन्हें दिखाया भी जाता है। इस कारण यह यात्रा पूर्वोत्तर भारत में काफी लोकप्रिय हो चुकी है।














