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रक्त से रंजित ‘हाथ’

नक्सलियों और आतंकवादियों के प्रति कांग्रेस का रवैया बहुत ही ढुलमुल रहा है। यही नहीं, कांग्रेस के नेता बराबर ऐसे बयान देते रहे हैं, जिनसे इन तत्वों का दुस्साहस बढ़ता है। छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों को 'प्रश्रय' देने का काम किया। ऐसा नहीं होता तो नक्सलवाद कब का खत्म हो गया होता

Written byपंकज झापंकज झा
Feb 16, 2026, 12:58 pm IST
inभारत, विश्लेषण, छत्तीसगढ़
झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले के बाद का दृश्य, फाइल चित्र

झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले के बाद का दृश्य, फाइल चित्र

गत दिनों रायपुर में केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा, ”मैं भूपेश बघेल के समय भी केंद्रीय गृहमंत्री रहा था। मैं निस्संकोच कह सकता हूं कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने माओवादी आंदोलन को प्रश्रय देकर रखा था। इसमें किसी को भी शंका करने की कोई जरूरत नहीं है।” जो भी अमित शाह की कार्यप्रणाली को जानते हैं, वे समझते हैं कि श्री शाह कोई भी बात बिना निराधार नहीं कहते। निश्चित ही उनके पास ऐसे तथ्य होंगे, जिसके आधार पर जिम्मेदारी के साथ उन्होंने यह कहा है।

भूपेश बघेल को मिला लाभ

सर्वज्ञात है कि कुछ वर्ष पहले बस्तर के झीरम में भयंकर नक्सल हमला हुआ था, जिसमें माओवादियों के विरुद्ध पूरी ताकत से लड़ने वाले महेंद्र कर्मा से लेकर कद्दावर नेता नंद कुमार पटेल समेत दर्जनों नेता बलिदान हुए थे। उस हमले के बाद कांग्रेस में आई रिक्तता का सबसे अधिक लाभ किसे मिला, यह भी सभी जानते हैं। विशेषकर किसी वारदात के बाद किसे सबसे अधिक लाभ हुआ! उस वारदात के बाद कांग्रेस में आयी रिक्तता का लाभ भूपेश बघेल को मिला। वे प्रदेश में पहली पंक्ति के नेता बने और आगे फिर मुख्यमंत्री के रूप में भी उन्हें कार्य करने का अवसर मिला।

उस हमले के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में लगातार बघेल यह कहते रहे थे कि झीरम हमले के साक्ष्य उनकी जेब में हैं। लेकिन मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी न तो उन्होंने साक्ष्य सार्वजनिक किया, न ही उसे किसी जांच एजेंसी को सौंपा, जबकि साक्ष्य छिपाना भी दंडनीय अपराध है। इसी विषय पर दो कदम और आगे बढ़ते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी से बिलासपुर में दो टूक यह कहलवा दिया गया, “झीरम हमले में नक्सलियों का हाथ नहीं है।” ऐसा कह कर सीधे तौर पर कांग्रेस सुप्रीमो से माओवादियों को क्लीन-चिट दिलवा दी गई।

इससे भी माओवादियों को प्रश्रय मिला। प्रदेश के मानपुर मोहला में तो कांग्रेस विधायक की उपस्थिति में हुई सभा में एक नक्सली ने क्षेत्र में वोट मांगने आने पर भाजपा कार्यकर्ताओं को काट देने के धमकी दी थी। उस पर अमल भी किया। फिर ऐसा आतंक फैलाया गया कि वहां से कांग्रेस जीत भी गई। छत्तीसगढ़ से कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य रंजीता रंजन का बयान याद कीजिए, जब उन्होंने कहा था, “सभी नक्सली खराब और गलत नहीं होते।” उत्तर प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राज बब्बर ने सीधे तौर पर माओवादियों को ‘क्रांतिकारी’ कहा था। दुर्दांत नक्सली हिड़मा के मारे जाने पर तो मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक संदिग्ध महिला की पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए उस पर सवाल उठाए थे। वह महिला, आतंकी हिड़मा की लाश पर दहाड़े मार कर रो रही थी, उससे यह साबित हुआ कि नक्सलियों से उसके कैसे संबंध थे।

लड़ाई को किया गया कमजोर

आज जब केंद्र और राज्य की डबल इंजन सरकार मिलकर माओवाद के विरुद्ध अंतिम लड़ाई लड़ रही है, तब भी कांग्रेस से नक्सल समर्थक बयान दिलवाए जा रहे हैं। अप्रैल, 2024 में कांकेर जिले में 29 माओवादियों को मार गिराने में सुरक्षा बलों को उस समय तक की सबसे बड़ी सफलता मिली थी। इस मुठभेड़ को भी फर्जी साबित करने सबसे पहले भूपेश बघेल सामने आए थे, जबकि स्वयं नक्सलियों ने प्रेस रिलीज जारी कर नाम समेत स्वीकार किया था कि उनके 29 लोग मारे गए हैं।

ऐसे दर्जनों उदाहरण दिए जा सकते हैं, जब कांग्रेस ने माओवाद के विरुद्ध लड़ाई को कमजोर करने की कोशिश की। यहां तक कि छत्तीसगढ़ में सरकार नहीं रहने पर अब तेलंगाना से माओवादियों को समर्थन देने वाले बयान दिलवाए जा रहे हैं। वहां के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने सितंबर, 2025 में नक्सलवाद को एक ‘फिलॉसफी’ कहा, जिसे ‘बलपूर्वक खत्म नहीं किया जा सकता।’ उन्होंने इसे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से उत्पन्न समस्या बताया।

गृहमंत्री अमित शाह ने जैसा कहा भी कि यह अगर विकास की कमी का परिणाम होता, तो बस्तर से अधिक पिछड़े भारत के 100 जिले उस समय भी थे, लेकिन उनमें से कहीं भी नक्सलवाद नहीं पनपा। फिर भी अगर यह मान भी लिया जाए कि यह आर्थिक असमानता या शोषण से उपजा आतंक है, इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस की ही तो है। जिस बस्तर को शोषण और दमन का उपनिवेश बना कर रखा गया था, कथित रूप से जिसके कारण माओवादी आतंक को प्रश्रय मिला, उस समय अविभाजित मध्य प्रदेश में कांग्रेस का ही तो शासन था।

इसी तरह जिस अविभाजित आंध्र प्रदेश के रास्ते माओवादी बस्तर में आए, महाराष्ट्र में, ओडिशा में, अविभाजित बिहार, पश्चिम बंगाल में हर जगह तब कांग्रेस ही तो थी। जिस नक्सलवाड़ी में कानू-चारू ने इस खूनी आतंक की शुरुआत की थी, वहां तब किस दल की सरकार थी? जाहिर है कांग्रेस और बाद में कम्युनिस्ट ही तो इसके जिम्मेदार रहे। झारखंड में तो जिस झामुमो से कांग्रेस का गठबंधन रहा है, उसने तो अनेक नक्सलियों को टिकट देकर कांग्रेस के समर्थन से लोकसभा और विधानसभा में भेजा। यह स्पष्ट है कि नक्सलवाद के जो भी बहाने रहे हों, उसकी जड़ में कांग्रेस रही है। दुखद यह है कि आज भी गाहे-बगाहे कांग्रेस यही करती नजर आ रही है।

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

केंद्रीय गृहमंत्री के जवाब में आए भूपेश बघेल के बयान भी इस ‘प्रश्रय’ को सही ठहराते प्रतीत हो रहे हैं। बघेल ने कहा, “नक्सलवाद तब समाप्त माना जाएगा, जब अर्धसैनिक बलों को वापस कर लिया जाए, जब जन-प्रतिनिधियों को दी गई सुरक्षा वापस हो जाए।” इससे अधिक संवेदनहीन बयान और कुछ नहीं हो सकता। क्या बघेल यह चाहते हैं कि सुरक्षा बलों को वापस भेज कर फिर से जनजातियों को मरने छोड़ दिया जाए! या जिस बस्तर में हजारों जनजाति, दर्जनों नेता-कार्यकर्ता बलिदान हुए, वहां जनप्रतिनिधियों को असुरक्षित छोड़ दिया जाए, ताकि फिर बचे-खुचे नक्सली खून की होली खेल कर अपना आधार मजबूत कर लें?

यही वह संवेदनहीनता है जिसका परिचय शासन में रहते हुए भी भूपेश बघेल ने दिया था। अप्रैल, 2021 में बीजापुर में हुए नक्सली हमले में 22 जवान शहीद हुए थे। उस समय भी बघेल असम में चुनाव प्रचार में व्यस्त थे, जबकि ऐसे समय मुख्यमंत्री का प्रदेश में होना अनिवार्य होता है। उस रात को अमित शाह उसी असम का चुनाव प्रचार छोड़ कर छत्तीसगढ़ आए। रायपुर में उच्च स्तरीय बैठक कर सुरक्षा की समीक्षा की और घायल जवानों की चिकित्सा व्यवस्था आदि करने में जुट गए थे। तब बड़े ही संवेदनहीन तरीके से बस्तर के तत्कालीन सांसद और कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के साथ असम के रेस्तरां में भूपेश बघेल रात्रि पार्टी कर रहे थे। दुखद यह कि उसका फोटो कांग्रेस अध्यक्ष के हैंडल से सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया था। ऐसी संवेदनहीनता बिना ‘प्रश्रय’ के नहीं आती।

बस्तर की नई सुबह

सुरक्षा बलों को वापस बुलाने की बात कर भूपेश बघेल क्या उस दौर की वापसी चाहते हैं, जब ‘सलवा जुडूम’ को न्यायालय द्वारा समाप्त कर देने के बाद चुन-चुन कर जनजातियों की हत्या की गई? संदर्भवश यह भी उद्धृत किया जा सकता है कि कांग्रेस के ही नेता रहे स्व. महेंद्र कर्मा के ही नेतृत्व में सलवा-जुडूम शुरू हुआ था। उसे न्यायालय द्वारा समाप्त करने पर कांग्रेस इतना अधिक कृतज्ञ हो गई कि वह फैसला देने वाले न्यायाधीश को बाद में सीधे उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना दिया। इस उम्मीदवारी का विरोध करने बड़ी संख्या में ऐसे जनजाति सीधे दिल्ली पहुंचे थे, जिन्होंने नक्सली हमले में हाथ, पांव, आंखें, परिवार आदि खो दिया था। फिर भी पीड़ित जनजातियों की गुहार से भी कांग्रेस जरा भी विचलित नहीं हुई।

शान से वे पूर्व न्यायाधीश चुनाव लड़ते रहे कांग्रेसनीत गठबंधन का प्रत्याशी बन। इस तरह नक्सल पीड़ितों के घावों पर कांग्रेस नेतृत्व ने नमक छिड़कने का कोई भी ‘अवसर’ अपने हाथ से जाने नहीं दिया। हार सुनिश्चित होने के बावजूद ऐसे प्रत्याशी को खड़ा करने का संदेश यही है कि ‘हाथ’ आतंकियों और नक्सलियों के साथ है। वास्तव में सुरक्षा बलों को वापस बुलाने की बात कर भूपेश बघेल अपनी उसी अज्ञानता का परिचय दे रहे हैं, जैसा भाव केंद्रीय संस्थाओं, संघीय ढांचा के प्रति उनके पूरे कार्यकाल की पहचान रही, जिसका खामियाजा बस्तर को भी भोगना पड़ा था।

सरकार बदलने के बाद हालात बदले हैं। बस्तर अब दशकों की पीड़ा के बाद एक नई सुबह की बाट जोह रहा है। आज वहां बारूद की जगह विकास प्रश्रय पा रहा है। अब ‘बस्तर पंडूम’ मनाए जा रहे हैं। खूनी खेल का दौर पीछे छोड़ते हुए ‘बस्तर ओलंपिक’ के खेल हो रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह स्वीकारना चाहिए कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं होती। अब भी समय है कि कांग्रेस क्षुद्र राजनीति न करे। नीरज के शब्दों में कहें तो बस्तर का संदेश कांग्रेस के लिए यही है, “आग लेकर ‘हाथ’ में पगले जलाता है किसे, जब न ये बस्ती रहेगी, तू कहां रह पायेगा।’

Topics: झीरम हमलाबस्तर को शोषणबस्तर पंडूमबस्तर ओलंपिकबारूद बनाम विकासखूनी आंतकसुरक्षा बलFRATUREDफर्जी मुठभेड़नक्सलवादपाञ्चजन्य विशेषसलवा जुडूम
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