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होम भारत ओडिशा

‘आंगनबाड़ी कर्मियों को मिले सरकारी कर्मचारी का दर्जा’

पुरी (ओडिशा) में भारतीय मजदूर संघ (भामस) का त्रैवार्षिक राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अवसर पर चार प्रस्ताव पारित किए। एक प्रस्ताव में मांग की गई है कि सभी श्रमिकों पर बिना किसी अपवाद के श्रम कानूनों को लागू किया जाए।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 16, 2026, 10:57 pm IST
inओडिशा
अधिवेशन के मंच पर विराजमान भारतीय मजदूर संघ के अधिकारी

अधिवेशन के मंच पर विराजमान भारतीय मजदूर संघ के अधिकारी

गत 6-8 फरवरी तक पुरी (ओडिशा) में भारतीय मजदूर संघ (भामस) का त्रैवार्षिक राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित हुआ। इस अवसर पर चार प्रस्ताव पारित किए। एक प्रस्ताव में मांग की गई है कि सभी श्रमिकों पर बिना किसी अपवाद के श्रम कानूनों को लागू किया जाए। पारित प्रस्ताव में भामस ने श्रम कानूनों के सार्वभौमीकरण पर जोर देते हुए कहा कि श्रमिकों को जीवन-यापन योग्य वेतन और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक नई श्रम नीति घोषित की जानी चाहिए। अधिवेशन में भामस ने ‘अंत्योदय’ को संगठन का लक्ष्य घोषित किया और सशक्त भारत के पुनर्निर्माण के लिए सभी प्रयासों को उसी दिशा में केंद्रित करने का संकल्प लिया।

सम्मेलन में पारित एक अन्य प्रस्ताव में भामस ने आंगनबाड़ी कर्मियों को औपचारिक रूप से सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने तथा उन्हें वेतन और सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करने की मांग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि पोषण, बाल विकास, मातृ स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण से जुड़ी विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत कार्यरत आंगनबाड़ी कर्मियों और सरकार के बीच स्पष्ट रूप से नियोक्ता–कर्मचारी का संबंध स्थापित है।

संगठन ने आंगनबाड़ी कर्मियों को ‘स्वयंसेवक’ मानने की धारणा को खारिज करते हुए उन्हें आवश्यक सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने वाले अग्रिम पंक्ति के कर्मी बताया। प्रस्ताव में कहा गया है कि आंगनबाड़ी कर्मी वैधानिक पदों पर कार्यरत हैं, इसलिए वे वेतन भुगतान अधिनियम, 1936 और ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972 के अंतर्गत लाभ पाने की पात्र हैं। एक और प्रस्ताव में सरकार, नियोक्ता और श्रमिक संगठनों को शामिल करने वाले त्रिपक्षीय तंत्र को तत्काल पुनर्जीवित कर उसे सुदृढ़ीकरण करने की मांग की गई है।

संगठन ने रेखांकित किया कि त्रिपक्षीय व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से औद्योगिक शांति बनाए रखने, विवादों के समाधान और संतुलित श्रम नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रस्ताव में चिंता व्यक्त की गई है कि हाल के वर्षों में त्रिपक्षीय मंच अनियमित, अप्रभावी और लगभग उपेक्षित हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप औद्योगिक संबंध कमजोर हुए हैं और निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में श्रमिकों की भागीदारी घट गई है।

चौथा प्रस्ताव ठेका श्रमिकों की दुर्दशा पर केंद्रित है, जिसमें भामस ने उनके शोषण को समाप्त करने के लिए व्यापक कानूनी सुधारों की मांग की। मौजूदा ठेका श्रम व्यवस्था को भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा गया गया है कि इसका अक्सर दुरुपयोग श्रमिकों को रोजगार सुरक्षा, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा से वंचित करने के लिए किया जाता है।

‘समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हो कला’

भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में संस्कार भारती, दिल्ली प्रांत ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में 8 फरवरी को एक संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी का विषय था-‘कला अभिव्यक्ति : स्वतंत्रता एवं मर्यादाएं।’

गोष्ठी की प्रस्तावना संस्कार भारती, दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष प्रभात कुमार ने रखी। प्रथम सत्र साहित्य पर केंद्रित रहा, जिसमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, साहित्यकार डॉ. अलका सिन्हा तथा लेखक व्योमेश शुक्ल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्संबंध पर गहन विचार रखे। द्वितीय सत्र दृश्य कला पर आधारित था। इसमें मूर्तिकार नीरज गुप्ता, ललित कला अकादेमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंदलाल ठाकुर तथा आंतरिक सज्जाकार सीतू कोहली ने कला में संवेदनशीलता, लोकमर्यादा और सौंदर्यबोध के महत्व को रेखांकित किया।

तृतीय सत्र प्रदर्शनकारी कलाओं पर केंद्रित रहा, जिसमें संगीत नाटक अकादेमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा, बांसुरी वादक चेतन जोशी तथा गायिका विद्या शाह ने परंपरा, नवाचार और आधुनिक चुनौतियों पर सार्थक संवाद किया। चतुर्थ सत्र चल–चित्र (सिनेमा) पर आधारित था, जिसमें फिल्म निर्देशक अतुल पांडेय, पत्रकार अनंत विजय तथा फिल्म समीक्षक मुरतजा खान ने सिनेमा में अभिव्यक्ति की सीमाओं और सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए। समापन सत्र में संस्कार भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री अभिजीत गोखले ने कहा कि कला की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हो।

कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि प्रत्येक सत्र से पूर्व विषय बोध कराने हेतु नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए गए। साथ ही भारतीय संविधान की महिला शिल्पियों के योगदान एवं संविधान में निहित कला पक्ष को दर्शाती एक चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई।

Topics: भारतीय मजदूर संघसमाजराष्ट्रआंगनबाड़ी कर्मिस्वयंसेवकसंस्कृति
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