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कांग्रेस ने दिया माओवाद को प्रश्रय : अमित शाह

रायपुर में ऑर्गनाइजर द्वारा आयोजित एकदिवसीय कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के सर्वांगीण विकास की तस्वीर प्रस्तुत की। उन्होंने नक्सलवाद के खात्मे को लेकर प्रतिबद्धता जताते हुए बताया कि कैसे यह राज्य अपनी स्थापना के बाद ‘बीमारू’ की छवि को तोड़कर समृद्धि के रास्ते पर बढ़ रहा है। प्रस्तुत हैं गृह मंत्री के उद्बोधन के संपादित अंश-

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 15, 2026, 10:28 pm IST
inविश्लेषण, छत्तीसगढ़

यह एक संयोग है कि यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट ने कहा, ‘‘भारत की सफलता से पूरा विश्व स्थिर, समृद्ध और सुरक्षित होता है।’’ सिक्योरिटी (सुरक्षा), प्रोस्पेरिटी (समृद्धि) और स्टेबिलिटी (स्थिरता) किसी भी इकाई, किसी भी व्यक्ति और किसी भी राज्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, खासकर आजादी के बाद बने छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लिए। लेकिन जब छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड के लिए आंदोलन हो रहे थे, तब लंबे समय तक कांग्रेस सत्ता में थी। कहा गया कि विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए अलग राज्य बनाने की बात करते हैं। सवाल उठे कि ये राज्य टिकाऊ होंगे? कितने व्यवहार्य होंगे? क्या विधानमंडलों में सक्षम लोग मिलेंगे, जो राज्य को चला सकें? क्या राजस्व व्यवस्था से विकास संभव होगा?

विगत तीन दशकों में इसके दो उदाहरण हैं। पहला, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग सरकार के कार्यकाल में तीन राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश) का विभाजन हुआ और झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़-तीन नए राज्य बने। हालांकि, बिहार में हमारी सरकार नहीं थी, फिर भी बिना मनमुटाव और खींचतान के यह काम पूरा हुआ। आज मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़, बिहार-झारखंड, यूपी-उत्तराखंड भाइयों की तरह देश के विकास में योगदान दे रहे हैं। दूसरा उदाहरण है आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का विभाजन। आंध्र-तेलंगाना विभाजन में लोकसभा में आंध्र के सांसदों को बाहर रखकर कानून पारित करना पड़ा। इतनी कटुता थी कि विवाद खत्म होने में एक दशक से अधिक समय लग गया। आज भी दोनों के बीच कई मुद्दे अनसुलझे हैं।

‘बीमारू’ से समृद्धि की उड़ान

आज छत्तीसगढ़ 25 साल का हो गया। इस दौरान भारी परिवर्तन आया। पहले एक शब्द का प्रयोग होता था-‘बीमारू’ राज्य। यह बीमारू शब्द कैसे बना था? बीआई से बिहार, एमए से मध्य प्रदेश, आर से राजस्थान और यू से उत्तर प्रदेश। ये संक्षिप्ताक्षर था, गुणात्मक नहीं। आज मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, राजस्थान और बिहार बीमारू श्रेणी से बाहर निकल कर विकसित राज्य बनने की कगार पर हैं। इन राज्यों को ‘बीमारू’ बनने में जितना समय लगा, उबरने में उतना समय नहीं लगा। इसका मुख्य कारण है कि लंबे समय तक भाजपा की सरकारें बनीं और विकास का दौर शुरू हुआ।

इस देश को आजाद हुए और संविधान लागू हुए 75 से ज्यादा साल हो चुके हैं। इस दौरान तीन विचारधाराओं (कांग्रेस, भाजपा और कम्युनिस्ट) की सरकारें लंबे समय तक लगभग हर जगह रहीं। तीनों विचारधाराओं के शासनकाल में राज्यों के परिवर्तनों के आंकड़े उपलब्ध हैं। विचारधारा से परे सभी आंकड़ाविदों को इसका तुलनात्मक विश्लेषण जनता-विद्यार्थियों के सामने रखना चाहिए। तीनों में भाजपा का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। भाजपा ने सुशासन के हर मानक को ऊंचा उठाया है। छत्तीसगढ़ इसका जीवंत उदाहरण है। 25 साल पहले जब इसका निर्माण हुआ तो राज्य माओवाद से ग्रसित था। 25 में से लगभग 18 साल भाजपा की सरकार रही और 7 साल कांग्रेस की। अब यह विकसित राज्य बनने की कगार पर है और माओवाद समाप्ति की ओर। यह गुणात्मक परिवर्तन भाजपा की विचारधारा आधारित सरकार लाई।

25 वर्ष की इस यात्रा में शुरुआती कुछ साल कांग्रेस का शासन रहा, जिसमें अत्याचार, दंगे, आंदोलन होते रहे। फिर रमन सिंह के नेतृत्व में 15 साल भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार रही और राज्य ने विकास के हर आयाम में प्रगति की। रमन सिंह माओवाद से लड़े, नक्सलवाद को नियंत्रित किया। केंद्र में ज्यादातर समय कांग्रेस की सरकार रही। लेकिन नक्सलवाद एक राज्य की समस्या नहीं थी। यह 12 राज्यों की विचारधारा-जन्य समस्या थी। कुछ लोग माओवाद को विकास की कमी से जोड़ते हैं। कहते हैं कि विकास नहीं होने के कारण माओवादियों ने हथियार उठाए।

मैं इससे कतई सहमत नहीं हूं। मेरे पास इसके भी प्रमाण हैं। रमन सिंह ने राज्य को ‘बीमारू’ छवि से उबारने का कार्य किया। लेकिन बाद में भूपेश बघेल के नेतृत्व में 5 साल फिर कांग्रेस की सरकार बन गई। कांग्रेस की सरकार आते ही हॉरर फिल्म की तरह घोटाले, भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई। भाजपा शासन में नए राज्य की जनता ने जिसे देखा-सुना नहीं था।

जब राज्य में बघेल जी की सरकार थी, तब मैं गृह मंत्री था। इसलिए नि:संकोच कह सकता हूं कि कांग्रेस सरकार ने राज्य में माओवादी आंदोलन को प्रोत्साहन दिया। इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए। जिनके हाथ में हथियार हो, उन्हें शासन भला कैसे प्रश्रय दे सकता है? इसका कारण समझ नहीं आता। इस तरह रमन सिंह द्वारा शुरू विकास और माओवाद नियंत्रण का काम एक तरह से 5 साल तक खटाई में पड़ गया। कटु अनुभव के बाद जनता ने कांग्रेस को विदा कर दिया और विष्णुदेव साय की नेतृत्व में भाजपा लौटी तो विकास की नई शुरुआत हुई।

बेजोड़ आर्थिक गति

किसी भी राज्य के 25 साल का आकलन आंकड़ों पर ही आधारित होना चाहिए। मानक तो कई हैं, लेकिन आर्थिक मानक की बात करना चाहता हूं। 2000 (पहला साल) और 2025 (25वां साल) की तुलना करें। इस दौरान छत्तीसगढ़ का वार्षिक बजट 30 गुना बढ़ा। भारत में 25 सालों में कोई भी राज्य ऐसा नहीं कर पाया। राजस्व, केंद्र अनुदान या खनिज उद्योग से बजट बढ़ सकता है, लेकिन दूसरा पैमाना प्रति व्यक्ति आय है, जो 17 गुना बढ़ी। इसी तरह, जीएसडीपी में 25 गुना वृद्धि हुई। ये पैमाने अलग-अलग या सामूहिक भी देख सकते हैं। सामूहिक रूप से राज्य की आर्थिक स्थिति के 16 बैरोमीटर इन्हीं में समाहित हैं। यानी सभी 16 संकेतकों में औसतन 22 गुना वृद्धि हुई है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। समृद्धि आई, लेकिन इसका उपयोग क्या हुआ? सबसे ज्यादा जनता कृषि से जुड़ी थी। 25 साल में सिंचाई के क्षेत्र में राज्य कितना समृद्ध हुआ?

सिंचाई क्षेत्र में छत्तीसगढ़ ने दो गुना वृद्धि की। सिंचाई के रकबे में यह वृद्धि 25 वर्ष में धीरे-धीरे हुई। खरीफ फसलों का उत्पादन 3 गुना बढ़ा। कृषि के जानकार जानते हैं, खरीफ वर्षा आधारित है, सिंचाई से रकबा या मूल्य नहीं बढ़ता है। असली कसौटी रबी फसल ही है, जहां बारिश नहीं आती और सिंचाई व्यवस्था से किसानों के खेत तक पानी पहुंचता है। इसके कारण रबी फसलों का उत्पादन लगभग 6 गुना बढ़ा। खनिज समृद्धि का सही उपयोग राज्य के बजट और जीएसडीपी मानकों को बढ़ाने में हुआ। प्रति व्यक्ति आय बढ़ी, लेकिन प्रशासन को व्यक्ति के आरोग्य पर भी ध्यान देना चाहिए।

पहले छत्तीसगढ़ में 7 जिला अस्पताल थे, आज 30 हैं। मेडिकल कॉलेज भी 1 से 16 हो गए हैं। आंगनवाड़ी भवन 18 गुना बढ़े। देश का कोई राज्य 25 साल में ऐसा नहीं कर पाया, जो छत्तीसगढ़ ने किया। इसी तरह, कुपोषण के कारण मृत्यु दर 61 से घटकर 15, मातृ मृत्यु दर (प्रति लाख) 365 से 146, शिशु मृत्यु दर 79 से 37 हो गया। यह सब तब हुआ, जब राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा माओवादियों के कब्जे में था। वहां पीएचसी, सीएचसी, आंगनवाड़ी नहीं बना सकते थे, जहां प्राथमिक स्कूल तक जला दिए जाते थे। कांग्रेस एंड कंपनी उसे ही जस्टिफाई कर रही है। प्रश्न है, आपने क्या किया जनजातियों का? नई निरक्षर पीढ़ी खड़ी कर दी।

25 साल राष्ट्र के दृष्टिकोण से ढाई पीढ़ियों के बराबर हैं। अब विकास और तेज होगा, क्योंकि राज्य माओवाद से मुक्त हो गया है। साक्षरता दर 65 बढ़कर 80 प्रतिशत हो गई। एकलव्य आवासीय विद्यालयों की संख्या शून्य से 75 हो गई और छात्रावासों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या तीन गुना बढ़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग दो गुना बढ़े, जबकि ग्रामीण सड़कों में 98 गुना वृद्धि हुई। इससे छत्तीसगढ़ ने देशभर में रिकॉर्ड बनाए। निवेश में 300 गुना उछाल दर्ज किया गया। खनिज उत्पादन में छत्तीसगढ़ शीर्ष पर है। कोयला, टिन, लौह अयस्क, चूना-पत्थर, बॉक्साइट जैसे क्षेत्रों में 1 से 5वें स्थान पर है। आज लगभग 7.5 प्रतिशत की विकास दर से राज्य आगे बढ़ रहा है, जो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लिए अकल्पनीय था, क्योंकि माओवाद जैसी चुनौतियों के कारण सेवा क्षेत्र का योगदान कम था। फिर भी कृषि में 17 प्रतिशत, उद्योग में 48 प्रतिशत और सेवा में 35 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की। आदिवासी कल्याण के लिए भी व्यापक विकास कार्य हुए। वनवासी कल्याण में देश की सभी सरकारों में सबसे बेहतर काम किसने किया? 25 सालों में छत्तीसगढ़ सरकार ने, यह निर्विवाद है।

माओवाद समस्या पर दो टूक

माओवाद समस्या का सही आकलन नहीं करेंगे तो भारत की भावी पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। कुछ विचारकों ने भ्रांति फैलाई कि यह समस्या विकास से जुड़ी है। माओवाद कानून-व्यवस्था का मुद्दा है। ऐसा नहीं है। 1980 के शुरुआती दशक में माओवाद का उद्भव हुआ, जिसका मुख्य क्षेत्र तेलंगाना, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और ओडिशा से सटे जिले, विशेषकर पुराने बस्तर के आठ जिले थे। उस समय राज्य गजेटियर और सांख्यिकी में बस्तर के विकास आंकड़े उपलब्ध हैं। तब देश में बस्तर से ज्यादा अविकसित 100 जिले थे। यदि विकास ही कारण होता, तो उन 100 जिलों में माओवाद क्यों नहीं पनपा? कुछ इसे कानून-व्यवस्था का सवाल मानते हैं, मैं इससे भी सहमत नहीं हूं। माओवाद के उद्भव से पहले बस्तर की कानून-व्यवस्था बिहार-उत्तर प्रदेश के कई जिलों से कहीं बेहतर थी।

यह समस्या न तो कानून-व्यवस्था से जुड़ी है, न विकास से। किसी से भी बहस में इसे प्रमाण के साथ सिद्ध कर सकता हूं। यह विशुद्ध रूप से विचारधारा से जुड़ी है। जो कहते हैं कि यह विचार की समस्या नहीं है, तो मूवमेंट का नाम ‘माओवाद’ क्यों रखा गया? क्योंकि इस विचारधारा में ही समस्या का समाधान बंदूक से निकलता है। यह विचार भारतीय संविधान की आत्मा नहीं है, जहां हर समस्या का हल लोकतंत्र और चर्चा से निकलती है। उन्होंने गरीब-अबोध आदिवासी युवाओं-बच्चों को हथियार थमा दिए और क्या किया? तिरुपति से पशुपतिनाथ तक ‘रेड कॉरिडोर’ का नारा दे दिया और चार-साढ़े चार दशक तक इस क्षेत्र के विकास पर नाग बनकर फैलकर बैठे रहे।
यह कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं कि यदि बस्तर माओवाद से पीड़ित न होता, तो इसके पास इतने संसाधन हैं कि यह देश का सबसे विकसित जिला होता। कई लोग मेरी बात से असहमत होंगे, लेकिन 10 साल बाद बस्तर देख लेना। बस्तर देश का सबसे विकसित जनजातीय जिला बनेगा।

आज मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उप-मुख्यमंत्री विजय शर्मा के दौरे के बाद पहली बार कई लोगों के बैंक खाते खुले, उन्हें राशन कार्ड मिले। नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने हर गरीब को घर, गैस, पानी, शौचालय, बिजली, 5 किलो धान प्रति व्यक्ति प्रति माह और 5 लाख तक इलाज की सुविधा दी, लेकिन छत्तीसगढ़ के जनजातिय भाइयों-बहनों को ये सुविधाएं नहीं मिलीं। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? लाल आतंक इसके लिए जिम्मेदार है। उसने वर्षों तक यहां विकास नहीं पहुंचने दिया। आज मोदी जी को फिर से इस क्षेत्र के लिए अलग से 15,000 पीएम आवास, राशन कार्ड, गैस सिलेंडर के लिए विशेष मंजूरी देनी पड़ी। ये योजनाएं देशभर संतृप्त हो चुकी थीं, यहां विस्तार और समय-सीमा बढ़ानी पड़ी। अब स्कूल, अस्पताल, सड़क, टेलीफोन टावर, रेल लाइन बन रही है। भारत सरकार सिंचाई योजना मंजूर करने वाली है, जो 7 लाख हेक्टेयर भूमि को सींचेगी।

माओवादियों से आत्मसमर्पण का आह्वान

हजारों आदिवासी बच्चे मारे गए, जीवन बर्बाद हो गया और यह प्रचार किया जा रहा है कि ‘गोली चला रहे हैं।’ मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार किसी पर गोली नहीं चलाना चाहती। सभी माओवादी हथियार डाल दें। हम रेड कार्पेट बिछाकर उनका स्वागत करेंगे। विशेषकर जो बच्चियां बंदूक लेकर खड़ी हैं, उनसे तो हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि आप तो जरूर आत्म समर्पण कीजिए। आगे बहुत अच्छा जीवन आपकी राह देख रहा है। हम किसी को मारना नहीं चाहते, लेकिन जब आप बंदूक से निर्दोषों को मारते हो, तो रक्षा शासन की जिम्मेदारी बनती है-छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार दोनों की।

अब 90 प्रतिशत क्षेत्र नक्सल-मुक्त हो चुका है। हम 31 मार्च, 2026 से पहले माओवाद को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। लेकिन जनता इस विचारधारा को समझे, जहां कम्युनिस्ट शासन रहा, वहां विकास नहीं हुआ। वनवासी कल्याण के नाम पर हथियार थमाकर अंधकार फैला दिया गया। इसलिए यह विचारधारा विनाश की द्योतक है। देश को तुरंत इससे मुक्ति जरूरी है। वैसे भी, राजनीति में कम्युनिस्ट अब बचे नहीं, दूरबीन लगाकर देखना पड़ता। त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल में तो बचे नहीं, बस केरल में थोड़े बचे हुए हैं, लेकिन वहां भी त्रिवेंद्रम से जनता ने शुरुआत कर दी है। इसी चुनाव में जनता उन्हें समाप्त कर देगी।

प्रभु श्रीराम का ननिहाल छत्तीसगढ़ पूरे देश के लिए शुभंकर बनेगा, मेरा पूर्ण विश्वास है। मोदी जी ने 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य 130 करोड़ भारतीयों के समक्ष रखा है। ऐसे भारत का निर्माण करना है, जो दुनिया में हर क्षेत्र में शीर्ष पर हो, लेकिन छत्तीसगढ़ को छोड़कर यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता। मुझे विश्वास है कि विकसित छत्तीसगढ़ इसका अग्रदूत बनेगा। छत्तीसगढ़ की जनता ने बार-बार भाजपा व विकास की राजनीति को आशीर्वाद दिया है। हम इसे लाल आतंक से मुक्त कर नंबर एक राज्य बनाएंगे। पिछले 25 वर्ष का ट्रैक रिकॉर्ड अगले 25 वर्ष में दोगुनी गति से आगे बढ़ेगा।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषसामाजिक मानकलाल आतंकसुशासन के मानकविकास और अर्थव्यवस्थास्वास्थ्य सुधारजीएसडीपी (GSDP)एकलव्य आवासीय विद्यालयआर्थिक बैरोमीटकृषि और सिंचाईखनिज समृद्धिमाओवाद और सुरक्षाआत्मसमर्पणविचारधारा-जन्य समस्यासुशासनरेड कॉरिडोरप्रति व्यक्ति आयउन्मूलन
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