जानिए भारत और थाईलैंड के सालों पुराने रिश्ते का आधुनिक महत्व
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जानिए भारत और थाईलैंड के सालों पुराने रिश्ते का आधुनिक महत्व

रामायण का थाई संस्करण ‘रामाकियन’ केवल अनुवाद नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक पुनर्व्याख्या है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुरूप ढली हुई है। संस्कृत और पाली भाषाओं ने थाई भाषा को समृद्ध किया, जिससे साहित्य, दर्शन और धार्मिक ग्रंथों की परंपरा को नया आयाम मिला।

Written byMahak SinghMahak Singh
Feb 14, 2026, 09:40 am IST
inभारत
थाईलैंड के पूर्व विदेश मंत्री डॉ. मारिस संगियामपोंगसा

थाईलैंड के पूर्व विदेश मंत्री डॉ. मारिस संगियामपोंगसा

भारत और थाईलैंड के बीच संबंध केवल आधुनिक राजनीतिक समीकरणों या कूटनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें एक प्राचीन और समृद्ध सभ्यतागत परंपरा में गहराई से समाई हुई हैं। दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक संपर्क ने सदियों से एक-दूसरे को समृद्ध किया है। इसी साझा विरासत और निरंतरता को उजागर करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र (International Centre for Cultural Studies – CCS) द्वारा सेवा इंटरनेशनल एवं उत्तमजन फैमिली ट्रस्ट के संयुक्त सहयोग से राष्ट्रीय संग्रहालय सभागार, जनपथ, नई दिल्ली में प्रो. के.के. मित्तल स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस वर्ष का विषय “भारत और थाईलैंड (सियाम) के बीच सभ्यतागत निरंतरता” रखा गया, जिसमें दोनों देशों के बहुआयामी संबंधों पर गहन और विचारोत्तेजक विमर्श हुआ। कार्यक्रम में थाईलैंड के पूर्व मंत्री डॉ. मैरिस सांगियाम्पोंगसा ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

प्राचीन समुद्री सेतु और सांस्कृतिक संबंध

भारत और थाईलैंड का संबंध आज की राजनीति से कहीं पहले का है, उस काल का जब राष्ट्र-सीमाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित भी नहीं थीं। उस समय बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर दूरी की बाधा नहीं, बल्कि संपर्क और संवाद के सेतु हुआ करते थे। इन समुद्री मार्गों के माध्यम से व्यापारी, बौद्ध भिक्षु, विद्वान और शिल्पकार एक-दूसरे के देशों में निरंतर आवागमन करते थे। वे केवल व्यापारिक वस्तुएँ ही नहीं लाते थे, बल्कि अपने साथ ज्ञान, संस्कार, नैतिक मूल्य और सह-अस्तित्व की भावना भी लेकर आते थे, जिससे दोनों सभ्यताओं के बीच एक गहरा सांस्कृतिक और मानवीय रिश्ता स्थापित हुआ।

आध्यात्मिक जुड़ाव

इस ऐतिहासिक संपर्क का मूल आधार बौद्ध मत था, जिसने दो सहस्राब्दियों से अधिक समय तक भारत और सियाम (थाईलैंड) को सभ्यतागत रूप से जोड़े रखा। बौद्ध विचारधारा ने थाई समाज की शासन व्यवस्था, नैतिक परंपराओं, शिक्षा प्रणाली और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। करुणा, मध्यम मार्ग और प्रज्ञा जैसे सिद्धांत केवल धार्मिक उपदेश नहीं रहे, बल्कि सार्वजनिक जीवन और प्रशासन की नींव बने। यही कारण है कि यह संपर्क केवल राजनीतिक बदलावों तक सीमित न रहकर जनता के बीच स्थायी संबंधों के रूप में विकसित हुआ।

भारतीय सभ्यता का थाई प्रभाव

भारतीय बौद्ध और हिंदू परंपराएँ थाईलैंड में जीवंत रूप में विकसित हुईं। रामायण का थाई संस्करण ‘रामाकियन’ केवल अनुवाद नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक पुनर्व्याख्या है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुरूप ढली हुई है। संस्कृत और पाली भाषाओं ने थाई भाषा को समृद्ध किया, जिससे साहित्य, दर्शन और धार्मिक ग्रंथों की परंपरा को नया आयाम मिला। इन सभ्यतागत आदान-प्रदानों ने ऐसे साझा मूल्य विकसित किए- संघर्ष के स्थान पर सामंजस्य, नेतृत्व में नैतिक संयम, ज्ञान का सम्मान और यह विश्वास कि शक्ति को धर्म व नैतिकता के मार्गदर्शन में ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

प्राचीन मूल्य और आधुनिक मार्गदर्शन

आज जब हम तीव्र परिवर्तन और अनिश्चितता के युग में जी रहे हैं, तब ये प्राचीन मूल्य और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। तकनीक अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है, परंतु ज्ञान, विवेक और नैतिकता उतनी तेज़ी से विकसित नहीं हो पा रही। ऐसे समय में भारत और थाईलैंड के ऐतिहासिक संबंध हमें समकालीन मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। बौद्ध संपर्क को आज मूल्य-आधारित कूटनीति और सांस्कृतिक सहयोग के रूप में पुनर्जीवित किया जा सकता है।

नैतिक नेतृत्व और व्यावहारिक सहयोग

यदि 21वीं सदी एशिया की सदी है, तो उसे केवल आर्थिक शक्ति या तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व से परिभाषित किया जाना चाहिए। बौद्ध मत अहिंसा, परस्पर निर्भरता, संयम और करुणा का मार्ग दिखाता है। एशिया की उन्नति केवल गति से नहीं, बल्कि विवेक से मापी जानी चाहिए। शक्ति बिना बुद्धि के विभाजन लाती है, और बुद्धि बिना शक्ति के सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती। इसलिए एशिया को इन दोनों का संतुलन साधना होगा। यह सभ्यतागत संबंध आज व्यावहारिक सहयोग में भी परिवर्तित हो रहा है। भारत और थाईलैंड शिक्षा, संस्कृति, स्वास्थ्य, आयुर्वेद और थाई पारंपरिक चिकित्सा, डिजिटल नवाचार तथा सतत पर्यटन जैसे क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग कर रहे हैं। दोनों देश तीन प्रमुख सुरक्षा क्षेत्रों में मिलकर कार्य कर रहे हैं- खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा।

क्षेत्रीय सुरक्षा और साझेदारी

खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की कृषि तकनीक और अनाज उत्पादन क्षमता तथा थाईलैंड की धान, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण में विशेषज्ञता मिलकर पूरे क्षेत्र की खाद्य आपूर्ति को सुदृढ़ बना सकती है। ऊर्जा सुरक्षा में सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा में संयुक्त प्रयास एशिया को ऊर्जा आत्मनिर्भर बना सकते हैं। स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में थाईलैंड की मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और भारत की दवा एवं वैक्सीन उत्पादन क्षमता मिलकर पूरे क्षेत्र को स्वास्थ्य संकटों से सुरक्षित रख सकती हैं। इन तीनों क्षेत्रों में सहयोग, बंगाल की खाड़ी क्षेत्र को वैश्विक स्थिरता और विकास का आधार बना सकता है। भारत और थाईलैंड की भौगोलिक स्थिति इन्हें दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के प्राकृतिक प्रवेश द्वार बनाती है। भौतिक संपर्क, डिजिटल नेटवर्क और सभ्यतागत विश्वास के माध्यम से यह साझेदारी न केवल दोनों देशों, बल्कि पूरे एशिया को एक स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की ओर ले जा सकती है।

Topics: India Thailand historical relationsRamayanaरामायणthailandभारत थाईलैंड सांस्कृतिक संबंधIndia Thailand Cultural RelationsरामाकियनIndia Thailand cultural tiesभारत थाईलैंड ऐतिहासिक संबंध
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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