भारत-थाईलैंड के हजारों साल पुराने रिश्तों पर नई दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक विमर्श
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भारत-थाईलैंड के हजारों साल पुराने रिश्तों पर नई दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक विमर्श

डॉ. संगियामपोंगसा ने कहा कि भारतीय सभ्यता का प्रभाव अभी भी थाई समाज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि थाईलैंड की राजकीय परंपराएँ, धार्मिक अनुष्ठान, भाषा और सांस्कृतिक प्रतीक भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरित हैं।

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
Feb 13, 2026, 09:07 pm IST
inदिल्ली
थाईलैंड के पूर्व विदेश मंत्री डॉ. मारिस संगियामपोंगसा

थाईलैंड के पूर्व विदेश मंत्री डॉ. मारिस संगियामपोंगसा

नई दिल्ली: अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र (International Centre for Cultural Studies- CCS) ने सेवा इंटरनेशनल और उत्तमजन फैमिली ट्रस्ट के संयुक्त सहयोग से राष्ट्रीय संग्रहालय सभागार, जनपथ, नई दिल्ली में प्रो. के.के. मित्तल स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया। इस वर्ष का विषय “भारत और थाईलैंड (सियाम) के बीच सभ्यतागत निरंतरता” रहा, जिसमें दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक संबंधों पर गहन विमर्श हुआ।

भारत-थाईलैंड: सभ्यताओं का सेतु

यह स्मृति व्याख्यान भारतीय सभ्यता, संस्कृति और वैश्विक सांस्कृतिक संवाद में प्रो. के.के. मित्तल के योगदान को स्मरण करते हुए आयोजित किया गया। प्रो. मित्तल भारतीय सभ्यतागत अध्ययन के उन विद्वानों में रहे, जिन्होंने भारत को केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और सतत सभ्यता के रूप में समझने का आग्रह किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थाईलैंड के पूर्व विदेश मंत्री डॉ. मारिस संगियामपोंगसा रहे। अपने मुख्य भाषण में उन्होंने कहा कि भारत और थाईलैंड के संबंध केवल कूटनीतिक या रणनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देश एक साझा सभ्यतागत विरासत से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि बौद्ध मत, रामायण परंपरा, संस्कृत और पाली साहित्य, मंदिर वास्तुकला, नृत्य, लोककथा और जीवन मूल्य- इन सभी ने सदियों से भारत और थाईलैंड को जोड़ा है।

भारतीय दृष्टि का वैश्विक प्रभाव

डॉ. संगियामपोंगसा ने कहा कि भारतीय सभ्यता का प्रभाव अभी भी थाई समाज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि थाईलैंड की राजकीय परंपराएँ, धार्मिक अनुष्ठान, भाषा और सांस्कृतिक प्रतीक भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरित हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर पुनर्विचार कर रहे हैं, तब भारत-थाईलैंड जैसे सभ्यतागत संबंध आपसी विश्वास और सहयोग को नई दिशा दे सकते हैं। अतिथि वक्ता श्री अमिताभ डब्ल्यू. मित्तल, निदेशक एवं महासचिव (वेस्ट अमेरिका), उत्तमजन फैमिली ट्रस्ट ने अपने वक्तव्य में प्रो. के.के. मित्तल के वैचारिक अवदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्रो. मित्तल ने भारतीय संस्कृति को आत्मगौरव और आत्मविश्वास के साथ देखने की दृष्टि विकसित की।  प्रो. मित्तल ने कहा कि स्मृति व्याख्यानों का उद्देश्य केवल अतीत को स्मरण करना नहीं, बल्कि उस वैचारिक विरासत को वर्तमान और भविष्य से जोड़ना होता है।

ज्ञान का सभ्यतागत सेतु

उन्होंने यह भी कहा कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के संबंधों को समझने के लिए सभ्यतागत दृष्टिकोण अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक कूटनीति तभी स्थायी और प्रभावी हो सकती है, जब वह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार पर खड़ी हो। ऐसे आयोजनों से युवाओं और शोधकर्ताओं को वैश्विक संवाद में भारतीय दृष्टिकोण को समझने का अवसर मिलता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारत और थाईलैंड के संबंध ज्ञान, भाषा और दर्शन के साझा प्रवाह पर आधारित रहे हैं। उन्होंने संस्कृत को एशियाई सभ्यताओं के बीच सेतु बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने दक्षिण-पूर्व एशिया में सांस्कृतिक एकता और बौद्धिक निरंतरता को जन्म दिया।

सभ्यता का आधुनिक अर्थ

प्रो.वरखेड़ी ने कहा कि आज आवश्यकता है कि भारतीय ज्ञान प्रणालियों को केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि समकालीन संदर्भों में उपयोगी और प्रासंगिक ज्ञान के रूप में देखा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सभ्यतागत अध्ययन राष्ट्रों के बीच संवाद को मानवीय और मूल्य-आधारित बनाता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, शोधार्थी, राजनयिक, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और विद्यार्थी उपस्थित रहे। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि भारत-थाईलैंड संबंधों को केवल आर्थिक और रणनीतिक आयामों तक सीमित न रखते हुए सांस्कृतिक कूटनीति और जन-संवाद के माध्यम से और सुदृढ़ किया जाना चाहिए।

सभ्यता और संस्कृति का संगम

आयोजकों ने बताया कि आईसीसीएस का उद्देश्य ऐसे मंचों के माध्यम से सभ्यतागत विमर्श, सांस्कृतिक अध्ययन और वैश्विक संवाद को प्रोत्साहित करना है। उत्तमजन फैमिली ट्रस्ट ने भी भविष्य में ऐसे आयोजनों के माध्यम से सांस्कृतिक और बौद्धिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। प्रो. के.के. मित्तल स्मृति व्याख्यान न केवल भारत–थाईलैंड संबंधों पर एक गंभीर बौद्धिक संवाद बना, बल्कि यह कार्यक्रम भारतीय सभ्यता की वैश्विक भूमिका और उसकी सतत प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है। इस बार का व्याख्यान सेवा इंटरनेशनल के द्वारा स्पॉन्सर रहा है।

Topics: thailandIndian knowledge traditionICCSIndia Thailand Civilizational RelationsInternational Centre for Cultural StudiesIndia and Thailand Cultural RelationsNational Museum AuditoriumFormer Foreign Minister Dr. Maris SangiampongsaIndian Culture
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