कोझिकोड, 10 फरवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह के अवसर पर सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने संघ के दूरदर्शी मार्ग पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ कार्य का मूल सार है – मानव सामाजिक पूंजी का निर्माण, अर्थात मूल्यों में निहित ऐसे व्यक्ति जो सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित हों।
700 से अधिक युवाओं को किया संबोधित
होसबाले जी वे कोझिकोड में आरएसएस शताब्दी समारोह के हिस्से के रूप में आयोजित ‘प्रेरणा’ कार्यक्रम में उत्तर केरल क्षेत्र के आमंत्रित युवाओं से संवाद कर रहे थे। 700 से अधिक पंजीकृत युवाओं की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जोर दिया कि भले ही भूमि विविध हो, लेकिन संघ का मूल विचार यह है कि हम एक अविभाज्य राष्ट्र हैं। सरकार्यवाह जी ने श्रोताओं को महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी की याद दिलाई: भारत केवल अपने लिए नहीं जाग रहा है, बल्कि विश्व के लिए एक प्रकाशस्तंभ बनने के लिए जाग रहा है। युवाओं के प्रश्नों के उत्तर में सरकार्यवाह जी ने कहा, हमें अपनी आंतरिक चुनौतियों के समाधान के लिए अन्य राष्ट्रों की ओर नहीं देखना चाहिए; हमें समाज को अपनी स्वदेशी समाधान खोजने के लिए सशक्त बनाना होगा।
राष्ट्र प्रथम की विचारधारा
सभी गतिविधियों का आधार है – राष्ट्र प्रथम की विचारधारा। राष्ट्र केवल राजनीतिक नेताओं या प्रमुख व्यक्तियों द्वारा परिभाषित नहीं होता, बल्कि प्रत्येक साधारण नागरिक, उसकी लंबी इतिहास, परंपराओं और इसकी प्रत्येक इंच भूभाग द्वारा परिभाषित होता है। उन्होंने समझाया कि स्वयंसेवकों द्वारा शुरू की गई विभिन्न संबद्ध संगठन संघ कार्य के व्यावहारिक क्षेत्र हैं। ये मंच सभी क्षेत्रों के व्यक्तियों को उनकी रुचि और उपलब्ध समय के अनुसार राष्ट्र-निर्माण में योगदान देने की अनुमति देते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि संघ की निर्णय प्रक्रिया सामूहिक सहमति पर आधारित है, जिसमें सभी क्षेत्रों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। उन्होंने कहा, हमें भारत की बौद्धिक परंपरा को पुनः प्राप्त करना होगा। विदेशी विचारों के अतिक्रमण से हमारी बौद्धिक परंपरा को विस्मृति में धकेला जा रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि सभी विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान पर जोर देने वाली विशेष कुर्सियाँ (चेयर) शुरू की जानी चाहिए। राष्ट्र संघ की सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारतीय संस्कृति में ऋषियों, देवताओं, पितरों, जीवों और मनुष्यों के प्रति पाँच ऋणों के अलावा सामाजिक ऋण भी है। समाज के प्रति यह एक दायित्व है।
सामाजिक ऋण को पूरा करने को देता है महत्व
सरकार्यवाह जी ने कहा कि आरएसएस सामाजिक ऋण को पूरा करने को महत्व देता है। इसके लिए संघ स्वयंसेवक बनाता है। स्वयंसेवक समाज के सभी क्षेत्रों में कार्य करते हैं। कार्य के क्षेत्र अलग-अलग हैं, लेकिन स्वयंसेवकों का मूल विचार नहीं बदलता। आज भारत प्रगति की ओर तेजी से अग्रसर है। एक प्रगतिशील समाज को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आरएसएस राष्ट्र के शरीर के लिए विटामिन प्रदान कर रहा है, सरकार्यवाह ने कहा। इस अवसर पर उत्तर केरल प्रांत संघचालक एडवोकेट के.के. बालाराम, कोझिकोड विभाग संघचालक यू. गोपाल मल्लार और एडवोकेट जयप्रकाश भी उपस्थित थे।

















