स्थापना दिवस पाञ्चजन्य के 79 साल : ‘बच्चों को दें खुद को संभालने वाले संस्कार’
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होम साक्षात्कार

पाञ्चजन्य के 79 साल : ‘बच्चों को दें खुद को संभालने वाले संस्कार’

‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेडी से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. अंशु जोशी ने विस्तार से बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश:

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 11, 2026, 02:42 pm IST
inसाक्षात्कार, दिल्ली, पाञ्चजन्य इवेंट
प्रो. श्रीनिवास वरखेडी से बातचीत करतीं प्रो. अंशु जोशी

प्रो. श्रीनिवास वरखेडी से बातचीत करतीं प्रो. अंशु जोशी

आज विश्व पटल पर विभिन्न क्षेत्रों में बहुत से परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में वसुधैव कुटुंबकम् सूत्र की शक्ति क्या है? भारत के स्तर पर इसे आप कैसे देखते हैं?
भारत की नीति वसुधैव कुटुंबकम की ही है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज हम संबंध बना रहे हैं। देखिए, शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल एक व्यक्ति का अपना निर्वहन नहीं है। व्यक्ति एक समष्टि का अंग है। समष्टि क्या होती है? उस विषय में संस्कार देने का काम शिक्षा का काम है। एक छोटे परिवार में जन्मा व्यक्ति शिक्षा के दौरान धीरे-धीरे एक विश्व मानव बन सकता है। इसलिए शिक्षा का मूल दायित्व है, व्यक्ति निर्माण। यह व्यक्ति निर्माण स्वयं के लिए सीमित न हो। समष्टि केवल एक परिवार नहीं, एक गांव नहीं, एक राष्ट्र मात्र नहीं है। अपितु वसुधैव कुटुंबकम् ही है। इस जगत को एक कुटुंब के रूप में, एक परिवार के रूप में, एक समष्टि के रूप में देखने की दृष्टि भारत ने दी है। आज बहुत से परिवर्तन दुनिया में दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में भारत ने वसुधैव कुटुम्बकम की नीति को अंतरराष्ट्रीय फलक पर केंद्र में रखा है। विश्व ने इसे स्वीकार भी किया है। तो हमारी शिक्षा का जो मूल लक्ष्य है वह इसी में दिखता है।

स्व क्या है? इसके बारे में बताएं ?
पंच परिवर्तन का हमारा विचार शिक्षा से ही जुड़ा है। स्व जो है वह स्व से जुड़ता है। और स्वबोध के कारण परिवर्तन होता है। क्योंकि जब तक हमें स्वबोध नहीं होगा—मैं कौन हूं? मेरा दायित्व क्या है? जब तक ये बातें नहीं समझेंगे, तब तक परिवर्तन संभव नहीं है। मैं से पहले परिवार बोध, समाज बोध, राष्ट्र के बाद पूरा विश्वबोध। इन सभी के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए जाना ही स्वयं का बोध है। फिर सिर्फ मनुष्य को ही नहीं जानना, दुनिया में पशु—पक्षी, प्राणी उन सभी के प्रति प्रकृति रूवरूप बोध। इसमें दायित्व का बोध है। क्योंकि केवल बोध से नहीं होता है, दायित्व के बोध से लक्ष्य को हम पाते हैं। मेरा दायित्व क्या है? समाज के प्रति मेरा दायित्व क्या है? प्रकृति के प्रति मेरा दायित्व क्या है? जब हम इन सभी चीजों को जान लेते हैं, तब ही परिवर्तन संभव है। इसलिए मैं पंच परिवर्तन को दायित्व बोध रूप में देखता हूं।

शिक्षा में जब हम बेटे और बेटियों की बात करते हैं तो एक दृष्टि इस ओर जाती है कि आज भारत में विश्व की कुल आबादी का 22% युवा है। ऐसे में आज के युवाओं की चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं?
निश्चित रूप से भारत युवा देश है। तो हमारे सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। चुनौतियों की बात करें तो इनकी देखभाल कैसे करना है? उनका जीवन स्तर कैसा हो? वह अच्छी शिक्षा कहां से लें? क्योंकि यह सब बातें परिवार और संस्कार से भी आती हैं। कई युवा थोड़े से दबाव में आत्महत्या कर लेते हैं। क्यों ? क्योंकि उनमें अध्यात्म दृष्टि का अभाव है। अब सवाल है कि वे इतने कमजोर क्यों हुए? क्योंकि हमने संकल्पवान नहीं बनाया। संस्कारों का अभाव रहा। इसलिए हमारे जितने भी विश्वविद्यालय के कुलपति या आईआईटी के बड़े-बड़े निदेशकों की चिंता क्या है? पता है आपको? शिक्षा नहीं है। उनकी देखभाल कैसे करना है? क्योंकि मां-बाप ने ऐसे बच्चों को हमारे परिसर में भेजा है, जो स्वयं की देखभाल करने में असमर्थ नजर आते हैं। जब ऐसे युवाओं को उनके माता—पिता परिसर में भेज रहे हैं तो उनके माता—पिता का क्या दायित्व बनता है? मैं मानता हूं कि आप अपने बेटों को ऐसे संभालिए, उन्हें ऐसे संस्कार दीजिए कि जब वह उच्च शिक्षा पा लें तो उसके बाद एक अच्छी दुनिया बना सकें। खुद को और दुनिया को संभाल सकें।

लंबे समय तक हमने मैकाले की शिक्षा प्रणाली में बिताए हैं। इसीलिए हमारे दिमाग अभी भी बंधक बने हुए हैं। लेकिन 2020 में नई शिक्षा नीति आई और उसमें बहुत से परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। इस नीति को केंद्र में रखते हुए भविष्य के भारत निर्माण की दिशा में कैसे बढ़ रहे हैं?
भारत में शिक्षा क्षेत्र में जो बड़ा परिवर्तन हम करने जा रहे हैं, उसके अनुष्ठान का आरंभ हो चुका है। यह बहुत बड़ी बात है। पिछले पांच साल से सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी अनेक विभूतियां इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। रही बात मैकाले की शिक्षा पद्धति की तो वह व्यवस्था दास बनाने की है। लेकिन आज हम इससे बाहर आए हैं। इसके लिए हमें आत्मबोध होना जरूरी है। मैं भारतीय हूं, हमारी परंपरा क्या है, हमारा दायित्व क्या है? जब हम यह जानने लगेंगे तो मैकाले की शिक्षा व्यवस्था को तोड़ने लगेंगे। इसका एक ही रास्ता है आत्म बोध।

पाञ्चजन्य की ओर से महात्मा गांधी जी को श्रद्धांजलि

कार्यक्रम के समापन सत्र की शुरुआत में पाञ्चजन्य की ओर से महात्मा गांधी जी की पुण्यतिथि पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस दौरान पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने कहा कि पाञ्चजन्य भगवान श्री कृष्ण जी का शंख है। भगवान कृष्ण का जैसा जीवन था वैसा ही पाञ्चजन्य का भी रहा। अवतरित होने के बाद ही श्रीकृष्ण को पूतना वाला स्नेह मिला, और पाञ्चजन्य के साथ भी ऐसा ही संयोग। 1948 में गांधी जी जैसे ही हत्या हुई तो पाञ्चजन्य को भी सरकारी प्रताड़ना सहनी पड़ी।

बहुत से लोग इसे राजनीति के चश्मे से देखते हैं। लेकिन देश के महापुरुषों के लिए कड़वाहट रखकर, उन्हें खंड-खंड दृष्टि से देखकर आगे नहीं बढ़ सकते। गत 22 जनवरी को केंद्र सरकार की ओर से सरकारी कार्यालयों के लिए एक आदेश जारी हुआ, जिसका भाव था कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान देने वाले हुतात्माओं की स्मृति के तौर पर उन्हें याद करें तो वास्तविक रूप से हम उस संग्राम और बलिदान को समझ सकेंगे। ऐसे में पाञ्चजन्य अपने सभी महापुरुषों और बलिदानियों को स्मरण करते हुए उनके प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करता है।

Topics: युवा शक्तिअध्यात्म दृष्टिशिक्षा एवं संस्कारमैकाले की शिक्षा प्रणालीराष्ट्रीय शिक्षा नीतिदायित्व बोध‘व्यक्ति निर्माण’संकल्पवानहुतात्मासामाजिक एवं राष्ट्रवादपाञ्चजन्य विशेषFATUREDपंच परिवर्तन
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