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होम भारत

बजट 2026-27 : भारत बनेगा विश्व वैद्य!

हालिया बजट में स्वास्थ्य को केवल कल्याण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का आधार बनाया है। चिकित्सा सुधार, मेडिकल टूरिज्म और कर नीतियों के माध्यम से भारत स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ी भूमिका की ओर निर्णायक कदम बढ़ा रहा है

Written byआलोक पुराणिकआलोक पुराणिक
Feb 10, 2026, 08:10 am IST
in भारत, विश्लेषण
केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मल सीतारमण

केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मल सीतारमण

संस्कृत सूक्ति है-
धर्मार्थकाममोक्षाणां आरोग्यं मूलमुत्तमम्। आरोग्यं हि परं लाभं शेषाण्यन्यानि दुःखदम्॥
इसका अर्थ हुआ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार पुरुषार्थों का मूल उत्तम स्वास्थ्य है। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा लाभ है, अन्य सब लाभ दुःख देने वाले हो सकते हैं।

स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था अब भारतीय अर्थव्यवस्था को स्वास्थ्य पर्यटन का केंद्र बनने में भी मदद करेगी। हाल में आए बजट में घोषणा की गई है कि पांच क्षेत्रीय मेडिकल केंद्र विकसित किये जाएंगे, जो स्वास्थ्य पर्यटन के विकास में मदद करेंगे। पूर्वी दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अफ्रीका, अरब देशों से आए लोग देखे जा सकते हैं। ये लोग अपने किसी स्वजन के किसी आपरेशन के लिए आते हैं। अमेरिका जाना बहुत महंगा है, भारत में गुणवत्ता वाली चिकित्सा किफायती दरों पर मिल जाती है। धीमे-धीमे भारत वैश्विक स्वास्थ्य पर्यटन में अपनी मजबूत जगह बना रहा है।

बजट भाषण में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा,“भारत को चिकित्सा पर्यटन सेवा केंद्र के रूप में बढ़ावा देने के लिए, मैं निजी क्षेत्र की साझेदारी में पांच क्षेत्रीय चिकित्सा केंद्रों की स्थापना के लिए राज्यों को सहायता प्रदान करने की एक योजना का शुभारंभ करने का प्रस्ताव करती हूं। ये केंद्र एकीकृत स्वास्थ्य सेवा परिसरों के रूप में सेवा प्रदान करेंगे, जिनमें चिकित्सा, शैक्षिक और अनुसंधान सुविधाएं होंगी। इनमें नैदानिक, बाद के देखभाल और पुनर्वास के लिए आयुष केंद्र, चिकित्सा मूल्य पर्यटन सुविधा केंद्र होंगे।”

अब आएंगे, जाएंगे नहीं

वित्त मंत्री के इस बयान के गहरे निहितार्थ हैं। भारत अब वह देश नहीं रहा, जहां के मरीज बेहतर सेहत सुविधाओं की तलाश में अमेरिका या ब्रिटेन जाएं। अब दुनिया भर के लोग भारत आएं, जहां सस्ता इलाज बेहतर तरीके से संभव है। हाल के बजट ने और उससे पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण में स्वास्थ्य पर कुछ विशेष बातें की गई हैं। स्वास्थ्य केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि एक समृद्ध राष्ट्र की नींव है। बजट के अनुसार भारत ने अपने स्वास्थ्य बजट में रणनीतिक बदलाव करते हुए ‘सस्ती और सुलभ चिकित्सा’ पर ध्यान केंद्रित किया है। भारत में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कैंसर का इलाज न केवल शारीरिक रूप से थका देने वाला होता है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल सकता है। सरकार ने महत्वपूर्ण कैंसर दवाओं पर सीमा शुल्क को पूरी तरह से हटा दिया है। यह कदम सीधे तौर पर अस्पताल के बिलों को कम करेगा।

जब हम देश को ‘मेडिकल टूरिज्म’ हब बनाने की बात करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सेवा की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल खाती हो। साथ ही, सार्वजनिक अस्पतालों में भीड़ कम करने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना होगा ताकि एम्स जैसे संस्थानों पर बोझ कम हो सके। दवाओं के दाम केवल आयात शुल्क कम करने से स्थायी रूप से कम नहीं होंगे। भारत को ‘फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड’ से बढ़कर ‘डिस्कवरी लैब ऑफ द वर्ल्ड’ बनना होगा। बजट इस संबंध में बात करता है। बजट में देश को मेडिकल टूरिज्म का हब बनाने के लिए 5 नए केंद्र खोलने की घोषणा की गई है। यह भारत को पुनः ‘विश्व-वैद्य’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश है।

दवाओं की स्वदेशी उपलब्धता

दवाओं के दाम कम करने के साथ-साथ सरकार घरेलू स्तर पर इनके उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान और विकास) में निवेश कर रही है। भारत की चिकित्सा प्रणाली ‘पश्चिमी गुणवत्ता’ और ‘पूर्वी लागत’ का एक अनूठा संगम है। इसी का लाभ उठाने के लिए 5 नए मेडिकल हब स्थापित करने की घोषणा की गई है। इन केंद्रों के माध्यम से विदेशों से आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ेगी, जिससे देश को मूल्यवान विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी। इन केंद्रों को विश्व स्तरीय रोबोटिक सर्जरी, उन्नत इमेजिंग और सटीक दवा वितरण प्रणालियों से लैस किया जाएगा, जिसका लाभ स्थानीय भारतीय नागरिकों को भी मिलेगा।

मन का इलाज भी

मानसिक स्वास्थ्य लंबे समय से उपेक्षित रहा है। भारत अब मानसिक रोगों को भी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में स्वीकार कर रहा है। बजट से पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण में विस्तार से भारतीय स्वास्थ्य चुनौतियों को रेखांकित किया गया है। सर्वेक्षण में दर्ज किया गया है कि भारत में मोटापा और डिजिटल व्यसन बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। डिजिटल व्यसन का रिश्ता मानसिक स्वास्थ्य से है। डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के तहत मानसिक परामर्श को घर-घर तक पहुंचाया जा रहा है।

महत्वपूर्ण बिंदु

  • 70 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिकों को आयुष्मान भारत योजना में शामिल किया गया है। इससे वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा का बड़ा लाभ मिलेगा
  • स्वास्थ्य अवसंरचना में निवेश से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों का विस्तार।
  • डिजिटल हेल्थ और ऐप आधारित नामांकन से पारदर्शिता और सुविधा।
  •  फार्मा और बायोटेक सेक्टर को बढ़ावा देकर भारत को वैश्विक हेल्थकेयर हब बनाने की दिशा।

कर सुधार

पिछले कुछ वर्षों में लिबराइज्ड रिमीटेंस स्कीम –एलआरएस के तहत विदेशों में पैसा भेजने पर लगने वाला टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स-टीसीएस एक बड़ा मुद्दा बना हुआ था। सरकार ने इसमें कटौती कर उन परिवारों को बड़ी राहत दी है जिनके बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं या जो पर्यटन के लिए बाहर जाते हैं।

शिक्षा के लिए राहत

विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करना अब केवल अमीरों का सपना नहीं रहा। शिक्षा ऋ ण और ट्यूशन फीस के लिए भेजी जाने वाली राशि पर के बोझ को कम करना मेधावी छात्रों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन है। इस पर कर की दर को घटाकर दो प्रतिशत कर दिया गया है। विदेश यात्रा पर लगने वाले कर को कम करने से मध्यम वर्ग के परिवारों को वैश्विक ‘एक्सपोजर’ मिलता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से उनकी जीवनशैली और कार्यक्षमता में सुधार करता है। कर सुधार और स्वास्थ्य सेवाओं में मजबूती केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं, बल्कि ये एक नए भारत की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब हैं। टीसीएस की कम दरें छात्रों को वैश्विक नागरिक बनने का अवसर दे रही हैं, तो कैंसर दवाओं की सुलभता जीवन जीने की नई उम्मीद जगा रही है। आने वाले दशक में, ये नीतियां भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित होंगी।

सट्टेबाजी पर सर्जिकल स्ट्राइक

सरकार ने इस बार साफ कर दिया है कि शेयर बाजार को ‘जुआघर’ नहीं बनने दिया जाएगा। वर्ष 2026 का केंद्रीय बजट पेश होते ही शेयर बाज़ार में हड़कंप मच गया। सरकार ने फ्यूचर और ऑप्शन ट्रेडिंग पर सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स बढ़ाने की घोषणा की। इस कदम का सीधा असर बाजार पर पड़ा और सेंसेक्स लगभग 1,500 अंक गिर गया। फ्यूचर और ऑप्शन मूल रूप से जोखिम प्रबंधन का साधन हैं, लेकिन भारत में इन्हें बड़े पैमाने पर सट्टेबाज़ी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सिक्योरटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया के हालिया अध्ययन ने यह साफ किया है कि 93 प्रतिशत व्यक्तिगत इंट्रा-डे ट्रेडर घाटा खाते हैं, जबकि केवल 7 प्रतिशत ही लाभ कमा पाते हैं। औसतन प्रत्येक ट्रेडर को लगभग दो लाख रुपए का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा बताता है कि सट्टा आम निवेशकों के लिए लाभकारी नहीं बल्कि जोखिम भरा खेल है।

बजट के कुछ ही दिनों बाद भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा ने बाजार को नई ऊर्जा दी। सेनसेक्स फिर उछल गया। विशेषज्ञों का मानना है कि सट्टेबाजी पर कर वृद्धि से अल्पकाल में कारोबार घट सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह कदम बाजार को स्थिर बनाएगा।

शेयर बाजार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का दर्पण होता है। यह निवेशकों के विश्वास, कंपनियों की स्थिति और नीतिगत वातावरण को दर्शाता है। लेकिन जब इसमें सट्टेबाज़ी हावी हो जाती है, तो इसका असर न केवल निवेशकों पर बल्कि पूरे आर्थिक ढांचे पर पड़ता है।

अस्थिरता और कृत्रिम उतार-चढ़ाव

सट्टेबाजी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव बाजार की अस्थिरता है। जब निवेशक वास्तविक मूल्यांकन के बजाय केवल अनुमान और अफवाहों के आधार पर सौदे करते हैं, तो शेयर की कीमतें कृत्रिम रूप से ऊपर-नीचे होती हैं। इससे कंपनियों का असली प्रदर्शन छिप जाता है और निवेशकों को गलत संकेत मिलते हैं।

दीर्घकालीन निवेश पर असर

सट्टेबाजी से दीर्घकालीन निवेश का महत्व घट जाता है। जब बाजार में लगातार कृत्रिम उतार-चढ़ाव होते हैं, तो गंभीर निवेशक भी असमंजस में पड़ जाते हैं। शेयर बाजार कंपनियों की वास्तविक स्थिति और निवेशकों के विश्वास को दर्शाता है। लेकिन जब इसमें सट्टेबाज़ी का बोलबाला हो जाता है, तो यह आईना धुंधला पड़ जाता है। हाल के वर्षों में फ्यूचर और ऑप्शन ट्रेडिंग ने छोटे निवेशकों को आकर्षित किया है। त्वरित लाभ की चाह में वे इस जोखिम भरे खेल में उतरते हैं, और परिणामस्वरूप अपनी पूंजी गंवा बैठते हैं। छोटे निवेशकों पर इसका असर और भी गंभीर है। वे अक्सर कर्ज लेकर ट्रेडिंग करते हैं और घाटा होने पर आर्थिक संकट में फंस जाते हैं। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि सामाजिक स्तर पर भी असुरक्षा और असंतोष को जन्म देती है। सरकार ने हाल के बजट में सट्टेबाजी पर कर बढ़ाकर सट्टेबाज़ी पर लगाम लगाने की कोशिश की है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकाल में इससे ट्रेडिंग वॉल्यूम घट सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह कदम बाजार को स्थिर बनाएगा। निवेशक लंबी अवधि के निवेश की ओर बढ़ेंगे और कंपनियों को स्थिर पूंजी मिलेगी।

चिकित्सा पर्यटन की तैयारी

बजट में चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा देने की बात कही गयी है। पर सवाल यह है कि क्या भारत का चिकित्सा क्षेत्र विदेशों से आनेवाले मरीजों को बेहतरीन सुविधा देने के लिए तैयार है।
भारत में पिछले कुछ दशकों में निजी क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण चिकित्सा संस्थान उभरे हैं। अपोलो, मैक्स हेल्थकेयर,फोर्टीस, नारायण हृदयालय, मेदांता जैसे संस्थान अब दुनिया भर में अपना ब्रांड बना चुके हैं। चिकित्सा में सबसे बड़ा मुद्दा विश्वसनीयता का होता है। भारतीय चिकित्सकों की गुणवत्ता पूरी दुनिया में मानी जाती है और यह किफायती भी है। भारतीय चिकित्सा अमेरिका और यूरोप के मुकाबले बहुत किफायती है। इसलिए पश्चिमी देशों के मरीज भी भारत आकर अपना इलाज करवाने को उत्सुक होंगे, खासकर वो जो किफायती इलाज चाहते हैं। मध्यपूर्व के देशों और अफ्रीका से तो मरीज लगातार भारत में आकर अपना इलाज करवा रहे हैं। चिकित्सा पर्यटन इस बजट से पैदा हुआ विचार नहीं है। इसकी तैयारियां काफी पहले से ही चल रही हैं। मेडिकल वीजा, डिजिटल हेल्थ और आयुर्वेदिक वेलनेस पैकेजों के कारण इस क्षेत्र में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और मजबूत होगी।

  • वैश्विक स्थिति: भारत दुनिया के शीर्ष 10 मेडिकल टूरिज्म ठिकानों में शामिल है।
  • राजस्व: मेडिकल टूरिज्म से भारत को 2023–24 में लगभग 12 अरब अमेरिकी डॉलर की आय हुई। पांच साल में यह बढ़कर 22 अरब डालर तक पहुंच सकता है।
  • प्रमुख उपचार: कार्डियक सर्जरी, ऑर्थोपेडिक (जोड़ प्रत्यारोपण), कैंसर उपचार, न्यूरोसर्जरी, कॉस्मेटिक सर्जरी और आयुर्वेद/योग आधारित वेलनेस सेवाएं।
  • नाइजीरिया, केन्या, तंजानिया,ओमान, यूएई, सऊदी अरब, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका,अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी देशों से सबसे ज्यादा लोग भारत में उपचार के लिए आते हैं।
Topics: तुलनात्मक लाभराष्ट्र निर्माणविदेशी मुद्रा का स्रोतमेडिकल टूरिज्मकार्डियक सर्जरीरोबोटिक सर्जरीसट्टेबाजीपाञ्चजन्य विशेषनिवेशक सुरक्षाकल्याणकारी योजनाक्षेत्रीय चिकित्सा केंद्रएकीकृत दृष्टिकोणअनुसंधान और आयुषअर्थव्यवस्थाकैंसर उपचारआयुष्मान भारतवरिष्ठ नागरिक सुरक्षाशेयर बाजार
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