सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को एक पर्सनल एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश चुनाव आयोग (ईसी) की उन शिकायतों के जवाब में आया है, जिसमें कहा गया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कार्यकर्ता और राज्य सरकार से जुड़े लोग स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) यानी वोटर लिस्ट की विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया को जानबूझकर रोकने, लंगड़ा करने और नाकाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव आयोग की मुख्य शिकायतें
ईसी ने अपनी एफिडेविट में बताया कि 12 राज्यों में एसआईआर चल रहा है, लेकिन सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही रूलिंग पार्टी के लोगों की तरफ से ऐक्टिव तरीके से रुकावट और धमकियां आ रही हैं। आयोग का कहना है कि राज्य सरकार, कुछ चुने हुए प्रतिनिधि और पार्टी के कार्यकर्ताओं की मिलीभगत से सिस्टेमैटिक और प्लान्ड तरीके से एसआईआर को डिसरप्ट करने की कोशिश हो रही है। हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं—चाहे वो सही हों या गलत—ताकि ये प्रक्रिया रुक जाए या फेल हो जाए।
ईसी ने खास तौर पर राज्य सरकार की नॉन-कोऑपरेशन और निष्क्रियता का जिक्र किया। साथ ही टीएमसी कार्यकर्ताओं की तरफ से ईसी के अधिकारियों को धमकियां देने और हिंसा की आशंका जताई। कुछ जगहों पर दस्तावेज जलाने या सुनवाई स्थलों पर हिंसक घटनाओं की बात भी कही गई, जिससे कुछ अधिकारी ड्यूटी से हटने को मजबूर हुए।
चुनाव आयोग का बयान
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में चुनाव आयोग की दलीलों को पेश किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की तरफ से जानबूझकर नॉन-कोऑपरेशन और निष्क्रियता दिखाई जा रही है। साथ ही ये संदेश दिया कि संविधान सब राज्यों पर बराबर लागू होता है, और कोई भी संवैधानिक पदाधिकारी चुनाव आयोग अधिकारियों को धमकी नहीं दे सकता।
चुनाव आयोग के वकील डी एस नायडू ने भी कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार सहयोग नहीं कर रही और एसआईआर के लिए डेपुटेड अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों पर कोई एक्शन नहीं ले रही।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और निर्देश
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस ज्योमलया बागची और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने ये सुनवाई की। कोर्ट ने राज्य के डीजीपी को पर्सनल एफिडेविट दाखिल करने को कहा, जिसमें ईसी की इन सभी आरोपों का जवाब देना होगा। बेंच ने अपनी 19 जनवरी 2026 की पुरानी ऑर्डर का हवाला दिया, जिसमें डीजीपी, एसपी और कलेक्टर्स को लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने का सख्त निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि राज्य भूमि के कानूनों को याद रखेगा।” इससे साफ इशारा है कि चुनाव के दौरान ईसी की प्रधानता बनी रहेगी।
कोर्ट ने पूर्व चीफ सेक्रेटरी मनोज पंत (ममता बनर्जी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी) को भी निर्देश दिया कि वे ये चेक करें कि ईसी की शिकायतों पर राज्य के डेपुटेड अधिकारियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई हुई या नहीं। ईसी को ये छूट दी गई कि अगर कोई डेपुटेड अधिकारी काम नहीं कर रहा या निर्देशों के खिलाफ जा रहा है, तो उसे एसआईआर काम से हटाकर बदला जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस पावर पर आखिरी फैसला वो खुद लेगी।















