स्वदेशी जागरण मंच केंद्रीय बजट 2026-27 का स्वागत करता है। इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ‘टैरिफ’ की वजह से वैश्विक चुनौतियों और अनिश्चित वैश्विक बाजार के बावजूद और बड़ी आर्थिक ताकतों द्वारा जरूरी खनिज, सेमीकंडक्टर और कई दूसरी चीजों की आपूर्ति सहित ‘ग्लोबल वैल्यू चेन’ को हथियार बनाने की कोशिशों के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था काफी अच्छी हालत में है। यही नहीं, लगातार चौथे साल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है।
गिरता रुपया, लगातार व्यापार और भुगतान शेष घाटा, और बढ़ते सार्वजनिक निवेश के साथ निजी निवेश बढ़ने की संभावना के बारे में अनिश्चितता ने वित्त मंत्री के लिए कई चिंताएं खड़ी की हैं, जिनमें से कुछ को आर्थिक सर्वेक्षण में भी बताया गया है। ऐसा लगता है कि बजट में नीति की बड़ी दिशा साफ है कि भारत न केवल खुद को वैश्विक उथल-पुथल से बचाने की कोशिश करेगा, बल्कि उत्पादकता को मजबूत करके अर्थव्यवस्था को आगे भी ले जाएगा, सिर्फ मजबूती के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक अहम खिलाड़ी बनने के लिए भी।
सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ मटीरियल, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट, केमिकल और कैपिटल गुड्स समेत सात रणनीतिक क्षेत्रों को समर्थन और मजबूत करने के लिए बजट प्रस्ताव एक अच्छा कदम है, जिसका उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत बनाना है। लंबे समय से भारत इन सामान की आपूर्ति के लिए दूसरे देशों, खासकर चीन पर निर्भर रहा है। बजट में इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश की गई है, और इन क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने की रणनीति बनाई गई है। इससे न सिर्फ चीन पर हमारी निर्भरता कम होगी, बल्कि अर्थव्यवस्था को बड़ी ताकतों द्वारा शोषण से भी बचाया जा सकेगा, जो ‘ग्लोबल वैल्यू चेन’ को हथियार बनाने की कोशिश कर रही हैं।

केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ‘रेयर अर्थ मटीरियल’ की आपूर्ति को लेकर चीन के नखरे झेल रही है। ऐसा नहीं है कि भारत में ‘रेयर अर्थ मटीरियल’ की कमी है, बल्कि हमारे पास इन जरूरी खनिज के खनन, प्रसंस्करण और उत्पादन में क्षमता की कमी है। बजट में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे खनिजों के धनी राज्यों में ‘डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर’ बनाने और उनका खनन, प्रसंस्करण, शोध और उत्पादन को बढ़ावा देने में मदद का प्रावधान एक अच्छा कदम है।
देश में कंटेनरों की भारी कमी और चीन पर भारी निर्भरता को देखते हुए, बड़े बजट के साथ दुनिया भर में मुकाबला करने वाला ‘कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम’ बनाने की घोषणा एक बड़ा कदम है।
उत्पादन को एक और बड़ा बढ़ावा बायो-फार्मास्युटिकल्स में मिला है। यह ध्यान देने वाली बात है कि बायो—फार्मास्युटिकल्स, जिसमें बायोसिमिलर भी शामिल हैं, कैंसर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन, किडनी की बीमारी और कई दूसरे गैर—संचारी रोगों के इलाज में क्रांति ला सकते हैं, जिससे न केवल बीमारी का बोझ कम हो सकता है, बल्कि स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो सकता है। श्रम प्रधान वस्त्र उद्योग के लिए एक व्यापक योजना बजट में एक बड़ा कदम है। इसके अलावा, ‘महात्मा गांधी ग्राम स्वराज’ पहल की शुरुआत से खादी और हैंडलूम को मजबूती मिलेगी। इसके अलावा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को समर्थन करने के लिए 10,000 रुपए का आवंटन भी एक स्वागत योग्य कदम है।
बजट में पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) को बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपए करने का प्रस्ताव है, जिसमें प्रभावी कैपेक्स जीडीपी का 4.4 प्रतिशत होगा, जो न सिर्फ अब तक का सबसे अधिक है, बल्कि राजकोषीय घाटे से भी ज्यादा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, और हम कह सकते हैं कि सरकार उपभोग के लिए नहीं, बल्कि असल में ढांचागत और दूसरी पूंजीगत परिसंपत्तियां बनाने के लिए उधार ले रही है। नए ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर’ और 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग हमारी ढांचागत सुविधाओं को काफी बढ़ावा दे सकते हैं। प्रस्तावों का एक और जरूरी हिस्सा विकसित भारत के लिए पेशेवर तैयार करना है। स्वास्थ्य क्षेत्र में अगले पांच वर्ष में 1,00,000 सहायक स्वास्थ्य पेशेवर, 1.5 लाख केयरगिवर्स, और 20,000 वेटेरिनरी पेशेवरों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। ये कुछ ऐसी पहलें हैं, जो कौशल के अंतराल को दूर करने के लिए आवश्यक हैं, और हमारे युवाओं की रोजगार प्राप्त करने की क्षमता को बेहतर बनाने में बहुत मदद कर सकती हैं।
किसानों की आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से बजट में मत्स्ययन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों का एकीकृत विकास, तटीय इलाकों में ‘फिशरीज वैल्यू चेन’ को मजबूत करना, स्टार्टअप्स और महिला समूहों को फिश फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन्स (एफपीओ) से जोड़ना, क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी प्रोग्राम लागू करना, और लाइवस्टॉक फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन्स जैसे उद्यमिता विकास कार्यक्रमों के माध्यम से पशुपालन क्षेत्र को समर्थन करना शामिल है। लाइवस्टॉक उद्यमों को आधुनिक बनाने और डेयरी और पोल्ट्री के लिए एकीकृत मूल्य शृंखला विकसित करने की भी योजना है।
इसके अलावा तटीय इलाकों में नारियल, चंदन, कोको और काजू जैसी फसलों के साथ उच्च मूल्य कृषि को बढ़ावा दिया जाएगा। पहाड़ी इलाकों में बादाम, अखरोट और पाइन नट्स जैसे उत्पाद भी गांव की आमदनी बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर, 2 प्रतिशत से कम महंगाई और लगातार घटता राजकोषीय घाटा, यह दिखाता है कि अर्थव्यवस्था काफी मजबूत स्थिति में है। हालांकि, गिरता रुपया, वैश्विक उथल-पुथल, टैरिफ और वैल्यू चेन के हथियार बनने जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, जिन्हें केंद्रीय बजट 2026-27 में सुलझाने की कोशिश की गई है। बजट में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 प्रतिशत (संशोधित अनुमान) से घटाकर 4.3 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है। इससे महंगाई को नियंत्रण में रहने का एक और कारण मिलता है।
कुल मिलाकर, यह बजट उत्पादन, ढांचागत सुविधाओं और रोजगार में बढ़ोतरी को बढ़ावा देता हुआ, कौशल अंतराल को भरता हुआ लगता है। यह गांवों और किसानों को मजबूत बनाते हुए महंगाई को नियंत्रित करने और उच्च मूल्य कृषि और खाद्य प्रसंस्करण के जरिए आमदनी बढ़ाने की भी कोशिश करता है।
निराशाजनक बजट : बीएमएस
गत 1 फरवरी को भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के महामंत्री रविन्द्र हिमते ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर केंद्रीय बजट को असंतुलित और निराशाजनक बताया। यहां उस विज्ञप्ति को प्रकाशित किया जा रहा है-
भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने केंद्रीय बजट 2026-27 का गहन एवं आलोचनात्मक अध्ययन किया। यद्यपि यह बजट, जो पहली बार रविवार के दिन प्रस्तुत किया गया, अवसंरचना विस्तार, औद्योगिक विकास और कौशल निर्माण के माध्यम से आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित है, लेकिन यह श्रमिकों की आजीविका, वेतन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े बुनियादी मुद्दों को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। बीएमएस कंटेनर निर्माण, मेगा टेक्सटाइल पार्क, खेल सामग्री निर्माण, 200 पारंपरिक औद्योगिक क्लस्टरों के पुनरुद्धार, नए मालभाड़ा व उच्च गति रेल गलियारों, अंतर्देशीय जलमार्गों, वाराणसी एवं पटना में जहाज मरम्मत सुविधाओं, पूर्वी क्षेत्र में औद्योगिक कॉरिडोर तथा पूंजीगत व्यय में वृद्धि जैसे प्रस्तावों का संज्ञान लेता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण, श्रम, कौशल विकास, रक्षा एवं डीआरडीओ के लिए बढ़े आवंटन भी नोट किए गए हैं।
हालांकि वस्त्र, मत्स्य पालन, एमएसएमई, पर्यटन, स्वास्थ्य, आयुष, पशुपालन तथा रचनात्मक (एवीजीसी) जैसे श्रम प्रधान क्षेत्रों पर जोर, रोजगार सृजन की संभावना दिखाता है, लेकिन सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन के बिना रोजगार को समावेशी विकास नहीं कहा जा सकता। बीएमएस श्रम संहिताओं की अधिसूचना तथा बैंकिंग क्षेत्र सुधार और ‘शिक्षा से रोजगार एवं उद्यम’ पर उच्चस्तरीय समितियों के गठन पर भी चिंता व्यक्त करता है, क्योंकि श्रमिक सुरक्षा के बिना सुधार अस्थिरता और असंगठितकरण को बढ़ावा देंगे।
मूल श्रमिक मुद्दों पर गहरा असंतोष : बजट पूर्व बैठकों में बार-बार उठाई गई मांगों की अनदेखी पर भारतीय मजदूर संघ गंभीर असंतोष और तीव्र नाराजगी व्यक्त करता है।
स्कीम वर्कर्स : आंगनबाड़ी, आशा एवं मध्यान्ह भोजन कार्यकर्ताओं के मानदेय में किसी भी प्रकार की वृद्धि न किया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्हें श्रमिक का दर्जा देकर न्यूनतम वेतन एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की मांग को फिर से नजरअंदाज किया गया है, जो जमीनी स्तर पर कार्यरत महिला श्रमिकों के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाता है।
ईपीएफ पेंशन (ईपीएस-95) : ईपीएस-95 के अंतर्गत पात्रता मानदंडों तथा न्यूनतम पेंशन, दोनों में कोई वृद्धि घोषित नहीं की गई है। अल्प पेंशन पर जीवन-यापन कर रहे सेवानिवृत्त श्रमिकों की यह निरंतर उपेक्षा अस्वीकार्य है। बीएमएस पेंशन में ठोस वृद्धि एवं चिकित्सा सुविधाओं की अपनी मांग को दृढ़ता से दोहराता है।
ईपीएफ एवं ईएसआई कवरेज : ईपीएफ और ईएसआई की वेतन-सीमा में वृद्धि न किया जाना अत्यंत चिंताजनक है। इससे बड़ी संख्या में श्रमिक इन महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे से बाहर हो जाएंगे, जिससे सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
असंगठित क्षेत्र (गिग एवं प्लेटफॉर्म वर्कर्स सहित) : ई-श्रम जैसी पहलों को स्वीकार करते हुए भी, असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लगभग 90 प्रतिशत श्रमिकों, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स भी शामिल हैं, के लिए समर्पित एवं पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा कोष का अभाव इस बजट की एक गंभीर विफलता है।
रोजगार एवं नौकरी की सुरक्षा : कौशल विकास की बात स्वागतयोग्य है, किंतु निजीकरण, संविदाकरण और आउटसोर्सिंग के बढ़ते चलन से नौकरी की सुरक्षा, वेतन स्थिरता और श्रमिक अधिकारों पर गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।
सरकारी कर्मचारी : आठवें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन तथा एनपीएस में सार्थक सुधार पर बजट की चुप्पी से सरकारी कर्मचारियों में व्यापक असंतोष है।
भारतीय मजदूर संघ का स्पष्ट मत है कि केंद्रीय बजट 2026-27 पूंजी और अवसंरचना केंद्रित है, श्रमिक केंद्रित नहीं। यह स्कीम वर्कर्स, ईपीएस-95 पेंशनधारकों, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों एवं सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने में असफल रहा है। बीएमएस देश के श्रमिकों के हितों की रक्षा हेतु अपने संघर्ष को और तेज करेगा, ताकि आर्थिक विकास का लाभ, सम्मानजनक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के रूप में हर श्रमिक तक पहुंचे।

















