एपस्टीन फाइल्स। यह केवल एक व्यक्ति या कुछ चर्चित नामों से जुड़ा हुआ प्रकरण नहीं। ये उस वैश्विक सत्ता-संरचना की नैतिक विफलता के दस्तावेज हैं, जिसमें यह मान लिया गया कि धन, प्रभाव, ब्रांडिंग और राजनीतिक ताकत मिलकर मनुष्य को सामाजिक जवाबदेही से मुक्त कर सकते हैं। इन्हें केवल “स्कैंडल” या “घटनाक्रम” के रूप में देखना दरअसल उसी सोच का विस्तार है, जो अपराध को असाधारण नहीं बल्कि ‘New normal’ या स्वीकार्य बना देती है।
जेफ्री एप्सटीन का मामला इसलिए अधिक घातक है क्योंकि यह सत्ता रसूखदारों और शोषण के बीच के रिश्ते को उजागर करता है। यहां अपराध अकेले में नहीं हुआ। यह पूरे संजाल यानी नेटवर्क के रूप में हुआ, संरक्षण के साथ हुआ, और उस चुप्पी के भरोसे हुआ जिसे ‘प्रतिष्ठा’ कहा जाता है।
जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चेहरे किसी न किसी रूप में ऐसे व्यक्ति के आसपास मौजूद पाए जाते हैं, तो प्रश्न केवल कानूनी नहीं रह जाता, वह नैतिक हो जाता है। ऐसे में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी नामों का अर्थ अपराध सिद्ध होना नहीं है। किन्तु नैतिक विमर्श में “सिद्ध दोष” और “नैतिक जिम्मेदारी” एक ही चीज नहीं हैं।
एपस्टीन ने अपने नेटवर्क का विस्तार दुनियाभर की फिल्मी हस्तियों तक कर रखा था। ऐसे कई जाने-माने चेहरे थे जो उसके सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। प्रसिद्ध अमेरिकी अभिनेता और निर्माता केविन स्पेसी, अभिनेता और कॉमेडियन क्रिस टकर ने एपस्टीन के निजी विमान में यात्रा की तो अमेरिकी अभिनेता और निर्देशक वुडी एलेन, निर्देशक ब्रैट रैटनर एपस्टीन के रात्रिभोज में शामिल हुए। खुलासे के अनुसार न्यूयॉर्क के वर्तमान मेयर जोहरान ममदानी की अम्मी फिल्म निर्माता मीरा नायर भी एपस्टीन से बार-बार मिलती रही हैं ऐसा उल्लेख हो रहा है। एपस्टीन के निकट सहयोगी घिसलेन मैक्सवेल के न्यूयॉर्क स्थित निवास पर आयोजित भव्य पार्टी में भी मीरा शामिल हुईं। स्पष्ट है कि इन हस्तियों का इस्तेमाल एक-दूसरे से जुड़ती आगे बढ़ती सीढ़ी के रूप में किया गया। किन्तु नामी हस्तियों की छवि संभालने वाली एजेंसियों की ओर से आने वाली घातक सफाई यह है कि इन्हें इस सबका पता ही नहीं चला। कलंक कथाओं को निर्दोष ठहराने का लबादा ओढ़ाने का कैसा घटिया प्रयास है!
सार्वजनिक जीवन में अकस्मात किसी से कहीं मिल जाना या फोटो खिंच जाना एक बात है; इसे सामान्य माना भी जा सकता है किंतु यहां ऐसा नहीं है… घटनाक्रमों का दोहराव और संदिग्ध चेहरों पर मुस्कान कुछ और ही प्रश्न खड़े करती है।
एक लोकतांत्रिक समाज का कर्तव्य है कि वह यह पूछे कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग किन सामाजिक और वैचारिक मंडलों में विचरण करते हैं। कहां वे सहज अनुभव करते हैं, और क्यों? यदि ऐसे मंडल बार-बार शोषण के आरोपों से घिरे लोगों से भरे मिलते हैं, तो यह संरचनात्मक और नैतिक गिरावट की समस्या है, व्यक्तिगत नहीं।
इस संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि एपस्टीन नेटवर्क में केवल राजनेता या उद्योगपति नहीं दिखते, बल्कि वे लोग भी दिखते हैं जो “आध्यात्म”, “स्वास्थ्य”, “वेलनेस” “परोपकार” और “नैतिक जीवन” के वैश्विक प्रतीक माने जाते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर प्रख्यात योग और आत्मिक स्वास्थ्य से जुड़े नाम दीपक चोपड़ा का उल्लेख कुछ संदर्भों में आया है। यहां अत्यंत सावधानी आवश्यक है। उनके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष आपराधिक आरोप स्थापित नहीं हैं, और न ही उन्हें किसी अपराध से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित होगा। लेकिन यह प्रश्न वैध है कि आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था में “आस्था” और ‘चमक’ की भूमिका किस हद तक सत्ता-संरचना के साथ सहजीवी बन चुकी है।
यह प्रश्न तब और भी प्रासंगिक बन जाता है जब खुलासा होता है कि काबा को ढकने वाले पवित्र काले रेशमी कपड़े ‘किसवा’ के तीन टुकड़े जेफ्री एपस्टीन को भेजे गए थे। इन टुकड़ों में से एक तो काबा के अंदर का हिस्सा था। गौर कीजिए, यह किसवा 2017 में भेजा गया, जब तक एपस्टीन एक यौन अपराधी के तौर पर दोषी साबित होकर बाकायदा सजा भी काट चुका था। ऐसे में प्रश्न स्वाभाविक है जिस चीज को मुस्लिम आस्था अत्यंत महत्वपूर्ण मानती हो उसे एक घटिया अपराधी तक पहुंचाने का जतन करने वाले कौन लोग थे? एक ‘नापाक’, ‘काफिर’ को ‘पाक’ किसवा देने वालों का अपना ईमान क्या था ?
जब नैतिकता की बात करने वाला तंत्र भी घटिया पैंतरों में लिथड़े नेटवर्क का हिस्सा बन जाए, तो प्रतिरोध की संभावना घट जाती है। यह अधिक, या कहिए मूल चिंता का विषय है।
इसी कड़ी में बिल गेट्स का प्रश्न विशेष रूप से गंभीर हो जाता है और उन्हें सामान्य सार्वजनिक हस्तियों की तरह नहीं देखा जा सकता। इसका कारण कोई आरोप गढ़ना नहीं, बल्कि उनके प्रभाव का असाधारण पैमाना है। बिल गेट्स केवल एक धनी व्यक्ति नहीं हैं। वे परोपकार, वैश्विक स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक, कृषि, वैक्सीन नीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ जुड़ी एक ऐसी प्रभाव प्रणाली का केंद्र हैं, जो कई राष्ट्र-राज्यों से अधिक संसाधन और नीति-निर्धारण क्षमता रखती है।
जब ऐसा व्यक्ति एपस्टीन जैसे चरित्र के संपर्क में पाया जाता है, तो सवाल “क्या अपराध हुआ” से आगे बढ़कर “यह संपर्क संभव कैसे हुआ” तक जाना चाहिए।
क्या वैश्विक परोपकार और निजी शक्ति के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो चुकी है कि जवाबदेही का कोई स्पष्ट ढांचा बचा ही नहीं? क्या बड़े दानदाता और फाउंडेशन इस स्थिति में हैं कि वे लोकतांत्रिक निगरानी से लगभग मुक्त हो जाएं? और यदि ऐसा है, तो यह आधुनिक विश्व व्यवस्था के लिए एक खतरनाक संकेत है।
बिल गेट्स को विशेष तौर पर इसलिए प्रश्नों के घेरे में लिया जाना चाहिए क्योंकि उनका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं है, वह संस्थागत है। उनकी सोच, प्राथमिकताएं और नेटवर्क वैश्विक नीतियों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में उनसे यह पूछना पूरी तरह जायज है कि वे किस प्रकार के सामाजिक और व्यक्तिगत संबंधों को स्वीकार्य मानते हैं। यह पूछना भी आवश्यक है कि क्या वैश्विक परोपकार के नाम पर खड़ी हुई संरचनाएं स्वयं एक नई, गैर-निर्वाचित सत्ता बन चुकी हैं, जिन पर न तो पारदर्शिता का दबाव है, न ही नैतिक उत्तरदायित्व का।
यह प्रश्न उठाना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परतें खोलने के लिए आवश्यक है जिसमें अत्यधिक शक्ति अत्यधिक चुप्पी के साथ जुड़ जाती है। इतिहास साक्षी है कि जब शक्ति से प्रश्न पूछना “असभ्य” या “षड्यंत्र” कहकर रोका जाने लगता है, तब वास्तविक अपराध पनपते हैं।
एपस्टीन प्रकरण को मानवता के कलंक के रूप में इसलिए दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सबसे कमजोर वर्ग -नाबालिग लड़कियां -सत्ता के सबसे शक्तिशाली वर्ग के सामने पूरी तरह असहाय दिखाई देती हैं। यह केवल यौन अपराध नहीं है, यह उस विचार का अपराध है जिसमें मनुष्य को वस्तु में बदल दिया जाता है। यदि समाज इस विचार को निर्णायक रूप से रद्द नहीं करता, तो कानून चाहे जितने बन जाएं, शोषण नए रूपों में लौटता रहेगा।
इस पूरे प्रकरण में बड़बोले अमेरिका के न्याय विभाग के लचर और लज्जाजनक रवैये की बात किए बिना चर्चा अधूरी ही रहेगी। इतिहास में यह घटनाक्रम और उसके सामने अमेरिकी न्याय तंत्र का बौनापन विशेष रूप से दर्ज किया जाएगा, क्योंकि न्यायिक रूप से कमजोर, नैतिक रूप से असंवेदनशील तथा राजनीतिक रूप से संदिग्ध, इन तीनों आयामों पर न्याय की सफलता ने विश्व के सबसे पुराने कहे जाने वाले लोकतंत्र और इसके संस्थानों पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।
एप्सटीन प्रकरण में अमेरिका के न्याय विभाग ने कठोर अभियोजन के बजाय ढिलाई, देरी और सीमित दायरों को चुना, जिससे कानून के समक्ष समानता की मूल भावना कमजोर हुई।
पीड़ितों के अधिकारों, गरिमा और पारदर्शिता को प्राथमिकता न देकर संस्थान ने यह संकेत दिया कि नैतिक उत्तरदायित्व सत्ता-संतुलन के आगे गौण है। प्रभावशाली नेटवर्क, गोपनीयता और चयनात्मक चुप्पी ने यह आभास दिया कि निर्णय न्याय से अधिक राजनीतिक लागत-लाभ से निर्देशित थे। न्यायिक तंत्र की यह विफलता और इस पर भी अमेरिकी बड़बोलापन विश्व बिरादरी ने खुली आंखों से देखा है।
अब यदि भारतीय संदर्भ की ओर देखें तो स्थिति और अधिक चिंताजनक हो जाती है। भारत जैसे देश में, जहां स्वयं विपुल जनसंख्या और संसाधनों पर दबाव के चलते यौन शोषण, मानव तस्करी और सत्ता-संरक्षित अपराधों की चुनौतियां रही हैं, वहां एपस्टीन फाइल्स पर गंभीर बौद्धिक विमर्श बनना चाहिए था। यह अवसर था कि भारत वैश्विक नैतिक बहस में अपनी आवाज़ रखता, अपने अनुभवों के आधार पर सत्ता और शोषण के रिश्ते पर सवाल खड़े करता, अपनी परंपरा से नैतिकता के मानदंड और नवीन संरचनाओं के दरकने से जुड़े प्रश्न खड़े करता। किन्तु इसके बजाय, भारतीय सार्वजनिक विमर्श को जानबूझकर सतही राजनीति में उलझा दिया गया। विशेष रूप से राहुल गांधी को एपस्टीन में “मूर्ख” बताए जाने जैसे संदर्भों से शायद उनकी पार्टी हताश दिखी। सम्भवतः इस स्थापित ‘ठप्पे’ के फिर उभरने से बचने की बौखलाहट में एक वैश्विक मुद्दे से जोड़कर की जा सकने वाली चर्चा को व्यक्तिगत अपमान और दलगत राजनीति में बदल दिया गया। समस्या यह नहीं थी कि किसी विदेशी दस्तावेज में किसी भारतीय नेता का जिक्र कैसे हुआ, समस्या यह थी कि एक वैश्विक मानवाधिकार संकट को भारत में दलगत राजनीति द्वारा किस स्तर पर समझा गया।
कांग्रेस पार्टी, जो स्वयं को नैतिक राजनीति और वैकल्पिक दृष्टि का वाहक बताती है, यहां विशेष रूप से विफल दिखाई देती है। उसने इस मुद्दे को न तो वैश्विक सत्ता-संरचना की आलोचना में बदला, न ही इसे बच्चों और महिलाओं के अधिकारों के सवाल से जोड़ा। इसके बजाय, उसने इसे भावनात्मक सहानुभूति और राजनीतिक शोर में गुम होने दिया। यह बौद्धिक पलायन का उदाहरण है- कठिन प्रश्नों से बचकर आसान नैरेटिव चुनना।
यह प्रवृत्ति केवल एक घटना या एक देश तक सीमित नहीं है। राजनीति का बड़ा हिस्सा ऐसे मुद्दों से असहज होता है, जो वैचारिक निष्ठा की मांग करते हैं।
एपस्टीन फाइल्स इसीलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे याद दिलाती हैं कि शोषण किसी एक संस्कृति, देश या विचारधारा तक सीमित नहीं है। यह वहां पनपता है जहां प्रश्न पूछना असुविधाजनक बना दिया जाता है।
इस बिंदु पर वैचारिक लामबंदी की आवश्यकता है। ऐसे मुद्दों पर वाम-दक्षिण, आस्थावान-सेकुलर, राष्ट्रप्रेमी-उदारवादी जैसी रेखाएं अर्थहीन हो जाती हैं। बच्चों का शोषण, सत्ता का दुरुपयोग और मानव गरिमा का हनन किसी विचारधारा का विषय नहीं, बल्कि मानवीय विवेक का विषय है। यदि कोई व्यक्ति, संस्था या विचार गलत है, तो उसकी आलोचना सर्वसम्मति से होनी चाहिए – तथ्यों की बार-बार जांच के बाद, लेकिन बिना भय के।
सार रूप में कहें तो एपस्टीन फाइल्स हमें यह चुनने पर मजबूर करती हैं कि हम किस तरह का समाज बनना चाहते हैं। एक ऐसा समाज जो हर खुलासे को खबर की तरह खपत कर ले और आगे बढ़ जाए, या ऐसा समाज जो इन घटनाओं को चेतावनी माने और सत्ता से कठिन प्रश्न पूछे। यदि हमने दूसरा रास्ता नहीं चुना, तो इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कौन दोषी सिद्ध हुआ, वह पूछेगा कि जब सब कुछ सामने था, तब समाज ने क्या किया। यह केवल अतीत का प्रश्न नहीं है। यह भविष्य की नैतिक संरचना का प्रश्न है।
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