शकुनि सी चालें और 'जिल्ले-इलाही' का भ्रम: क्या विरोध ही अब विचारधारा है?
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होम भारत

शकुनि सी चालें और ‘जिल्ले-इलाही’ का भ्रम: क्या विरोध ही अब विचारधारा है?

कुछ ही समय पहले यही नेता भारत की अर्थव्यवस्था को “मृत अर्थव्यवस्था” कहे जाने वाली विदेशी टिप्पणी को उत्साहपूर्वक दोहरा रहे थे, मानो देश की छवि धूमिल होना ही उनकी राजनीतिक जीत हो।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Feb 3, 2026, 06:02 pm IST
inभारत
व्यंग्य (फोटो- एआई निर्मित)

व्यंग्य (फोटो- एआई निर्मित)

वंशवादी चरमराते महाठगबंधन के स्वघोषित झंडाबरदार जिल्ले इलाही “नीरो” आजकल महाभारत के कुटिल चरित्र मामा शकुनि के एक आधुनिक अवतार की याद दिलाते हैं-रणनीति बहुत, पर राष्ट्रहित में ठोस परिणाम कम। राजनीति का मूल उद्देश्य जिम्मेदारी, दूरदर्शिता और राष्ट्रीय हित को दलगत प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखना होना चाहिए, परंतु कुछ नेता मानो स्थायी विरोध की मानसिकता में फंसे हुए प्रतीत होते हैं, जहां विरोध ही विचारधारा बन जाता है।

कुछ ही समय पहले यही नेता भारत की अर्थव्यवस्था को “मृत अर्थव्यवस्था” कहे जाने वाली विदेशी टिप्पणी को उत्साहपूर्वक दोहरा रहे थे, मानो देश की छवि धूमिल होना ही उनकी राजनीतिक जीत हो। देश के आत्मविश्वास को मजबूत करने के बजाय उन्होंने इस कथन को घरेलू राजनीति का हथियार बना लिया। आलोचक तंज कसते हुए कहते हैं कि उन्होंने यह सब अपने रहस्यमयी मोहब्बत का खोमचा से प्रचारित किया—एक ऐसा मंच जो प्रतीकों से भरा है, पर अक्सर ठोस समाधान से खाली दिखाई देता है।

लेकिन राजनीति स्थिर नहीं रहती। अब जब भारत और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता हुआ है और आर्थिक आशावाद का माहौल बना है, तो अपेक्षा थी कि एक जिम्मेदार विपक्षी नेता इस बदलाव को स्वीकारते हुए अपनी भाषा और रुख में संतुलन लाएँगे। इसके विपरीत, आलोचकों के अनुसार वही पुराना क्रम जारी है – नई उपलब्धियों को खारिज करना, ध्यान भटकाना और भ्रम फैलाना।

इसी कारण कुछ आलोचक व्यंग्य में उन्हें स्वयंभू जिल्ले-इलाही कहकर पुकारते हैं- एक ऐसा नेता जो बड़े दावों और बार-बार की राजनीतिक भूलों के बीच उलझा हुआ लगता है। उनकी बेचैनी मानो इस बात से उपजती दिखती है कि बदलती परिस्थितियाँ पुराने राजनीतिक आरोपों को कमजोर कर देती हैं। जैसे कोई खुजली हो जिसे चाहे जितनी दवा लगा लें, विरोध की आदत जाती नहीं।

लोकतंत्र में विपक्ष आवश्यक है, लेकिन जब विरोध केवल आदत बन जाए और राष्ट्रीय उपलब्धियों को भी स्वीकार न किया जाए, तब विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है। नेतृत्व का असली परीक्षण यही है कि कब दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर देशहित को प्राथमिकता दी जाए।

और इस तरह राजनीतिक मंच पर वही दृश्य दोहराया जाता है-जिम्मेदारी की जगह बयानबाजी, समाधान की जगह व्यंग्य, और रचनात्मक बहस की जगह राजनीतिक नाटक। अंततः जनता समझ जाती है कि कौन आलोचना सुधार के लिए कर रहा है और कौन केवल विरोध के लिए।

 

Topics: कटाक्षजिल्ले इलाहीपाञ्चजन्य विशेषभारत अमेरिका ट्रेड डील
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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