लोकसभा में सोमवार को संसद के बजट सत्र के दौरान जमकर हंगामा हुआ। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हो रही चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने कुछ कागजों के जरिए 2020 के गलवान संघर्ष का जिक्र करते हुए अपना भाषण शुरू किया। इस दौरान सत्ता पक्ष ने उनके भाषण पर आपत्ति जताई। असल में राहुल गांधी ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा कि वे पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब के कुछ अंशों के जरिए चीन से संघर्ष के बारे में बताना चाहते हैं। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि जो किताब प्रकाशित ही नहीं हुई है, राहुल गांधी उसका जिक्र सदन में कैसे कर सकते हैं? वे इसके सत्यापन के लिए क्या सबूत देंगे? गृहमंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी पर गुमराह करने का आरोप लगाया। इसके बाद लोकसभा में नियमों और कायदों को लेकर बहस छिड़ गई और सदन की कार्यवाही 3 बजे तक के लिए स्थगित दी गई और बाद में सदन को कल तक के लिए स्थगित कर दिया गया। अब प्रश्न उठता है कि किसी रक्षा संबंधी किसी प्रकाशन के क्या कायदे कानून हैं –
सेवारत कर्मियों के लिए नियम
सेना नियम, 1954 की धारा 21 के तहत सेवारत कर्मियों पर कुछ पाबंदियां हैं। ऐसी ही कुछ पाबंदियां सेवानिवृत्त कर्मियों पर भी लागू होती हैं।
बिना अनुमति प्रकाशन – कोई भी व्यक्ति केंद्र सरकार की पहले से मंजूरी लिए बिना किसी भी राजनीतिक प्रश्न से जुड़े सेवा विषय या सेवा जानकारी से संबंधित कोई भी पुस्तक, पत्र, लेख या अन्य दस्तावेज प्रकाशित नहीं कर सकता है।
मीडिया से संपर्क – वे (प्रकाशक व लेखक) मीडिया को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी किसी भी जानकारी का खुलासा नहीं कर सकते जो सेवा से संबंधित हो।
व्याख्यान और संबोधन : बिना पूर्व अनुमति के वे किसी भी सेवा विषय या राजनीतिक प्रश्न पर व्याख्यान या वायरलेस संबोधन भी नहीं दे सकते।
सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए नियम
सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए नियम थोड़े अलग हैं और अक्सर इसे एक अस्पष्ट क्षेत्र माना जाता है, लेकिन उन पर भी कुछ पाबंदियां लागू होती हैं।
पेंशन नियम (2021 संशोधन) – केंद्रीय नागरिक सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के संशोधित नियमों के अनुसार, खुफिया या सुरक्षा संबंधी संगठनों में काम कर चुके सेवानिवृत्त कर्मचारी बिना पूर्व अनुमति के अपने संगठन से जुड़ी कोई भी जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकते।
गोपनीयता की अपेक्षा – हालांकि रक्षा सेवाएं सीधे तौर पर इन पेंशन नियमों के दायरे में नहीं आतीं, लेकिन अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उसी तरह के मानकों का पालन करें, क्योंकि वे अपने कार्यकाल के दौरान कई गोपनीय और संवेदनशील जानकारियां रखते होते हैं।
सेवा जानकारी का दायरा
नियमों के अनुसार, पाबंदियां केवल युद्ध या हथियारों तक सीमित नहीं हैं। इसमें कुछ और मानक भी शामिल हैं…
देश के बाहरी संबंध – देश के दूसरे देशों के साथ संबंधों को प्रभावित करने वाली जानकारी।
सुरक्षा और बल – सेना या देश की सुरक्षा से संबंधित कोई भी विषय सेवा विषय के तहत आती है।
संवेदनशील चर्चाएं: इसमें सैन्य रणनीतियों के अलावा उच्च स्तरीय बैठकें और सरकारी योजनाओं पर होने वाली आंतरिक चर्चाएं भी शामिल हैं।
पाबंदियों से छूट
अधिकारियों को कुछ विशेष स्थितियों में लिखने की स्वतंत्रता भी है। अगर कोई पुस्तक या लेख उनके काम से संबंधित नहीं है, तो उस पर ये कड़े नियम लागू नहीं होते। इसके अलावा साहित्यिक या कलात्मक प्रकृति की रचनाओं के लिए आमतौर पर इन प्रतिबंधों में ढील दी जाती है। जनरल नरवणे की एक अन्य किताब- ‘द कैंटोनमेंट कॉन्सपिरेसी’ बिक्री के लिए उपलब्ध भी है। यह एक काल्पनिक उपन्यास है। इसमें एक सैनिक की कहानी को बताया गया है।
जिस अप्रकाशित किताब पर सोमवार को सदन में हगामा हुआ उसका नाम ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ है। इसमें जनरल नरवणे ने मन में आए विचारों का जिक्र किया
अन्य सैन्य अधिकारियों की किताबें
जनरल नरवणे से पहले कई सैन्य अधिकारियों की किताबें आ चुकी हैं। इनमें पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रि.) वीपी मलिक की किताब- करगिल- फ्रॉम सरप्राइज टू विक्ट्री और पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रि.) वीके सिंह की आत्मकथा- करेज एंड कन्विक्शन, एन ऑटोबायोग्राफी शामिल हैं। इसके अलावा पूर्व सेना प्रमुख जनरल के सुंदरजी की किताब- ब्लाइंड मेन ऑफ हिंदुस्तान- इंडो-पाक न्यूक्लियर वॉर; और ऑफ सम कॉन्सिक्वेंस- अ सोल्जर रिमेम्बर्स भी सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गई कुछ किताबों में शामिल हैं। इसके अलावा खुद पूर्व सेना प्रमुख नरवणे का एक उपन्यास भी आया है।
क्या हंगामा था मकसद
राहुल गांधी ने जिस तरीके से नियमों के विपरीत जा कर भी इस मुद्दे को उठाया और लोकसभा अध्यक्ष के पांच बार टोकने पर भी अपनी जिद को जारी रखा तो इससे लगने लगा है कि नेता प्रतिपक्ष का उद्देश्य शायद हंगामा खड़ा करना ही रहा होगा। जिस तरह से केंद्रीय बजट को लेकर राहुल गांधी व अन्य कांग्रेस नेताओं ने कल बजट की आलोचना की, अच्छा होता राहुल गांधी अपनी आलोचना को लेकर तथ्य सदन के सामने रखे। परंतु उन्होंने तथ्यों की बजाय हंगामे को प्राथमिकता दी लगती है।
















