पड़ोसी देश बांग्लादेश में 12 फरवरी को वहां की सरकार चुनने के लिए चुनाव होने वाले हैं। लेकिन उससे पहले वहां पर हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई है। मानवाधिकार संस्था ‘राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप’ (RRAG) की लेटेस्ट रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
60 दिनों में 17 हिंदुओं का कत्ल और जलते मंदिर
‘राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप’ ने शनिवार को अपनी नई रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। संस्था के मुताबिक, वहां 1 दिसंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच केवल दो महीनों के अंदर 17 हिंदुओं की लक्षित हत्या यानी टारगेट किलिंग की गई। इतना ही नहीं, इस दौरान 16 घरों और मंदिरों को आग के हवाले कर दिया गया।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कट्टरपंथी समूह अब “चुनावी हिंसा” की आड़ में हिंदू समुदाय को निशाना बना रहे हैं। पिछले महज एक सप्ताह में ही आगजनी की 7 बड़ी घटनाएं दर्ज की गई हैं। हिंसा का सबसे क्रूर रूप चटगांव के मीर सराय, रावजान, फिरोजपुर और सिलहट में देखने को मिला है। संस्था के निदेशक सुहास चकमा ने बताया कि हमलावर बेहद अमानवीय तरीका अपना रहे हैं। वे पहले हिंदू परिवारों के घरों को बाहर से कुंडी लगाकर बंद कर देते हैं और फिर उनमें आग लगा देते हैं, ताकि कोई भी जीवित बाहर न निकल सके।
तालिबानी स्टाइल में कर रहे हत्या
RRAG की रिपोर्ट में उन 17 हिंदुओं की सूची दी गई है जिनकी हत्या या तो गला रेतकर की गई या जिन्हें जिंदा जला दिया गया। इसमें राणा प्रताप बैरागी, शांतो चंद्र दास और चंचल चंद्र भौमिक जैसे युवाओं और प्रतिष्ठित नागरिकों के नाम शामिल हैं। इन हत्याओं के पीछे की क्रूरता को तालिबानी मानसिकता करार दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इन हमलों को सांप्रदायिक नहीं, बल्कि राजनीतिक या आपराधिक हैं मानने का राग अलाप रही है क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अवामी लीग’ का समर्थक माना जाता है। सुहास चकमा का आरोप है कि प्रशासन के इसी इनकार ने कट्टरपंथियों को खुली छूट दे दी है। स्थिति इतनी डरावनी है कि पीड़ित परिवार अब अपनी सुरक्षा के लिए इन हमलों को ‘दुर्घटना’ बताने पर मजबूर हैं।
12 फरवरी को हो सकता है बड़ा हमला
भारतीय खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि 12 फरवरी का दिन बांग्लादेश के लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा। उस दिन संसदीय चुनाव और राष्ट्रीय जनमत संग्रह एक साथ होने हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान समर्थित जमात-ए-इस्लामी चुनाव परिणामों पर नजर रखे हुए है। यदि कट्टरपंथी तत्वों को लगा कि नतीजे उनके पक्ष में नहीं हैं, तो वे बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरकर हिंसा फैला सकते हैं। बताया जा रहा है कि चुनाव के दिन अल्पसंख्यक समुदायों पर हमले और तेज हो सकते हैं, जिससे सीमा पर भी तनाव बढ़ने की आशंका है।

















