डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले लोगों को लेकर एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आ रहा है। इसके तहत NEET PG के थर्ड राउंड में 811 कैंडिडेट्स ने अपनी कैटेगरी इंडियन से NRI में बदल ली है ताकि उन्हें PG मेडिकल सीट मिल सके। यह 2025-26 सेशन के लिए है। मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) ने इनकी लिस्ट जारी की है।
क्या है पूरा मामला
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, NEET PG में बहुत से कैंडिडेट्स का स्कोर अच्छा नहीं होता, लेकिन अगर उनके पास पैसा है तो वे NRI कोटा के तहत सीट ले सकते हैं। NRI कोटा में कट-ऑफ बहुत कम होता है और सीट्स भी कम कॉम्पिटिशन वाली होती हैं। इसलिए कई लोग अपनी कैटेगरी बदलकर NRI बन जाते हैं, भले ही वे असल में भारत में रहते हों।
कितने लोग शामिल हुए?
कुल 811 कैंडिडेट्स को MCC ने अप्रूव किया है। इसमें इनमें से 113 असली NRI हैं या NRI के बच्चे हैं। बाकी 698 वो लोग हैं जो NRI रिश्तेदारों (पहले या दूसरे डिग्री के) के वार्ड हैं, जैसे चाचा-ताऊ, नाना-नानी आदि।
स्कोर और रैंक कितने कम थे?
- कई लोगों के स्कोर बहुत ही कम थे, जो सामान्य कोटा में कभी सीट नहीं दिला पाते।
- पहले कैटेगरी (असली NRI) में सबसे कम स्कोर था 82 (800 में से), यानी सिर्फ 10% से थोड़ा ज्यादा।
- दूसरे कैटेगरी में सबसे कम 28 मार्क्स, यानी महज 3.5%।
- पहले ग्रुप में 66% कैंडिडेट्स (75 लोग) का स्कोर 215 से कम था, मतलब रैंक 1.5 लाख से नीचे।
- दूसरे ग्रुप में 60% से ज्यादा (422 लोग) की रैंक भी 1.5 लाख से नीचे थी।
NRI कोटा में फीस कितनी लगती है?
क्लिनिकल ब्रांच में NRI कोटा की सालाना फीस 45 लाख से 95 लाख रुपये तक होती है। यह कॉलेज, स्टेट और स्पेशियलिटी पर निर्भर करता है। मैनेजमेंट कोटा से भी महंगा पड़ता है, लेकिन कट-ऑफ बहुत कम होने से आसानी से सीट मिल जाती है।
यह प्रोसेस कैसे चलता है?
कैंडिडेट्स NEET PG काउंसलिंग के दौरान अप्लाई करते हैं कि वे NRI बनना चाहते हैं। इसके लिए डॉक्यूमेंट्स दिखाने पड़ते हैं – जैसे स्पॉन्सर का NRI पासपोर्ट, रिलेशनशिप प्रूफ, अफिडेविट, बैंक अकाउंट डिटेल्स आदि। MCC चेक करता है और अप्रूव करता है।
ऐसा क्यों होने लगा?
सुप्रीम कोर्ट और सरकार ने NRI की डेफिनिशन को बढ़ा दिया है ताकि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को नुकसान न हो। अगर NRI सीट्स खाली रहती हैं तो वे मैनेजमेंट कोटा में चली जाती हैं, जहां फीस कम होती है। कॉलेजों को इससे बड़ा फाइनेंशियल लॉस होता है। इसलिए NRI कोटा भरवाने के लिए रिश्तेदारों तक को स्पॉन्सर बनाने की इजाजत है। इससे सीट्स खाली नहीं रहतीं और कॉलेजों को अच्छी फीस मिलती रहती है। यह सिस्टम चल रहा है क्योंकि प्राइवेट कॉलेजों की फाइनेंशियल जरूरतों को ध्यान में रखा गया है।











