भारतीय संस्कृति की आत्मा त्याग और संयम की के आदर्शों के अनुपालन वाली महान संत परंपरा में निवास करती है। यह परंपरा न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय चेतना व मूल्यों की वाहक रही है। जब-जब समाज में धर्म के स्वरूप को शक्ति और वर्चस्व तक सीमित करने के प्रयास हुए तब-तब संतों ने ही उसे पुनः जनसामान्य के जीवन से जोड़ने का काम किया। रविदास जी इसी महान परंपरा के ऐसे संत हैं जिन्होंने न केवल ‘आध्यात्मिक समरसता’ का उद्घोष किया बल्कि उसे अपने जीवन और वाणी में मूर्त रूप भी दिया। मध्यकालीन भारत का समाज शक्ति व षड्यंत्रों के कारण गहरे जातिगत विभाजन, सामाजिक असमानता और धार्मिक आडंबर से ग्रस्त होने लगा था, ऐसे समय में संत रविदास जी का उदय सनातन की उस मूल आत्मा की पुनर्स्थापना था, जो करुणा, समरसता और आत्मबोध पर आधारित है। इसी ऐतिहासिक भूमिका को वे अपनी वाणी में स्पष्ट करते हैं, जब वे कहते हैं :
“जाति पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।”
अर्थात् ईश्वर जाति या वर्ग नहीं पूछता; जो उसे सच्चे मन से भजता है, वही उसका होता है। यह पंक्ति सनातन धर्म की मूल सार्वभौमिकता को पुनः स्थापित करती है। संत रविदास जी का महत्व इस दृष्टि से भी अत्यंत व्यापक है कि उन्होंने धर्म को किसी विशिष्ट वर्ग या वर्ण की संपत्ति नहीं बनने दिया। वे भक्ति आंदोलन के ऐसे संत थे जो समाज के भीतर एक मौन क्रांति के रूप में कार्य कर रहे थे। यह आंदोलन महान सनातन धर्म की आड़ लेकर विकृत सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध एक आत्मिक विद्रोह था। संत रविदास जी इस विद्रोह के सबसे सशक्त स्वर थे। उनकी वाणी में न तो कटुता थी और न ही हिंसा, बल्कि उसमें आत्मविश्वास, करुणा और दृढ़ता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। इसी संतुलन को वे स्वयं इस प्रकार व्यक्त करते हैं :
“ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न।”
अर्थात् मैं ऐसे समाज की कामना करता हूँ जहाँ सबको समान रूप से जीवनोपयोगी साधन प्राप्त हों। ये पंक्ति पूज्य संत रविदास जी के सामाजिक दर्शन और सनातनी लोककल्याणकारी स्वरूप को स्पष्ट करती है। संत रविदास जी को केवल एक दलित संत या सामाजिक सुधारक के रूप में सीमित करना उनके विराट योगदान के साथ अन्याय होगा। वे सनातन धर्म की उस लोकात्मा के प्रतिनिधि हैं जिसने युगों से चली आ रही भारत की परम्परा को सहिष्णु, समरस और लोककल्याणकारी बनाए रखा है।
संत रविदास जी का जीवन, कर्म और आध्यात्मिक यात्रा :
संत रविदास जी का जन्म काशी के समीप सीर, गोवर्धनपुर में माना जाता है। काशी स्वयं सनातन संस्कृति का केंद्र है, जहाँ ज्ञान, भक्ति और मोक्ष की अवधारणाएँ सह-अस्तित्व में विकसित हुईं। एक चर्मकार परिवार में जन्म लेने के बावजूद संत रविदास जी का आध्यात्मिक विकास यह सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में आत्मिक उन्नति के मार्ग पर वर्ण, जाति इत्यादि कभी बाधा नहीं बन सकता। उनका जीवन कर्मयोग का जीवंत उदाहरण है। वे अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए भी निरंतर ईश्वर-स्मरण में लीन रहते थे। उनके जीवन-दर्शन को उनकी यह पंक्ति अभिव्यक्त करती है :
“कर्म किए जौ हरि मिलै, तो काहे को पूजा।”
अर्थात् यदि ईश्वर कर्म से प्राप्त होता है तो वही सच्ची पूजा है। यह कथन श्रीमद्भागवद्गीता के कर्मयोग की ही जनभाषा में की गई व्याख्या है। जिससे कि सामान्य जन आडम्बर, कर्मकांड इत्यादि से मुक्त रहकर भी अपने सुकर्मों के माध्यम से भी ईश्वर प्राप्ति संभव है। संत रविदास जी का जीवन इस बात का भी प्रमाण है कि सनातन धर्म में श्रम को कभी हीन नहीं माना गया बल्कि श्रम स्वयं साधना का ही एक रूप है। यही कारण भी है कि उनकी भक्ति में वैराग्य नहीं बल्कि सामान्य जीवन के प्रति गहरी स्वीकृति दिखाई देती है। इस भाव को वे स्वयं लिखते हैं :
“ऐसी मेरी जाति विख्यात, चमड़ा छाँटूँ दिन-रात।”
अर्थात् मैं अपने श्रम से कभी लज्जित नहीं हूँ मेरा कार्य ही मेरी पहचान है। यह पंक्ति भारतीय मूल्यों में निहित श्रम की गरिमा और आत्मसम्मान का भी उद्घोष है। उनकी आध्यात्मिक यात्रा बाहरी अनुष्ठानों से अधिक आंतरिक शुद्धता पर केंद्रित थी। जब वे कहते हैं :
“मन चंगा तो कठौती में गंगा”
तो ये कथन केवल काव्यात्मक नहीं हैं बल्कि गहन दर्शन को व्यक्त करते हैं। यह पंक्ति उपनिषदों की उस परंपरा को सामान्य जन की भाषा में प्रस्तुत करती है जिसमें आत्मा की पवित्रता को सर्वोच्च माना गया है। संत रविदास जी का जीवन स्वयं प्रमाणित करता है कि सनातन धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को भीतर से रूपांतरित करना है।
सनातन धर्म की दार्शनिक आत्मा और संत रविदास की वाणी :
सनातन धर्म का दर्शन आत्मा, ब्रह्म और जगत की एकता पर आधारित है। उपनिषदों का अद्वैत चिंतन यह कहता है कि ईश्वर बाहर नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है। चाहे मांडूक्य उपनिषद की पंक्ति ‘अयं आत्मा ब्रह्म (यह आत्मा ही ब्रह्म है)’ हो या फिर बृहदारण्यक उपनिषद की पंक्ति ‘अहं ब्रह्मास्मि (मैं ही ब्रह्म हूँ)’ हो; इसी परंपरा को लोकभाषा में संत रविदास जी की वाणी अभिव्यक्ति करती है जब अपनी भक्ति निर्गुण भक्ति धारा में कहते हैं :
“अंतर घट खोजि कै, जहाँ तहँ राम बसै।”
अर्थात् ईश्वर बाहर नहीं, हृदय के भीतर ही निवास करता है। उनके लिए ईश्वर मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं था। वे उसे श्रमिक के श्रम में, पीड़ित की पीड़ा में और साधक की साधना में ईश्वर अनुभव करते थे। यह दृष्टि सनातन धर्म की उस व्यापक अवधारणा को सामने लाती है जिसमें भक्ति और ज्ञान परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उनकी वाणी में वेदांत का गूढ़ दर्शन सरल प्रतीकों और सहज भाषा में प्रकट होता है :
“राम नाम रस पीजिए, छोड़ि देहु अभिमान।”
अर्थात् राम नाम का रस अहंकार के त्याग से ही प्राप्त हो सकता है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान पाती हैं। उनका समरस भाव यह दर्शाता है कि उनकी शिक्षाएँ सनातन की उस सार्वभौमिक चेतना की संवाहक हैं जो मानव मात्र को जोड़ती है। उनकी भक्ति का केंद्र भी केवल आत्मिक मुक्ति नहीं था बल्कि सामाजिक करुणा भी था।
जाति व्यवस्था और सामाजिक समरसता :
संत रविदास जी को अक्सर जाति व्यवस्था का विरोधी कहा जाता है किंतु यह कथन अधूरा सत्य है। उन्होंने सनातन धर्म की मूल अवधारणा का विरोध नहीं किया बल्कि उसकी विकृत सामाजिक व्याख्याओं को चुनौती दी। उनका विरोध जन्म आधारित श्रेष्ठता के विचार से था न कि धर्म से। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मनुष्य का मूल्यांकन उसके कर्म, गुण और आचरण से होना चाहिए वे स्वयं कहते हैं :
“जो हम सहरी सो मीत हमारा, जो हम बंचा सो मीत हमारा।”
अर्थात् जो मेरे साथ रहता है, मुझे अपनाता है, वही मेरा अपना है, जाति या वर्ग कोई बाधा नहीं। यह विचार भगवद्गीता के उस सिद्धांत से गहराई से जुड़ा है जिसमें वर्ण को गुण और कर्म पर आधारित बताया गया है। संत रविदास जी की वाणी में कहीं भी घृणा या प्रतिशोध नहीं दिखलाई देता बल्कि सदैव ही आत्मगौरव और समरसता का भाव प्रकट होता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्य सामाजिक न्याय के, लोककल्याण के पोषक हैं। उनके विचार सामाजिक विद्रोह नहीं बल्कि सामाजिक सुधार का आह्वान हैं जिसमें यह रूपांतरण भीतर से आरंभ होता है और सामाजिक सुधार तक पहुँचता है।
बेगमपुरा और संत रविदास
संत रविदास जी की ‘बेगमपुरा’ की कल्पना भारतीय चिंतन में एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करती है। यह समाज न तो केवल आध्यात्मिक स्वप्न है और न ही यूटोपिया बल्कि सनातन धर्म के लोककल्याणकारी आदर्शों का विस्तार है। बेगमपुरा वह स्थान है जहाँ कोई दुख नहीं, कोई भय नहीं और कोई भेदभाव नहीं है। यह चिंतन रामराज्य की अवधारणा और सर्वे भवन्तु सुखिन: की संकल्पना से जुड़ी है।
“बेगमपुरा सहर को नाऊँ, दुख अंदोहु नहिं तिहि ठाऊँ।”
अर्थात् बेगमपुरा वह नगर है जहाँ न दुख है, न शोक और न भय है वहाँ चिंता का कोई स्थान ही नहीं है। संत रविदास जी का समाज दर्शन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की तरह ही स्पष्ट करती है कि सच्चा धर्म वही है जो मानव को भय, अभाव और अपमान से मुक्त करे। उनकी दृष्टि में आध्यात्मिक मुक्ति, सामाजिक न्याय से अलग नहीं हो सकती।
संत रविदास और सनातन धर्म का शाश्वत संबंध :
संत रविदास जी और सनातन धर्म के संबंध को विरोध के चश्मे से देखना ऐतिहासिक और वैचारिक भूल है। संत रविदास जी सनातन धर्म के आलोचक नहीं बल्कि उसके मानवीय स्वरूप के पुनर्स्थापक थे। वे स्वयं इस निष्कर्ष को शब्द देते हैं :
“हरि का भजन करहु मन मेरे, छूटै जनम-जन्म का फेरा।”
अर्थात् मेरा मन तो ईश्वर की उपासना ही करता है चूँकि इसके माध्यम से ही अर्थात् ईश्वर की सच्ची भक्ति ही आत्मिक और सामाजिक मुक्ति का मार्ग है। उन्होंने धर्म को कठोर संरचनाओं से मुक्त कर करुणा, समता और आत्मबोध से जोड़ा। आज जब धर्म को प्रायः विभाजन का माध्यम बनाने का प्रयास किया जाता है तब संत रविदास जी की शिक्षाएँ हमें सनातन धर्म की मूल आत्मा की ओर लौटने का मार्ग दिखाती हैं। वास्तव में, संत रविदास जी सनातन धर्म की उसी शाश्वत चेतना के प्रतिनिधि हैं जिसने भारत को युगों तक जीवंत बनाए रखा है।

















