समरसता भारत की आत्मा है, एकरूपता असंभव: मुकुल कानितकर
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होम भारत

समरसता भारत की आत्मा है, एकरूपता असंभव: मुकुल कानितकर

प्रख्यात विचारक मुकुल कानितकर की पाञ्चजन्य में खास बातचीत: समरसता एकरूपता नहीं बल्कि नानात्व है। परंपरा-परिवर्तन का संतुलन और राष्ट्रहित पर संघ का दृष्टिकोण।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Jan 30, 2026, 04:45 pm IST
inभारत
Panchjanya baat bharat ki mukul kanitkar

मुकुल कानितकर पाञ्चजन्य के कार्यक्रम में बोलते हुए

पाञ्चजन्य के 79वें स्थापना वर्ष के अवसर पर आयोजित “बात भारत की” कार्यक्रम में प्रख्यात विचारक मुकुल कानितकर के साथ पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने बातचीत की। इस मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानितकर जी ने संघ के 100 वर्षों की यात्रा को लेकर बड़ी बात कही कि अपनी इस यात्रा के दौरान तमाम संघर्षों के बाद भी अगर संघ वट वृक्ष की तरह खड़ा है तो उसने परंपरा को परिवर्तन में भी संजोया है।

क्या संघ इस बात को स्वीकार करता है कि परंपरा और परिवर्तन के बीच का तनाव भारतीय सभ्यता का स्थायी गुण है?

भारतीय संस्कृति का नैरंतर्य है, उसके लिए एक शब्द प्रयोग होता है ‘नित्य, नूतन-चिर पुरातन’। भारत की संस्कृति की महानता के बारे में जानने के लिए तुर्किए के एक विश्वविद्यालय में शोध चल रहा है कि इस्लाम जिस भी देश में गया वहां पर 20-25 वर्षों में कब्जा कर लिया, लेकिन भारत में ऐसा क्या है कि वहां कई सौ सालों तक रहने के बाद भी भारतीय संस्कृति जीवित है। भारत में सदा से परिवर्तन और परंपरा का समन्वय किया गया। हमारे यहां दो संकल्पनाएं हैं एक शाश्वत सनातन धर्म की संकल्पना। 100 वर्षों की अपनी इस यात्रा के दौरान तमाम संघर्षों के बाद भी अगर वट वृक्ष की तरह खड़ा है तो संघ ने परंपरा को परिवर्तन में भी संजोया है। चिरंतन को पकड़े रहना और परिवर्तन को स्वीकार करना संघ का स्वभाव है।

क्या राज्य की आलोचना को राष्ट्रहित से अलग करके देखा जा सकता है?

अधिकार एक आंतरिक मूल्य है यानि आपने क्या अर्जित किया है। किसी भी सामूहिक जीवन में रहना है तो व्यक्तिगत स्वातंत्र्य की मर्यादा तो आनी ही चाहिए। संघ की प्रार्थना में हम एक शब्द प्रयोग करते हैं, ‘राष्ट्र के हम अंग हैं’। बद्रीशाह टुल्लारिया ने कहा था-स्वार्थ ही सबसे बड़ा देशद्रोह है। व्यक्तिगत अधिकार और राष्ट्रहित की बहस का कोई मतलब नहीं है। रही बात आलोचना की तो इसे देश में स्वीकार किया गया है। राज्य की आलोचना थोड़ा राजनीतिक रूप से विवादास्पद हो सकता है। हम आलोचना को स्वीकार करते हैं। हां भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे स्वीकार्य नहीं होंगे।

समरसता का अर्थ विवध पहचानों का सम्मान करना है या एकरूपता की ओर बढ़ना है?

एकरूपता तो असंभव है। विश्व में विविधता से भी आगे का शब्द संस्कृत में है, जिसे-नानात्व कहा गया है। इसका अर्थ है दो लोग एक जैसे नहीं हो सकते हैं। इसलिए एकरूपता संभव नहीं है। हममें से सभी अद्वितीय हैं। यूनिफॉर्मिटी संभन नहीं हो सकती, केवल समरसता ही संभव है। और भारत के हृदय में समरसता है, देश के प्रत्येक व्यक्ति के अंदर समरसता ही है। संघ भारत की आत्मा है, क्योंकि ये भारत की बात करता है।

बहुसंख्यकवाद और राष्ट्रवाद के बीच सूक्ष्म परन्तु खतरनाक अंतर आप देखते हैं?

नई शिक्षा नीति जब बनी तो वो कोठारी कमीशन कही गई। इसमें कहा गया है कि भारत यूरोप की ओर झुक गया है और हमें उसे वापस लाना है। आपको लगता होगा कि सवाल बहुसंख्यकवाद पर पूछा गया है और मैं शिक्षा नीति पर बात कर रहा हूं। वो इसलिए क्योंकि ये ‘वाद’ शब्दावली है ये यूरोप की है। भारत में ‘वाद’ का कोई स्थान नहीं है इसलिए बहुसंख्यकवाद और राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं है। संघ इसे नहीं मानता। हम मानते हैं कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वो किसी भी ईश्वर की उपासना करता हो, अगर वो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है वो हिन्दू है। हिन्दुत्व हमारा राष्ट्रीयत्व है। भारत में भाषाएं भले ही अनेक हैं, लेकिन भाव एक ही है।

संघ नैतिकता कि परिभाषाएं, संरचनाओं को संघ कैसे देखता है और युवा पीढ़ी की देशभक्ति को संघ कैसे स्वीकार करता है?

समय के सात बदलना ही पड़ता है। राष्ट्रीय पुनर्जागरण का अर्थ ये नहीं है कि हम पीछे की ओर चलें। इसलिए भूतकाल की बात करते हुए राष्ट्रभक्ति की बात करना संभव ही नहीं है। स्वतंत्रता से पहले मरना ही राष्ट्रभक्ति थी। इसलिए हम मदनलाल ढींगरा, राजगुरू को याद करते हैं। जबकि, सावरकर को इसलिए याद करते हैं, क्योंकि उन्होंने देश के लिए कष्ट सहे। लेकिन, आज तो देश भक्ति के मायने और परिमाणों को बदलना ही पड़ेगा। संघ इस बात को मानता है कि कोई किसी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं दे सकता है। हमें खुद के अंदर ढूंढना है कि मैं क्या कर रहा हूं।

 

Topics: नानात्वharmonyभारत तेरे टुकड़ेunity in diversityIndia will be broken into piecesसमरसताMukul Kanitkarबात भारत कीविविधता में एकतामुकुल कानितकरRSS 100 वर्षRSS 100 YearsDiversity
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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