बलूचिस्तान डायरी : खरान में खतरनाक प्रयोग
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बलूचिस्तान डायरी : खरान में खतरनाक प्रयोग

खरान के हमले से किसने क्या सीखा, आगे इसी पर बहुत कुछ निर्भर करने वाला है। इसी से पता चलेगा कि भविष्य ने बलूचिस्तान के लिए कैसा समय तय कर रखा है

Written byअफसर बलोचअफसर बलोच
Jan 29, 2026, 06:21 pm IST
in विश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
हथियार लहराते बलूच लड़ाके (फाइल चित्र)

हथियार लहराते बलूच लड़ाके (फाइल चित्र)

किसी भी संघर्ष में कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब कोई घटना एक अदद घटना न रहकर इतिहास को दिशा देने वाला मोड़ बन जाती है। 15 जनवरी को खरान में बलूचों का हमला ऐसी ही एक घटना है। सबक बलूच लड़ाकों के लिए भी है और पाकिस्तान के लिए भी। महत्वपूर्ण यह है कि किसने क्या सीखा। क्योंकि इसके जवाब में ही छिपा है बलूचों के संघर्ष का भविष्य। ये पंक्तियां लिखे जाते समय खरान में अंदर-बाहर सुरक्षा के जबरदस्त इंतजाम हैं। बिना ठोस कारण किसी को न तो शहर में आने दिया जा रहा है और न बाहर निकलने दिया जा रहा है। सुरक्षा बलों का अंदाजा है कि खरान पर हमला करने वाले बलूच लड़ाकों में से कई अभी शहर में ही छिपे हैं। उन्हें खोज निकालने के लिए तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। अब सवाल उठता है कि खरान में हुआ क्या।

बड़ी रणनीति का परीक्षण

15 जनवरी को बलूचों ने शहर के विभिन्न ठिकानों पर हमले किए और इस दौरान बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों को मार डाला जिसके जवाब में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने भी कई बलूच हमलावरों को मार गिराया। लेकिन अगर क्रम के हिसाब से इस हमले को देखें और दावे-प्रति दावे के बीच सच्चाई को तलाशने की कोशिश करें तो खरान का हमला उस पायलट प्रोजेक्ट जैसा दिखता है जिसे व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले व्यावहारिक गुण-दोष आंकने के लिए चलाया जाता है।

पाकिस्तानी सेना का झूठ

हमले के बारे में पाकिस्तान सेना के इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) ने कहा, “ 15 जनवरी को ‘फितना अल हिंदुस्तान’ से जुड़े करीब 15 आतंकवादियों ने भारत के समर्थन से कई वारदातों को अंजाम दिया।… सुरक्षा बलों ने आतंकवादियों से लोहा लिया और उन्हें भागने को मजबूर कर दिया। तीन मुठभेड़ों में कुल 12 आतंकवादी मारे गए।” वहीं, बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगती ने कहा, “ हमले में दो सैन्य अधिकारी, विंग कमांडर कर्नल वधान और मेजर असीम घायल हो गए।

सुरक्षा बलों ने जवाबी हमले में 12 आतंकवादियों को मार गिराया।… विचारधारा की बात करते-करते आतंकवादी बैंक लूटने पर उतर आए हैं। वे छात्रों को गुमराह कर रहे हैं। बसों को रोककर बेकसूर लोगों को मार रहे हैं और पब्लिक का पैसा लूट रहे हैं।” फौज हो या फिर बलूचिस्तान की सरकार, किसी ने नहीं बताया कि किन-किन ठिकानों पर हमला किया गया, इसमें कितने सैनिक मारे गए। वैसे, पाकिस्तानी फौज कभी भी मारे गए सैनिकों की असली संख्या नहीं बताती। खैर, यह उनका तरीका है।

इसके उलट बलूच लड़ाकों ने पूरा ब्योरा दिया है कि कैसे दोपहर में 2.30 बजे उन्होंने लगभग पूरे शहर को अपने कब्जे में ले लिया था। कैसे सबसे पहले पुलिस थाने पर हमला बोलकर सुरक्षाकर्मियों को बंधक बनाकर हथियार वगैरह लूट लिए और दर्जनों कैदियों को रिहा कर दिया। कैसे, हमलावरों के एक गुट ने मुख्य बाजार में धावा बोलकर मीजान बैंक, अल हबीब बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों पर कब्जा कर लिया।

जब तक बलूच लड़ाके शहर के महत्वपूर्ण ठिकानों को अपने कब्जे में लिए हुए थे, बीएलएफ की ‘कुर्बान’ नाम की यूनिट ने खरान के रेड जोन में बाकायदा सड़क पर नाकेबंदी करके तीन गाड़ियों वाले फौजी काफिले पर हमला बोल दिया। 15 फौजियों को मार डाला, उनके हथियार लूट लिए और उनकी गाड़ियों को आग लगा दी। थोड़ी देर बाद वहां सेना की दूसरी टुकड़ी पहुंची जिसके साथ मुठभेड़ करीब तीन घंटे चली। इसमें और 27 फौजी मारे गए। खरान के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बलूचों के आगे फौज की दूसरी टोली के भी पैर उखड़ गए और वे पीछे हट गए। उसके बाद शाम तक वहां बलूचों का कब्जा रहा। बीएलएफ ने माना है कि इस मोर्चे पर उनके यूनिट कमांडर बराग जन की जान चली गई। शाम 7 बजे सेना की कमांडो बटालियन को मोर्चा लेने भेजा गया और तब से तड़के तक मुठभेड़ चलती रही। इसमें भी कई फौजी कमांडो मारे गए। बीएलएफ ने इस मुठभेड़ में कुर्बान यूनिट के यासिर बलोच के मारे जाने की पुष्टि की है।

क्या था लक्ष्य

गौर कीजिए, बीएलएफ ने अपने बयान में कहा कि ‘ऑपरेशन खत्म होने पर’ उसके लड़ाके सुरक्षित जगहों पर लौट गए। सुरक्षित जगह यानी आसपास की पहाड़ियां। बीएलएफ ने यह भी माना कि पहाड़ियों पर ड्रोन से दागी गई मिसाइलों के हमले में कैप्टन रैंक के मुबीन बलोच समेत चार की जान चली गई जिसमें से तीन का शव मिल चुका है। साफ है, यह ऑपरेशन एक खास मकसद के लिए चलाया गया था और उसके पूरा होते ही लड़ाके लौट गए। जरा सोचिए, एक साथ लड़ाकों की कई टुकड़ियों ने अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मकसद के साथ हमले किए।

एक टुकड़ी पुलिस थाने को कब्जे में लेती है, एक मुख्य बाजार में जगह-जगह मोर्चा थाम लेती है, एक शहर के सबसे संवेदनशील इलाके रेड जोन को कब्जे में लेती है, एक यूनिट अहम भवनों (इस मामले में बैंक और कुछ दफ्तर) को कब्जे में लेती है। एक और अहम बात है, हमलावरों के साथ स्नाइपरों की टोली भी थी जिसके लोग कब्जा किए गए भवनों पर निशाना साधकर बैठ गए और जब पाकिस्तान सेना ने ड्रोन से हमला करने की कोशिश की तो उसके आठ ड्रोन मार गिराए।

क्या लगता है,यह कोई सामान्य हमला था? यह सिर्फ बैंक लूटने के लिए था? क्योंकि रेड जोन पर जो मुठभेड़ हुई, उसमें दस घंटे के दौरान और सैनिक आते गए और मरने वालों की संख्या बढ़ती गई। अगर मकसद केवल सैनिकों को मारना होता तो बड़े काफिले पर हमला किया गया होता। दरअसल, यह रिहर्सल थी कि अगर किसी शहर पर कब्जा करना है, तो इस लिहाज से कौन-कौन से ठिकाने अहम होंगे, उन्हें कब्जा करने में क्या-क्या व्यावहारिक दिक्कतें आएंगी और कितने समय तक कब्जा बनाए रखने के लिए कितने लोगों की जरूरत होगी।

यह एक शहर पर कब्जा करने का ठोस अभ्यास था। राजनीतिक कार्यकर्ता दिलखुश जान कहते हैं, “ हमने ऐसे कई हमले देखे जिसमें फौजियों को, चीनियों को निशाना बनाया गया। ग्वादर में भी कई बार हमला हुआ, वहां के मुख्य भवन को निशाना बनाया गया, पांच सितारा होटल को निशाना बनाया गया जिसके कारण कई दिन तक कारोबार ठप भी हुआ। लेकिन यह हमला एक पूरे शहर पर कब्जा करने का अभ्यास था।” इसलिए मानकर चलना चाहिए कि “ऑपरपेशन पूरा” होने से बीएलएफ का यही मतलब था।

जब बलूचों ने सोच-समझकर यह ऑपरेशन चलाया तो उन्हें बेहतर पता होगा कि उसके लक्ष्य किस हद तक पूरे हुए और उसके लिए उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ी। पाकिस्तान के लिए भी इस हमले के अपने सबक हैं। उसे नए सिरे से विचार करना होगा कि अगर किसी शहर को अपने नियंत्रण में रखना है तो इसके लिए क्या करना होगा, कितने सैनिक किन-किन जगहों पर तैनात करने होंगे। ड्रोन जैसे अत्याधुनिक उपकरण ने दिखाया कि इससे कामयाबी हासिल हो सकती है बशर्ते निशाने का ठीक-ठीक पता हो।

कुल मिलाकर बात यह है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बलूच लड़ाकों ने 50 फौजियों को मारने का दावा किया, तो सच में कितने मारे गए। इसके कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां चल रहे तलाशी अभियान में कितने लड़ाके पकड़े जाते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बैंक से कितने पैसे लूटे गए। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसके बाद डेरा मुराद जमाली में हुए हमले में कितने सैनिक मारे गए, यहां-वहां ऐसे हमले होते रहेंगे। फर्क इससे पड़ता है कि खरान के हमले से किसने क्या सीखा। क्योंकि यदि खरान में किसी पायलट प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारकर उसकी व्यावहारिकता आंकी गई है, तो इसे बड़े पैमाने पर उतारने की योजना भी बन गई होगी। किसकी कितनी तैयारी, यह तो वक्त ही बताएगा।

Topics: छापामार युद्धसरफराज बुगतीपायलट प्रोजेक्टपाकिस्तानी सेनापाञ्चजन्य विशेषबलूचिस्तान संघर्षबलूचिस्तान डायरीखरान हमलाबलूच लड़ाकेबीएलएफरणनीतिक युद्ध
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