राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के 100 साल : बैतूल जेल और श्रीगुरुजी स्मारक कक्ष
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के 100 साल : बैतूल जेल और श्रीगुरुजी स्मारक कक्ष

1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने के बाद तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी को गिरफ्तार कर पहले सिवनी जेल में और बाद में बैतूल जेल में रखा गया था। बैतूल जेल के जिस कक्ष में वे रहते थे, वह आज भी विद्यमान है। अब जेल को तोड़ा जा रहा है, तो स्वयंसेवकों की इच्छा है कि उस कमरे को स्मारक के रूप में विस्तार दिया जाए

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
Jan 28, 2026, 10:53 pm IST
inसंघ @100, मध्य प्रदेश
2017 में बैतूल जेल में श्रीगुरुजी के चित्र पर माल्यार्पण करते सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत। इसी कक्ष में श्रीगुरूजी को रखा गया था

2017 में बैतूल जेल में श्रीगुरुजी के चित्र पर माल्यार्पण करते सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत। इसी कक्ष में श्रीगुरूजी को रखा गया था

यह सर्वविदित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी मध्य प्रदेश में बैतूल कारागार के बैरक क्रमांक एक में कैद रहे थे। वे यहां 1 जनवरी, 1949 से 13 जुलाई, 1949 तक बंदी रहे थे। जिस कमरे में उन्हें रखा गया था, वह आज भी एक लघु स्मारक के रूप में रिक्त रहता है। इस कक्ष में श्रीगुरुजी का एक चित्र लगा हुआ है। उनके कारागार प्रवास के संदर्भ में कक्ष की दीवार पर संक्षिप्त लेखन भी है। बैतूल जेल के इस लघु स्मारक को अब एक भव्य, दिव्य स्मारक में परिवर्तित करने की चाह देश भर के स्वयंसेवकों में है। 2017 में सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने भी जेल के इस कक्ष में जाकर श्रीगुरुजी को श्रद्धासुमन अर्पित किए थे।

उल्लेखनीय है कि गांधी जी की दु:खद हत्या के पश्चात् नेहरू सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। श्रीगुरुजी सहित लगभग 20,000 अग्रणी स्वयंसेवक गिरफ्तार कर लिए गए थे। उस समय के प्रसिद्ध मराठी समाचार पत्र ‘केसरी’ के संपादक गजानन विष्णु केतकर सरकार और संघ के मध्य संवाद करा रहे थे। वे 12 और 16 जनवरी, 1949 को श्रीगुरुजी से सिवनी कारागार में मिले थे। उन्होंने श्रीगुरुजी से संघ के सत्याग्रह को समाप्त करने का आग्रह किया था। श्रीगुरुजी ने परिस्थितियों का आकलन किया और आंदोलन स्थगित कर दिया। 22 जनवरी को संघ के सत्याग्रह प्रभारी महावीर जी ने आंदोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी।

यह भी एक स्मरणीय तथ्य है कि नेहरू जी की हठधर्मिता से संघ पर 1948 में लगे प्रतिबंध को हटाने की भूमिका भी बैतूल जेल के बैरक क्र. एक में ही लिखी गई थी। देश के प्रमुख समाचार पत्र ‘द ट्रिब्यून’ ने संघ पर लगे प्रतिबंध को अनैतिक बताते हुए लिखा, “अब नेहरू सरकार को संघ से प्रतिबंध हटा लेना चाहिए।”

संघ के इस आंदोलन के प्रति देश की जनता में बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए नेहरू सरकार घबरा गई थी। सरकार ने तत्काल ही पासा फेंका और पं. मौलिचन्द्र शर्मा को संघ से चर्चा करने हेतु आगे बढ़ाया। इस समय तक श्रीगुरुजी को सिवनी कारागार से बैतूल कारागार में स्थानांतरित किया जा चुका था। 10 जुलाई को मौलिचन्द्र शर्मा श्रीगुरुजी से भेंट करने बैतूल जेल आए थे। बैतूल जेल से ही श्रीगुरुजी एवं मौलिचन्द्र शर्मा की चर्चा के आधार पर सरकार ने 12 जुलाई को संघ से प्रतिबंध हटाया और 13 जुलाई को प्रातः समय में श्रीगुरुजी को बैतूल जेल से मुक्त कर दिया गया था। (संदर्भ श्रीगुरुजी समग्र, खंड 2, पृष्ठ 45)

बैतूल जेल से निकलने के तत्काल बाद ही श्रीगुरुजी जीटी एक्सप्रेस से नागपुर चले गए थे। श्रीगुरुजी के बैतूल से प्रस्थान के समय का एक किस्सा संघ परिकर में बहुधा ही कहा-सुना जाता है। कहा जाता है कि श्रीगुरुजी ने बैतूल स्टेशन पर छोड़ने आए स्वयंसेवकों से कहा था, “जिस दिन बैतूल में संघ का कार्य सुदृढ़ और संपुष्ट हो जाएगा, उस दिन समूचे देश में संघ विचार सुदृढ़ हो जाएगा।”

बैतूल जेल में श्रीगुरुजी के बंदी रहने के समय को दुखद, किंतु ऐतिहासिक काल कहा जाता है। श्रीगुरुजी ने इस विकट अग्निपरीक्षा के समय में अद्भुत धैर्य का परिचय देते हुए बैतूल जेल से अनेक पत्रों व संवादों के माध्यम से देशभर के स्वयंसेवकों के मनोबल को बनाए रखा था तथा देश के वातावरण में राष्ट्रीयता का प्रवाह भी किया था। समूचे देश के लाखों स्वयंसेवक और सामान्य जनता श्रीगुरुजी के संदेशों हेतु बैतूल जेल की ओर टकटकी लगाए देखती थी। बैतूल देश की धड़कनों के केंद्र में आ गया था।

बैतूल जेल में रहते हुए ही श्रीगुरुजी ने नेहरू सरकार पर इतना दबाव बना लिया था कि सरकार को न चाहते हुए भी श्रीगुरुजी को जेल से मुक्त करना पड़ा था। इससे पहले तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी नेहरू जी पर अंगुली उठाते हुए एक पत्र लिखा था, “बापू की हत्या की जांच में हो रही प्रगति पर मैने प्रायः प्रतिदिन ध्यान दिया है। सभी प्रमुख अपराधियों ने अपनी गतिविधियों के लंबे और विस्तृत वक्तव्य दिए हैं। उन वक्तव्यों से यह बात भी स्पष्ट रूप से उभर कर आती है कि इस सारे मामले में संघ कहीं भी संलिप्त नहीं है।” (संदर्भ श्रीगुरुजी समग्र दर्शन-2, पृष्ठ 2-10)

श्रीगुरुजी को बैतूल कारागार में नाना प्रकार से प्रताड़ित किया गया था। उन्हें भोजन, पहनने को कपड़े व कंबल आदि अत्यंत निम्नस्तरीय दिए जाते थे। वे तो निस्पृह योगी थे। एक संन्यासी थे। उन्होंने बैतूल जेल में मिले उस संपूर्ण गरल को नीलकंठ बन अपने कंठ में स्थिर कर दिया था। बैतूल जेल उनके लिए एक साधना केंद्र जैसी हो गई थी।

बैतूल जेल में श्रीगुरुजी ने संघ का संविधान तैयार करने का काम शुरू किया और फिर उसे पूर्ण किया था और अपने हस्ताक्षर के साथ इसे जारी किया था। श्रीगुरुजी का बैतूल जेल प्रवास संघ के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था और बैतूल की यह जेल संघ के संविधान की जन्मस्थली बनी।

वहां रहते हुए श्रीगुरुजी ने राजनाति में शुचिता, पवित्रता व समाज योगदान के संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ बहुत व्यापक पत्राचार किया। इन पत्रों को बाद में ‘Justice on Trial’ नामक पुस्तक में प्रकाशित भी किया गया था।

श्रीगुरुजी ने तत्कालीन सरकार से आग्रह किया था कि यदि संघ के विरुद्ध कोई साक्ष्य है तो उसे सार्वजनिक किया जाए, अन्यथा प्रतिबंध हटाकर स्वयंसेवकों को राष्ट्र-निर्माण में योगदान देने दिया जाए। बैतूल कारागार में रहते हुए श्रीगुरुजी उस समय के उदारवादी नेता टी.आर.वी. शास्त्री से सतत संपर्क में थे। शास्त्री जी ने भी नेहरू-गांधी की सरकार और श्रीगुरुजी के बीच मध्यस्थता की थी।

आत्ममुग्ध नेहरू और अंग्रेजीदां शैली से चलने वाली उनकी सरकार ने संघ पर नाना प्रकार के आरोप लगाए थे। श्रीगुरुजी ने जेल में रहते हुए ही समूचे राष्ट्र को स्पष्ट कर दिया था कि संघ एक घोर राष्ट्रवादी, संस्कृति-केंद्रित और समाज आधारित संगठन है। तत्कालीन गृह सचिव आर.एन. बनर्जी ने गांधी हत्या में संघ की संलिप्तता के मिथ के संदर्भ में सार्वजनिक तौर पर कहा था, “संपूर्ण, गहन व सघन जांच की गई है, जिसमें संघ की गांधी जी की हत्या में रंच मात्र भी भूमिका नहीं दिखती है।”

आज बैतूल की यह ऐतिहासिक जेल टूटने की कगार पर है। आवश्यकता इस बात की है कि जेल परिसर में ‘श्रीगुरुजी कक्ष’ को उनकी स्मृति कक्ष के रूप में संजोए रखा जाए। एक स्मारक के रूप में सुरक्षित रखा जाए। समूचा देश बैतूल जेल के इस कक्ष को एक विशाल, भव्य स्मारक के रूप में देखना चाहता है।

Topics: संघ का संविधानसरदार पटेल का पत्रश्रीगुरुजीमोहनराव भागवतसंघ पर प्रतिबंधपाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीश्री माधव सदाशिवराव गोलवलकरगांधी की हत्या
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
*मूलतः बैतूल मप्र से हैं. *छ: पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. *'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित *कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित *नियमित स्तम्भकार हैं *गिरमिटिया श्रमिकों पर केंद्रित उपन्यास 'बेसुआ' शीघ्र प्रकाश्य *विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं *शौकिया लेखन करते हैं [Read more]
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