मध्य-पूर्व एक बार फिर गंभीर तनाव के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तीखी बयानबाज़ी, सैन्य हलचल और युद्ध की आशंकाओं ने पूरे क्षेत्र को चिंता में डाल दिया है। ऐसे हालात में चीन ने अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं और खुद को शांति के समर्थक तथा संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश की है।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच चीन की सक्रियता- सोमवार, 26 जनवरी को चीन के विदेश मंत्री और उपराष्ट्रपति वांग यी ने बीजिंग में इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के महासचिव से अहम बातचीत की। OIC में 57 इस्लामिक देश शामिल हैं और इसे मुस्लिम देशों का एक बड़ा मंच माना जाता है। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी वक्त सैन्य टकराव की स्थिति बन सकती है। दरअसल, इससे ठीक एक दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान की ओर एक “आर्माडा” यानी बड़ा नौसैनिक बेड़ा भेजा है। ट्रंप के मुताबिक यह तैनाती “एहतियात” के तौर पर की जा रही है, लेकिन इसके पीछे का संदेश साफ था। उन्होंने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वहां प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई या ईरान ने दोबारा परमाणु कार्यक्रम शुरू किया, तो इसके गंभीर नतीजे होंगे।
5,000 मौतों के दावे से हालात बेहद गंभीर– इस बयान के बाद हालात और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए। ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी दी कि अगर ईरान पर कोई भी हमला किया गया, तो उसे “पूर्ण युद्ध” माना जाएगा। यानी सिर्फ जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर संघर्ष की आशंका जताई गई। इसी बीच ईरान से एक और चौंकाने वाला दावा सामने आया। एक ईरानी अधिकारी ने कहा कि देश में आर्थिक संकट के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान अब तक करीब 5,000 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन इस दावे ने हालात की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।
इन सभी घटनाओं के बीच चीन की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है। विदेश मंत्री वांग यी ने OIC के महासचिव से बातचीत के दौरान साफ कहा कि चीन मध्य-पूर्व में टकराव या सैन्य कार्रवाई के पक्ष में नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान बातचीत, सहयोग और राजनीतिक रास्ते से ही निकाला जाना चाहिए। चीन के विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक, वांग यी ने मध्य-पूर्व के लिए एक “क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदारी” बनाने की बात कही। उनका मानना है कि अगर क्षेत्र के देश आपस में भरोसे और सहयोग का ढांचा तैयार करें, तो स्थिरता लाई जा सकती है।
वैश्विक नियमों की रक्षा पर चीन का जोर- वांग यी ने यह भी कहा कि चीन इस्लामिक देशों और अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर उनके वैध अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए तैयार है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि दुनिया को “जंगल के कानून” की ओर लौटने से रोका जाना चाहिए, जहां ताकतवर देश अपनी मर्जी से फैसले थोपते हैं। परोक्स रूप से वांग यी ने अमेरिकी नीतियों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो रही है। उन्होंने इशारा किया कि जब कोई देश जब चाहे, जिस पर चाहे टैरिफ या दबाव डाल दे, तो यह अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ है।
उधर, अमेरिका भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले दिनों में एक एयरक्राफ्ट कैरियर और कई गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर युद्धपोत मध्य-पूर्व क्षेत्र में पहुंचने वाले हैं। इससे यह साफ है कि अमेरिका सैन्य दबाव बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में चीन की OIC के साथ बातचीत एक रणनीतिक कदम है। बीजिंग यह दिखाना चाहता है कि वह सिर्फ आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी भी है, जो संकट के समय संवाद और शांति की पहल कर सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव सिर्फ क्षेत्रीय समस्या नहीं है। इसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है। ऐसे में चीन की यह कूटनीतिक पहल आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अहम भूमिका निभा सकती है।

















