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उभरती वैश्विक धुरी है भारत

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के ‘मध्यम शक्तियों’ के जवाब में भारत ने दावोस में साफ संदेश दिया कि वह केवल ‘उभरती अर्थव्यवस्था’ नहीं, बल्कि ‘उभरता हुआ वैश्विक धुरी‑देश’ है। इसमें आर्थिक मजबूती, निवेश अवसर और नैतिक‑सहयोगात्मक नेतृत्व क्षमता भी है

Written byनागार्जुननागार्जुन
Jan 24, 2026, 05:07 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
दावोस में मध्यप्रदेश सहित कुछ राज्यों ने समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए

दावोस में मध्यप्रदेश सहित कुछ राज्यों ने समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य के बीच दावोस आर्थिक मंच के 55वें वार्षिक सम्मेलन में भारत ने अपनी स्थिति को तीन स्तरों पर स्पष्ट किया-आर्थिक स्थिरता, भरोसेमंद निवेश गंतव्य और उत्तरदायी वैश्विक नेतृत्व की भूमिका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति के बावजूद भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने दृढ़ संदेश दिए, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों, भू-राजनीतिक तनावों और सतत विकास की मांगों से प्रभावित हैं। प्रतिनिधिमंडल में अनेक केन्द्रीय मंत्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।

आर्थिक मजबूती : भारतीय प्रतिनिधियों और कॉर्पोरेट जगत ने जोर दिया कि वैश्विक अनिश्चितता, टैरिफ युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और तकनीकी व्यवधानों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत स्थिर और टिकाऊ है। यह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। यूपीआई जैसे डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश, बढ़ती उत्पादन क्षमता और तेजी से सुधरते कारोबारी माहौल को बार-‑बार सामने रखा गया। इसने यह संदेश दिया कि भारत केवल ‘संभावना’ नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन कर रही अर्थव्यवस्था’ है। भारत ‘विकास इंजन’ की भूमिका निभा सकता है और दीर्घकालिक निवेशकों के लिए जोखिम ‑समायोजित बेहतर अवसर प्रदान करता है।

भरोसेमंद निवेश गंतव्य : प्रतिनिधिमंडल ने ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से निवेशकों को आकर्षित किया, जो अमेरिका-चीन व्यापार तनावों के दौर में भारत को वैकल्पिक केंद्र के रूप में स्थापित करता है। दावोस में भारत की उपस्थिति केवल केंद्र स्तर तक सीमित नहीं रही, विभिन्न राज्यों ने भी अपने ‑अपने ‘इन्वेस्ट इंडिया’ मॉडल को आक्रामक रूप से पेश किया। इससे यह भरोसा मजबूत हुआ कि निवेश सिर्फ ‘घोषणा’ नहीं रहेगा, बल्कि धरातल पर परियोजनाओं में बदलने की संभावना अधिक है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण है कि भारत में नीति जोखिम केवल केंद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों के स्तर पर भी समझा और प्रबंधित किया जा सकता है। कई राज्य ‘प्रतिस्पर्धी सुधार’ कर रहे हैं। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखंड, आंध्र जैसे राज्यों द्वारा बड़े पैमाने पर निवेश समझौते, नवीकरणीय ऊर्जा, आईटी, विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए।

कार्नी ने खुलकर की भारत की प्रशंसा

स्विट्जरलैंड के दावोस में 19-23 जनवरी तक चले विश्व आर्थिक मंच से अमेरिका के वैश्विक दबदबे को चुनौती देकर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने वैश्विक बहस छेड़ दी है। अमेरिकी नीतियों की आलोचना करते हुए उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व वाली ‘नियम आधारित’ विश्व व्यवस्था को कमजोर और भारत जैसी मध्यम शक्ति को नई विश्व व्यवस्था का केंद्र बताया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका दशकों तक वैश्विक राजनीति का केंद्र बना रहा, लेकिन अब यह टूटने की कगार पर है। ट्रंप की टैरिफ नीतियों, ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश और एकतरफा दबाव पर निशाना साधते हुए कार्नी ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी, ‘यदि आप मेज पर नहीं हैं तो मेन्यू पर हैं।’ उन्होंने छोटे-मध्यम देशों से एकजुट होने की अपील की, क्योंकि बड़ी शक्तियां अब आर्थिक एकीकरण को दबाव का हथियार बना रही हैं।

दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर कार्नी जब ट्रंप की नीतियों का विरोध और भारत से विश्व का नेतृत्व करने की पैरवी कर रहे थे, तो वे किसी की लिखी हुई स्क्रीप्ट नहीं पढ़ रहे थे। वे अपने विचार दुनिया भर में पहुंचा रहे थे कि भारत, चीन, दक्षिण अमेरिकी ब्लॉक मर्कोसुर और यूरोपीय संघ की अनदेखी करने का मतलब है कि वैश्विक व्यवस्था टूट रही है, क्योंकि अमेरिका संबंधों को सहेजने में नाकाम साबित हुआ है। कार्नी ने अमेरिका का नाम लिए बिना कहा, ‘‘बड़ी ताकतों को खुश करने से कुछ नहीं होगा। ‘छोटे और मध्यम आकार के देशों को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि नियमों का पालन करने से उन्हें सुरक्षा मिलेगी। अब ऐसा नहीं होने वाला है।’’ कनाडा खुद भी अमेरिका पर निर्भरता कम कर रहा है। मार्क कार्नी ने कई देशों के साथ संबंध सुधारने की बात की है। इसमें चीन-कतर से रणनीतिक साझेदारी, भारत, आसियान, थाईलैंड, फिलीपींस और मर्कोसुर के साथ मुक्त व्यापार वार्ताएं जैसे प्रयास शामिल हैं।

कार्नी का बयान केवल कूटनीतिक टकराव नहीं, बल्कि 1945 के बाद बनी एकध्रुवीय दुनिया के खात्मे का ऐलान है। ट्रंप की टैरिफ, ग्रीनलैंड पर दावे जैसे कदम सहयोगी देशों (कनाडा, यूरोप) को ही विद्रोही बना रहे हैं। यह शक्ति संतुलन परिवर्तन का प्रारंभिक लक्षण है। कार्नी का भारत-चीन-मर्कोसुर उल्लेख वैश्विक शक्ति विकेंद्रीकरण को दर्शाता है। यानी, एक सुपरपावर के बजाय मध्यम शक्तियों का गठबंधन उभर रहा है।

ब्रिक्स का विस्तार, ग्लोबल साउथ की आवाज इसे पुष्ट करता है। ‘मेज पर नहीं तो मेन्यू पर’ चेतावनी इसी शक्ति पुनर्वितरण की मजबूरी है। दावोस में भारत का विशेष उल्लेख वैश्विक नेतृत्व परिवर्तन का संकेत है। अमेरिका ढलान पर, यूरोप पस्त, चीन अविश्वसनीय-भारत की सॉफ्ट पावर (वसुधैव कुटुम्बकम्) ही विश्व को एकजुट कर सकती है। कनाडा का मुक्त व्यापार प्रस्ताव शक्ति केंद्रों के इसी पुनर्निर्धारण का प्रमाण है। इस आर्थिक मंच से फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ लगाने की ट्रंप की धमकी की निंदा को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। मैक्रों ने नए टैरिफ के ‘लगातार बढ़ने’ को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि ऐसा ‘खासकर तब अस्वीकार्य है जब उनका इस्तेमाल क्षेत्रीय संप्रभुता के खिलाफ दबाव बनाने के लिए किया जाए।’ उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वैश्विक व्यवस्था ‘अस्थिरता और असंतुलन’ के दौर में है।

घटता दबदबा

कार्नी के बयान के जवाब में दावोस में अपने 70 मिनट के भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि ‘कनाडा अमेरिका की वजह से जिंदा और सुरक्षित है’, उनकी निराशा को दर्शाता है। सहयोगी द्वारा ही अमेरिका को चुनौती देना, इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि उसका वैश्विक प्रभुत्व घट रहा है। ‘गोल्डन डोम’ जैसे हथियार थामने की कोशिश असफल सिद्ध हो रही है। ऐसे में विश्व अपेक्षा कर रहा है कि अमेरिका-चीन की ‘दादागिरी’ के विकल्प के रूप में भारत नई शक्ति के रूप में उभरे। मार्क कार्नी इसी का आह्वान कर रहे हैं। 

वैश्विक नेतृत्व की नई कसौटी

19 जनवरी को दिल्ली के वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और आईआईएम मुंबई के सहयोग से ‘रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स’ जारी किया। सूचकांक में भारत 16वें, जबकि चीन 68वें स्थान पर है। इसमें 154 देशों का मूल्यांकन तीन स्तंभों-आंतरिक, पर्यावरणीय और बाह्य जिम्मेदारी के आधार पर किया गया है। यह जिम्मेदारी संस्थागत ढांचे, नीतियों, शासन गुणवत्ता और वास्तविक परिणामों से आंकी गई है, न कि इरादों या पहचान से।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत शांति-स्थापना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में मजबूत भूमिका निभाता है। साथ ही, ग्लोबल साउथ की बात जिम्मेदारी से उठाता है। यह सूचकांक दुनिया को देखने का बिल्कुल नया नजरिया पेश करता है। यह रिपोर्ट नहीं पूछती कि कौन-सा देश सबसे अमीर, सबसे शक्तिशाली या सबसे प्रभावशाली है, बल्कि यह एक सरल और सार्थक सवाल उठाती है कि देश अपने नागरिकों, अन्य देशों और हम सबकी साझा धरती के प्रति कितना जिम्मेदार व्यवहार करता है? रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स दुनिया से आग्रह करता है कि वह नेतृत्व की परिभाषा बदले और शक्ति के बजाय देखभाल, न्याय और जिम्मेदारी को उसका मानदंड बनाए।

रिपोर्ट के अनुसार, नजरिये में बदलाव आवश्यक है, क्योंकि वैश्विक समस्याएं (जलवायु परिवर्तन, युद्ध, असमानता, मानवीय संकट) संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि शक्ति के गलत उपयोग या उपेक्षा से उपजती हैं। आज के जुड़े विश्व में जिम्मेदारी नैतिक सलाह नहीं, स्थिरता और साझा कल्याण आवयक है। नेतृत्व का अर्थ किसी देश के आकार या ताकत से नहीं, बल्कि इससे तय होता है कि वह कितनी समझदारी, नैतिकता व दूरदर्शिता से शासन, सहयोग व भविष्य की रक्षा करता है। दशकों से वैश्विक सूचकांक उत्पादन पर केंद्रित रहे। जीडीपी, प्रतिस्पर्धा, सैन्य व्यय, नवाचार रैंकिंग को ही राष्ट्रीय सफलता का संकेतक माना गया।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि संपन्नता और जिम्मेदारी के बीच कोई रैखिक संबंध नहीं है। उच्च-आय वाले देश शीर्ष प्रदर्शनकर्ताओं में हैं, लेकिन पैटर्न एकसमान नहीं है। कई विकसित देश वैश्विक औसत के आसपास या नीचे हैं, खासकर पर्यावरणीय जिम्मेदारी और शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आचरण में। अधिक कार्बन उत्सर्जन, सीमित जलवायु महत्वाकांक्षा और दबावपूर्ण या लेन-देन वाली विदेश नीति इसके प्रमुख कारण हैं। वहीं, कई उच्च-मध्यम और निम्न-मध्यम आय वाले देश अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन करते हैं और कई मामलों में अमीर देशों के बराबर या उनसे आगे हैं।

  • जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व : भारत ने दावोस में खुद को केवल पारंपरिक औद्योगिक केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की तकनीक-अर्थव्यवस्था के प्रमुख खिलाड़ी के रूप में प्रस्तुत किया। इस बात पर जोर दिया गया कि जी-20 की अध्यक्षता के अनुभव से प्रेरित भारत ने जलवायु परिवर्तन, डिजिटल समावेशन और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उत्तरदायी भूमिका निभाई है। कृत्रिम बुद्धिमता, डिजिटल नवाचार, 5जी/6जी और घरेलू टेक कंपनियों की परियोजनाओं (जैसे भारतीय कंपनियों के एआई और भाषा‑ प्रौद्योगिकी परियोजना) के माध्यम से यह दिखाया गया कि भारत सिर्फ उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि नवाचार ‑निर्माता भी है। केंद्रीय मंत्रियों और प्रतिनिधियों ने नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा संक्रमण, ग्रीन हाइड्रोजन, सौर और पवन ऊर्जा में भारत की महत्वाकांक्षा और प्रगति को रेखांकित किया। संदेश स्पष्ट था—भारत आने वाले दशक के ‘हरित विकास’ में केंद्रीय भूमिका निभाना चाहता है और ‘क्लाइमेट रिस्पॉन्सिबिलिटी’ के साथ विकास कर सकता है। यह वैश्विक निवेशकों और नीति‑-निर्माताओं के लिए संकेत है कि भारत भविष्य की ‘क्लाइमेट ‑फ्रेंडली और टेक‑ड्रिवन’ वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक विश्वसनीय साझेदार बनेगा।कुल मिलाकर दावोस सम्मेलन में भारत ने 5 मुख्य बातें दुनिया के सामने रखीं
  • भारत एक तेज, स्थिर और सुधार ‑प्रधान अर्थव्यवस्था है, जो वैश्विक मंदी के बीच भी भरोसेमंद विकास दे सकती है।
  •  भारत सिर्फ राजधानी‑ केंद्रित नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी राज्यों वाला बड़ा और विविध निवेश‑ मानचित्र है।
  •  भविष्य की टेक और हरित अर्थव्यवस्था में भारत केंद्रीय भूमिका में आने की तैयारी कर चुका है।
  • भारत टकराव नहीं, सहयोग और संतुलन की भाषा बोलने वाली ‘जिम्मेदार शक्ति’ है, जो ग्लोबल साउथ की आवाज बनने को तैयार है।
  •  जो भी देश और निवेशक आने वाले दशक में स्थिर साझेदारी, बड़े बाजार और विश्वसनीय नीति‑ फ्रेमवर्क की तलाश में हैं, उनके लिए भारत को नजरअंदाज करना रणनीतिक गलती होगी।

भारत ने खुद को ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत किया, जो अमेरिका, ‑चीन जैसी महाशक्ति-‑प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बना सकता है। यह टकराव नहीं, संवाद और समन्वय की भाषा बोलता है। ग्लोबल साउथ, विकासशील देशों और ऊर्जा‑-खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत की हाल की भूमिका (वैक्सीन, अनाज, आपदा‑ सहायता, डिजिटल सार्वजनिक संपत्तियां साझा करने की पेशकश आदि) ने यह बताने में मदद की कि भारत केवल ‘अपना हित’ नहीं देखता, बल्कि व्यापक वैश्विक हित को भी सामने रख सकता है। इस तरह दावोस में भारत ने यह साफ संदेश दिया कि वह केवल ‘उभरती अर्थव्यवस्था’ नहीं, बल्कि ‘उभरता हुआ वैश्विक धुरी‑ देश’ है, जहां आर्थिक मजबूती, निवेश अवसर और नैतिक‑ सहयोगात्मक नेतृत्व, तीनों साथ-‑साथ उपस्थित हैं।

Topics: डिजिटल सार्वजनिक ढांचाविकास इंजन‘ग्लोबल साउथ’वसुधैव कुटुम्बकम्पाञ्चजन्य विशेषउभरती वैश्विक धुरीमध्यम शक्तिविश्व आर्थिक मंचआर्थिक और निवेशआर्थिक स्थिरताभरोसेमंद निवेश
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