संगम तट पर कल्प-साधना
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संगम तट पर कल्प-साधना

इस समय प्रयागराज में संगम तट पर कल्पवास चल रहा है। हजारों साधक कठिन दिनचर्या का पालन करते हुए धर्म-कर्म कर रहे हैं। माघ मेले के नाम से विख्यात इस अनुष्ठान में आने वाला हर श्रद्धालु मोक्ष प्राप्ति की कामना के साथ भाग लेता है

Written byहरि मंगलहरि मंगल
Jan 20, 2026, 04:53 pm IST
inविश्लेषण, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति
संगम तट पर साधु और श्रद्धालु

संगम तट पर साधु और श्रद्धालु

पौष पूर्णिमा के साथ ही प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा प्रस्फुटित हो रही हैं। 800 हेक्टेयर की रेतीली भूमि पर साधु-संतों, श्रद्धालुओं के लिए निर्मित तंबू-कनात और घास-फूस की झोपड़ियां एक अलौकिक नगर का आभास करा रही हैं। यहां आने वाला हर कोई भक्ति और अध्यात्म के रस में डूबा हुआ है। प्रशासन और तीर्थ-पुरोहितों का मानना है कि इस वर्ष माघ मास में यहां लगभग 5 लाख श्रद्धालु गृहस्थ जीवन से इतर “कल्पवास” का संकल्प लेकर संन्यासी जैसा जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। कल्पवास के लिए दूरदराज से आए श्रद्धालुओं का बस एक ही लक्ष्य है कि मोक्ष मिले।

सनातन परंपरा

संगम तट पर कल्पवास की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। इसका जिक्र पुराणों और रामायण में मिलता है। त्रिवेणी संगम के तट पर कल्पवास का आशय है पौष पूर्णिमा से लेकर माघ पूर्णिमा तक संकल्प लेकर एक माह संगम क्षेत्र में स्थाई रूप से निवास करना। इस अवधि में तीन बार संगम में स्नान, भूमि पर शयन, स्वयं द्वारा निर्मित केवल एक समय सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य का पालन और सांसारिक मोहमाया त्याग कर पूजा-पाठ, ध्यान, दान और मेले में चल रही कथा का श्रवण करना शामिल है। संतों के अनुसार, इस अवधि में झूठ बोलने और किसी प्रकार की निंदा करने से बचना आवश्यक होता है।

प्रयागराज में ऐसे श्रद्धालुओं की संख्या बहुत अधिक है, जिनके यहां पीढ़ी-दर पीढ़ी से कल्पवास की परंपरा चली आ रही है तथा तमाम श्रद्धालु ऐसे हैं, जो कई वर्षों से कल्पवास करने आते हैं। सामान्य परंपरा में यहां 12 वर्ष के कल्पवास का चक्र माना जाता है। कल्पवासी द्वारा 12 वर्ष में शैया-दान या भोज देने की मान्यता है। अधिकांश लोग शैया-दान या भोज करके अगले चक्र का कल्पवास प्रारंभ करते हैं। पारिवारिक जीवन की सुख-सुविधा त्याग कर कल्पवास के लिए आए श्रद्धालु बातचीत में स्वीकार करते हैं कि यहां श्रद्धा और भक्ति में ऐसा मन लगा रहता है कि कड़ाके की ठंड या असुविधाओं की ओर ध्यान ही नहीं जाता है।

भाई से मिली प्रेरणा

भरतपुर, जिला सीधी से आए 72 वर्षीय विजय बहादुर पांडेय कल्पवास कर रहे हैं। उच्च्तर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक रहे श्री पांडेय कहते हैं, “पहले मेरी बड़ी माता लक्ष्मी बाई कल्पवास करने आती थीं। उन्होंने लगभग 22-24 वर्ष कल्पवास किया। फिर उनके बेटे लक्ष्मीकांत पांडेय ने सपरिवार 15 वर्ष तक कल्पवास किया। अब अस्वस्थ होने के कारण वे केवल स्नान के लिए संगम आते हैं। भाई की प्रेरणा और यहां के बारे में सुन कर मेरे मन में भी कल्पवास का विचार आया। मां गंगा की कृपा हुई और 2013 से नियमित आ रहा हूं। कल्पवास की दिनचर्या में प्रातः काल स्नान, भूमि पर शयन और एक समय भोजन शामिल है। यह सब करके आनंद आ रहा है। यहां शांत वातावरण है और माया-मोह से दूर है।”

मां गंगा की कृपा

विमल कुमार दुबे कल्पवास करने को मां गंगा की कृपा मानते हैं। ओमानंद जी महराज के शिविर में रह रहे लोहगरा बाजार, प्रयागराज निवासी 72 वर्षीय दुबे कहते हैं, “जीवन में बहुत कष्ट था। आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी, लेकिन यहां आने के बाद सब व्यवस्थित हो गया। बच्चे नौकरी में लग गए, घर-गृहस्थी, बेटे-बहुएं सब ठीक चल रहा है।” वे कहते हैं, “इस बार कल्पवास के 14 वर्ष पूरे हो जाएंगे। शैया-दान की तैयारी है, लेकिन उसके बाद भी कल्पवास का संकल्प चलता रहेगा।” विमल कुमार दुबे की प्रेरणा से रमाकांत शुक्ल भी इस वर्ष उनके साथ कल्पवास करने आए हैं। 65 वर्षीय रमाकांत कहते हैं, ”बहुत दिनों से विचार बन रहा था। सोचा कि जब अंत में इसी मार्ग पर जाना है तो देर क्यों किया जाए। मां गंगा की शरण में आए हैं तो वह तो सब जानती हैं, कल्याण तो होगा ही।”

पीढ़ी दर पीढ़ी हो रहा कल्पवास

75 वर्षीया पार्वती पांडेय बेलम-बरौधा, मिरजापुर की रहने वाली हैं। वे पिछले करीब 35 वर्ष से कल्पवास कर रही हैं। पार्वती के पति सरकारी सेवा में थे। इस कारण उनको अवकाश नहीं मिलता था, तो पार्वती अकेली ही कल्पवास का संकल्प लेती रही हैं। अब पति का निधन हो चुका है। 2015 में कल्पवास का एक भंडारा कर चुकी हैं, लेकिन कल्पवास उसके बाद भी अनवरत जारी है। साथ में आए उनके बेटे धर्मराज बताते हैं, “माता जी को मां गंगा पर अटूट विश्वास है। वह अब भी दो बार स्नान करने जाती हैं।

पिछले वर्ष उनकी आंख का आपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने स्नान करने के लिए मना किया था, लेकिन माता जी पूरे माह स्नान करने जाती रहीं। वह अपना खाना स्वयं बनाती हैं। भगवान शालिग्राम की नियमित पूजा और भोग उनकी दिनचर्या में शामिल है।” कल्पवास के लिए प्रेरणा कहां से मिली! इस सवाल पर पार्वती कहती हैं, “यह पारिवारिक परंपरा है। मेरी सास और ससुर बालकृष्ण पांडेय कल्पवास करते थे। उनके माता-पिता भी कल्पवास करने आते थे। अब हम और हमारे बच्चे भी उसी राह पर चल रहे हैं।”

बचपन से गंगा भक्त

राम बहादुर पटेल रेलवे में कर्मचारी थे। 2015 में सेवानिवृत्त हुए तो उन्हें मां गंगा के चरणों में रहने की इच्छा हुई। इसके लिए उन्हें कल्पवास सबसे अच्छा माध्यम दिखा। वे कई वर्ष से कल्पवास कर रहे हैं। राम बहादुर का गंगा से नाता बचपन से है, क्योंकि उनके गांव चोरबना मेजा, प्रयागराज के समीप से ही गंगा बहती है। वे बताते हैं, ”सेवानिवृत्ति से पहले ही कई शुभचिंतकों ने कल्पवास करने की सलाह दी थी। इसलिए कल्पवासी हो गया हूं। मां गंगा की कृपा से कल्पवास अच्छे से चल रहा है और कोई बाधा नहीं आई है।” कल्पवास के संकल्प में मां गंगा से क्या मांगते हैं? इस प्रश्न पर वे कहते हैं, “मां तो सब जानती हैं, उनसे मांगना क्या? जीवन में सब कुछ मिल गया है। बाकी तो माया-मोह का संसार है। सबको कुछ न कुछ कमी रहती ही है।”

पिता की राह पर कल्पवास

गिरजा शंकर पांडेय इंटर कॉलेज में अध्यापक थे। दो वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हुए हैं। संगम क्षेत्र से लगभग 30 किमी दूर रैया, सोराम के रहने वाले पांडेय के पिता माता प्रसाद पांडेय लंबे समय तक कल्पवास करते रहे। अस्वस्थ होने के कारण अब वे कल्पवास नहीं करते हैं। अब उनके पुत्र गिरजा कल्पवास करते हैं। वे कहते हैं, “कल्पवास का संकल्प विधि-विधान से पूर्ण करना आसान कार्य नहीं है।” उनके साथ उनकी पत्नी भी कल्पवास कर रही हैं।

संगम तट पर अधिकांश श्रद्धालुओं का कल्पवास संकल्प पौष पूर्णिमा से प्रारंभ होकर माघ पूर्णिमा तक चलेगा। यद्यपि तमाम श्रद्धालु मकर संक्रांति या उसके बाद प्रतीकातमक रूप से कल्पवास करने आते हैं और सप्ताह या उससे अधिक अवधि तक रुक कर कल्पवास करते हैं। जानकारों के अनुसार एक माह से कम अवधि के कल्पवास का कोई शास्त्र-सम्मत विधान नहीं है, बल्कि इसे गंगा तट पर धार्मिक अनुष्ठान कहना ज्यादा उचित होगा।

Topics: धार्मिक परंपराशालिग्राम पूजाश्रद्धालु और साधककल्पवासीसंन्यासी जीवनसात्विक दिनचर्याब्रह्मचर्यपौराणिक महत्वपाञ्चजन्य विशेषमोक्ष प्राप्तित्रिवेणी संगममाया-मोह का त्यागसनातन परंपरागंगा भक्तप्रयागराज संगमनियम और संयमपवित्र स्नानएक समय भोजन
हरि मंगल
हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार। संस्कृति के जानकार। विभिन्न समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित। [Read more]
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