प्राचीन भारत वैज्ञानिक दृष्टि से रहा विश्व का पथ प्रदर्शक : डॉ. कृष्ण गोपाल
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प्राचीन भारत वैज्ञानिक दृष्टि से रहा विश्व का पथ प्रदर्शक : डॉ. कृष्ण गोपाल

आरएसएस सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय शिक्षा और विज्ञान पर विमर्श किया, वैश्विक परिदृश्य पर ज्ञान प्रस्तुत करने पर जोर।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Jan 17, 2026, 08:04 pm IST
in उत्तर प्रदेश, संघ @100

वाराणसी (हि.स.) । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी शनिवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृति विश्वविद्यालय में आयोजित भारतीय प्राचीन शिक्षा व्यवस्था एवं उसके बहुआयामी ज्ञान-विज्ञान पर केन्द्रित विमर्श में हिस्सा लिया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत न केवल आध्यात्मिक चेतना का केन्द्र था, अपितु वह व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक ज्ञान की दृष्टि से विश्व का पथ प्रदर्शक रहा है।

प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था और वैश्विक महत्ता

डॉ कृष्णगोपाल जी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न स्वरूपों पर चर्चा की। उन्हाेंने लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व की भारतीय शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप, उसकी वैज्ञानिक दृष्टि तथा वैश्विक महत्ता का उल्लेख किया। कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के इन प्रामाणिक पक्षों को ठोस सन्दर्भों, शास्त्रीय प्रमाणों एवं अनुसंधानात्मक दृष्टि के साथ वैश्विक पटल पर प्रस्तुत किया जाए।

विभिन्न विषयों पर गहन विमर्श

डॉ. कृष्णगोपाल जी ने विश्वविद्यालयीय आचार्यों के साथ व्याकरण एवं भाषा शास्त्र, स्थापत्य एवं नगर नियोजन, भवन निवेश एवं निर्माण विज्ञान, पाकशास्त्र, रसायन विज्ञान, वस्त्र निर्माण, धातु विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान एवं खगोल विद्या, चिकित्सा विज्ञान तथा गणित विद्या जैसे विविध विषयों पर गहन विमर्श किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन सभी विषयों में प्राचीन भारत की उपलब्धियाँ केवल सैद्धान्तिक नहीं थीं, बल्कि वे व्यावहारिक, प्रयोगसिद्ध एवं समाजोपयोगी थीं।

विश्वविद्यालय आचार्यों से आग्रह

उन्होंने विश्वविद्यालय के आचार्यों से आग्रह किया कि वे इन विषयों पर प्रामाणिक ग्रन्थों, शास्त्रीय परम्पराओं, पुरातात्त्विक साक्ष्यों एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर गहन शोधकार्य करें तथा भारतीय बौद्धिक वैभव को विश्व समुदाय के समक्ष आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करें।

भारतीय ज्ञान परम्परा का वैश्विक महत्व

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का सम्यक् उद्घाटन न केवल राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय है, बल्कि यह मानवता के समग्र कल्याण से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

विश्वविद्यालय प्रशासन का स्वागत और प्रतिबद्धता

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने उनका स्वागत किया। और बताया कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक प्रस्तुतीकरण के लिए निरन्तर प्रतिबद्ध है। उन्होंने आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय के आचार्यगण एवं शोधार्थी प्राचीन भारतीय विज्ञान, तकनीक एवं शिक्षा पद्धति पर संगठित एवं दीर्घकालिक शोध के माध्यम से इस दिशा में सार्थक योगदान देंगे।

विमर्श में शामिल अन्य विद्वान और संत

इस विमर्श में विष्णु स्वामी सम्प्रदाय के सतुआ बाबा पीठ के पीठाधीश्वर संतोष दास बाबा, प्रो.रामपूजन पाण्डेय, प्रो.जितेन्द्र कुमार, प्रो.रमेश प्रसाद, प्रो.राजनाथ, डॉ.रविशंकर पाण्डेय, डॉ.दिव्यचेतन ब्रह्मचारी, डॉ.मधुसूदन मिश्र तथा डॉ.ज्ञानेन्द्र सापकोटा आदि भी शामिल रहे।

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