गत दिनों लंदन में एक पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग ने 14 वर्षीया नाबालिग सिख लड़की का अपहरण किया और उसके साथ करीब आधा दर्जन मजहबी उन्मादियों ने सामूहिक दुष्कर्म किया। लड़की ने भागने की कोशिश की तो उसे डराया-धमकाया गया। जैसे ही इस घटना की जानकारी वहां रहने वाले सिख समुदाय को मिली तो करीब 200 सिख आरोपी के घर के बाहर पहुंचे और उस पीड़िता को दुष्टों से मुक्त करा लिया। हालांकि इसके लिए सिखों को काफी हंगामा करना पड़ा।
यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि उस देश की अंतरात्मा पर लगा वह सवाल है, जिसका जवाब देने से हर संस्था बचती रही कि जब एक बच्ची मदद के लिए चीख रही थी, तब पुलिस-प्रशासन क्या रहा था? दुनिया भर के लोगों ने सोशल मीडिया पर कहा कि पश्चिमी लंदन के हॉन्सलो इलाके में सामने आया यह मामला किसी एक दिन की घटना नहीं है। यह उन तमाम असफलताओं का नतीजा है, जो वर्षों से धीरे-धीरे जमा होती रहीं। पुलिस की लापरवाही, प्रशासन की हिचक, राजनीति की चुप्पी और समाज की असहज खामोशी के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसी घटनाओं पर सिख विद्वान बाबा हरजीत सिंह रसूलपुर कहते हैं, “यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित हमला है और सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस पर बड़े-बड़े देश मुंह सिले बैठे हैं। अब तक 15,000 से ज्यादा बच्चियां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. की देखरेख में चलने वाले ग्रूमिंग नेटवर्क का शिकार हो चुकी हैं।”
यह आंकड़ा कोई कपोल-कल्पना नहीं, सभ्यता के मुंह पर तमाचा है। लेकिन हैरानी है कि इतनी बड़ी घटना पर न ‘सिस्टम’ जाग रहा है, न तथाकथित मानवाधिकार के ठेकेदार बोल रहे हैं! बाबा हरजीत सिंह ने यह भी कहा, “यह सिर्फ बच्चियों का शोषण नहीं, यह एक ‘मिशन’ है। यह एक गंदी और खतरनाक सोच है, जो हमारी बेटियों को निशाना बना रही है।”

सबसे बड़ा खतरा
उस 14 साल की लड़की को स्कूल जाना चाहिए था, खेलना चाहिए था, सुनहरे सपने देखने चाहिए थे। लेकिन उसके हिस्से में आया डर, कैद, धमकी और ऐसा दर्द, जिसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता। उसे पहले भरोसे में लिया गया। फिर भावनात्मक जाल में फंसाया गया। धीरे-धीरे उससे उसकी दुनिया छीनी गई। परिवार से दूरी, दोस्तों से कटाव, और अंत में-पूरी तरह अकेलापन। यही वह क्षण होता है जब अपराधी जीतने लगते हैं, क्योंकि जब कोई बच्चा अकेला पड़ जाता है, तो कानून की सबसे ऊंची दीवार भी उसे नहीं बचा पाती, अगर ‘सिस्टम’ पहले से चौकन्ना न हो। और यही है लव-जिहाद! इस मामले में भी यही हुआ। जब पहली बार खतरे के संकेत दिखे, तब सख्ती नहीं आई। जब सवाल उठे, तब संदेह को टाल दिया गया। जब शिकायतें पहुंचीं, तब प्रक्रिया का हवाला दिया गया और इसी देरी की कीमत चुकाई-एक बच्ची ने।
सबसे भयावह बात यह नहीं है कि अपराध हुआ। सबसे भयावह बात यह है कि अगर सिख समुदाय खुद खड़ा न होता, अगर मामला सोशल मीडिया तक न पहुंचता, तो शायद यह सिख बच्ची आज भी उन्हीं शैतानों के चंगुल में होती। यानी इंसाफ अदालत से नहीं, सड़क से होकर आया। इस मामले में खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू की चुप्पी पर सिख समाज नाराज है। सामाजिक कार्यकर्ता सरदार रविरंजन सिंह कहते हैं, “जो लोग दिन-रात सिखों के नाम पर राजनीति करते हैं, जो खुद को ‘पंथ का नेता’ बताते हैं, वे इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? क्यों नहीं बोलते ‘कौर टू खान’ जैसे मूवमेंट पर? क्यों नहीं सवाल उठाते कि सिख बेटियों पर अत्याचार कर उन्हें किस दिशा में धकेला जा रहा है?’’ उन्होंने कहा कि अगर किसी के अंदर सच में सिख पंथ के संस्कार हैं, तो उसे पहले सिख बेटियों की सुरक्षा की बात करनी चाहिए, न कि सिर्फ नारेबाजी करनी चाहिए।

क्या है ग्रूमिंग गैंग
यूके में ग्रूमिंग गैंग्स का मुद्दा मुख्य रूप से पाकिस्तानी मुस्लिम मूल के पुरुषों से जुड़ा रहा है। ये गैंग धोखे से (महंगी कारों, महंगे उपहारों का लालच, ड्रग्स आदि), जबरन या फर्जी भावनात्मक लगाव दिखाकर कम आयु की गैर-मुस्लिम लड़कियों को फंसाते हैं। फिर उनका यौन शोषण या बलात्कार करते हैं। इसके बाद उन्हें देह व्यापार में धकेल देते हैं। इनमें बड़ी संख्या में हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियां भी शामिल हैं। शोध बताते हैं कि ये अपराध मजहबी और नस्लीय पूर्वाग्रह से प्रेरित होते हैं, जहां गैर-मुस्लिम लड़कियों को ‘काफिर’ या ‘शर्माने वाली’ मानकर शोषण किया जाता है। ब्रिटेन में यह सिलसिला 1980 के दशक से चल रहा है। यॉर्कशायर के रॉदरहैम में 1997 से 2013 के बीच कम से कम 1,400 लड़कियों का यौन शोषण किया गया।
कई रिपोर्ट्स में ‘एशियन’ शब्द का प्रयोग किया गया है। हिंदू और सिख समुदायों ने इसका विरोध किया है, क्योंकि पीड़ित होने के बावजूद यह उन्हें बदनाम करता है। 2025 की यूके की सरकारी रिपोर्ट ‘नेशनल ऑडिट ऑन ग्रुप-बेस्ड चाइल्ड सेक्शुअल एक्सप्लॉइटेशन’ के अनुसार अपराधियों में एशियन (मुख्य रूप से पाकिस्तानी) पुरुषों की संख्या असमानुपातिक है। रिपोर्ट में सिख और हिंदू लड़कियों को लक्षित करने के मामले शामिल हैं। पीड़ितों में मुख्यत: 10-15 साल की लड़कियां होती हैं। इस रिपोर्ट में ‘कल्चरल और रिलीजियस ड्राइवर्स’ की जांच की सिफारिश की गई है।
होम ऑफिस की 2020 रिपोर्ट : इसके अनुसार ग्रूमिंग गैंग्स में कोई एक एथनिक समूह (जैसे मुस्लिम या पाकिस्तानी) ओवर-रिप्रेजेंटेड नहीं है। इसने क्विलियम फाउंडेशन की 2017 की रिपोर्ट का खंडन किया, जिसमें 84 प्रतिशत अपराधी एशियन (पाकिस्तानी मुस्लिम) बताए गए थे। फाउंडेशन की रिपोर्ट में 58 मामलों का विश्लेषण, सिख लड़कियों को लक्षित करने का पैटर्न और सिख-हिंदू समुदायों द्वारा उनकी लड़कियों को निशाना बनाने की शिकायतें दर्ज हैं। रिपोर्ट में अपराध मजहबी पूर्वाग्रह से प्रेरित बताया गया है। (स्रोत : gov.uk/ ucl.ac.uk)
बीबीसी इनसाइड आउट (2013) : एक डॉक्यूमेंट्री में मुस्लिम पुरुषों द्वारा सिख लड़कियों के ग्रूमिंग के मामले दिखाए गए। रिपोर्ट में कहा गया कि यह 1980 के दशक से हो रहा है और अपराधी लड़कियों को ‘शर्म’ के डर से चुप कराते हैं। (स्रोत : mdpi.com)
सिख नेटवर्क सर्वे (2016) : इसके अनुसार हर 7 में से 1 सिख महिला (14 प्रतिशत) ग्रूमिंग गैंग्स का शिकार हुई। रिपोर्ट में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों द्वारा हिंदू और सिख लड़कियों को लक्षित करने का सबूत दिया गया। (स्रोत : reddit.com)
इनसाइट यूके रिपोर्ट (2025): ब्रिटेन में हिंदू और सिख लड़कियों को लक्षित करने के मामलों का उल्लेख, जहां अपराधी मुख्य रूप से पाकिस्तानी हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि बड़ी संख्या में हिंदू और सिख लड़कियां पीड़ित हैं, लेकिन डेटा अधूरा है।
(स्रोत :assets.publishing.service.gov.uk)
नेटवर्क ऑफ सिख ऑर्गेनाइजेशंस (2023): हिंदू-सिख संगठनों के संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि 1980 के दशक से सिख और हिंदू समुदाय पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स से पीड़ित हैं और अपराध धार्मिक नफरत से प्रेरित हैं। (स्रोत : insightuk.org)
सोती रही सरकार
लंदन की घटना अचानक नहीं हुई। यह उस लंबी श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें ब्रिटेन पहले भी कई बार शर्मिंदा हो चुका है। 2014 में आई रोदरहैम की ऐतिहासिक जांच रिपोर्ट ने यह उजागर किया था कि कैसे हजारों नाबालिग लड़कियां वर्षों तक शोषण का शिकार होती रहीं और जिम्मेदार संस्थाएं चुप रहीं। रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि समस्या सिर्फ अपराधियों की नहीं थी, समस्या थी संस्थागत असफलता की। इसके बाद रोचडेल, ऑक्सफोर्ड, टेलफोर्ड और न्यूकैसल—हर जगह वही कहानी दोहराई गई। लड़कियां छोटी थीं। कमजोर थीं। वे मदद चाहती थीं। और ‘सिस्टम’ हर बार देर से जागा। हॉन्सलो की यह सिख बच्ची उसी इतिहास की नई पीड़िता बन गई।
जब एक नाबालिग सुबह से रात तक किसी फ्लैट में कैद कर ली जाए है, तो यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सार्वजनिक चेतावनी होती है। यह संकेत होता है कि निगरानी व्यवस्था विफल हो चुकी है, चेतावनी तंत्र सुस्त हो चुका है, जवाबदेही कागजों में सिमट चुकी है। और जब जवाबदेही मर जाती है, तब इंसानियत को खुद मैदान में उतरना पड़ता है। हॉन्सलो में यही हुआ। लोग इकट्ठा हुए-गुस्से में नहीं, मजबूरी में। वे इसलिए नहीं उतरे कि उन्हें हंगामा करना था। वे इसलिए उतरे क्योंकि उन्हें लगा अगर अब भी चुप रहे, तो अगली बार कोई और बच्ची उन हैवानों का शिकार बनेगी।

नहीं ली कोई सीख
हर बड़े कांड के बाद उसकी जांच होती है, रिपोर्ट आती है, लेकिन जमीन पर वही पुरानी कमजोरियां जमी रहती हैं। यह वही देश है जिसने मानवाधिकारों पर दुनिया को भाषण दिए, जिसने बाल संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय मंचों से ऊंचे आदर्श घोषित किए। मगर जब अपने ही शहरों में नाबालिगों की सुरक्षा की बारी आती है, तो विफल हो जाता है। अगर ब्रिटेन की सरकार इन घटनाओं के प्रति थोड़ी भी सजग रहती तो रोदरहैम के बाद रोचडेल न होता; रोचडेल के बाद टेलफोर्ड न होता; और आज हॉन्सलो की बच्ची के साथ यह दरिंदगी न होती। यह उस वृहत् समाज की भी परीक्षा है, जो दावा करता है कि वह बच्चों के अधिकारों का रक्षक है, क्योंकि जब एक देश अपने सबसे कमजोर नागरिक को नहीं बचा पाता, तो उसकी सारी ताकत, सारी व्यवस्था, सारी नैतिकता, सिर्फ एक खोखला दिखावा बनकर रह जाती है।
प्रतिक्रिया
- ये रेप गैंग्स हैं, जो 30 से अधिक वर्ष से सिख, हिंदू और ईसाई लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। हमने 200 से अधिक मामलों की जांच की है और लड़कियों को बचाया है। अपराधी परिवार-आधारित नेटवर्क हैं।
– मोहन सिंह, सिख अवेयरनेस सोसाइटी के संस्थापक - यह ब्रिटिश समाज पर धब्बा है, जो सिख और हिंदू समुदायों को प्रभावित कर रहा है। जांच में ‘रेस और रिलिजन’ को शामिल किया जाए।
– लॉर्ड इंद्रजीत सिंह, निदेशक, नेटवर्क ऑफ सिख ऑर्गेनाइजेशंस - हमने हजारों सिख लड़कियों को बचाया है, लेकिन पुलिस की लापरवाही के कारण जेल जाना पड़ा। अपराधी सिख लड़कियों को ‘कौर टू खान’ प्रोजेक्ट के तहत लक्षित करते हैं। इसमें ईसाई लड़कियां भी शामिल हैं। (अर्थात् अपराधी सिख लड़कियों को ‘कौर’ (सिख सरनेम) से पहचानकर ‘खान’ (पाकिस्तानी सरनेम) बनने का प्रलोभन देते हैं। यह लव जिहाद का ब्रिटिश संस्करण है।) – सिख यूथ यूके
- फोस्टर केयर में सिख लड़कियां भी ग्रूमिंग का शिकार हुई हैं।
– दीपा सिंह, प्रमुख, सिख यूथ यूके - प्रधानमंत्री की ‘एशियन ग्रूमिंग गैंग्स’ शब्दावली से हम नाराज हैं, क्योंकि यह सभी एशियाई लोगों को बदनाम करती है। हमारी हिंदू और सिख लड़कियां भी पीड़ित हैं।
– कृष्णा भान, हिंदू काउंसिल, यूके - ‘एशियन’ शब्द का इस्तेमाल गलत है, क्योंकि अपराधी मुख्य रूप से पाकिस्तानी हैं और हम खुद पीड़ित हैं।
– हिंदू फोरम ऑफ ब्रिटेन - गैर-मुस्लिम लड़कियां (सिख, हिंदू, ईसाई) मजहबी नफरत के कारण लक्षित की जाती हैं। रॉदरहैम की ग्रूमिंग गैंग के चंगुल से बचकर भागने वाली एक पीड़िता ने कहा कि ‘व्हाइट स्लैग’ और ‘नॉन-मुस्लिम’ कह कर उसका शोषण किया गया।
– जॉइंट फेथ ग्रुप स्टेटमेंट (हिंदू, सिख, ईसाई) - ‘एशियन’ शब्द से हम आहत हैं, क्योंकि पाकिस्तान में ईसाई, हिंदू और सिख लड़कियां अपहरण और कन्वर्जन का शिकार होती हैं और यूके में भी यही पैटर्न है।
– क्रिश्चियन पाकिस्तानी ग्रुप्स - क्रिश्चियन लड़कियां भी ग्रूमिंग गैंग्स का प्रमुख निशाना हैं, लेकिन डेटा में जानबूझकर कमी रखी जाती है। अपराध मजहबी श्रेष्ठता की मानसिकता से प्रेरित हैं। गैर-मुस्लिम लड़कियों को ‘काफिर’ या ‘कमतर’ मानकर यौन शोषण को जायज ठहराया जाता है।
– जॉइंट फेथ ग्रुप स्टेटमेंट (हिंदू, सिख, ईसाई)
रोदरहैम जांच रिपोर्ट में साफ लिखा था कि कई लड़कियों को सामूहिक बलात्कार के बाद यह कहकर चुप कराया गया था कि अगर किसी को बताया तो तुम्हारे परिवार को नुकसान होगा।
यह सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक यंत्रणा भी थी। रोचडेल मामले में अदालत के सामने हुई गवाही में एक लड़की ने कहा था, “मुझे लगा, मैं पहले ही मर चुकी हूं। अब बस सांस ले रही हूं।’’ यह ‘सिस्टम’ पर लगा एक तमाचा है। और यही ‘सिस्टम’ हॉन्सलो में भी सवालों के घेरे में है। रोदरहैम रिपोर्ट में कहा गया था कि कहीं हम अपराधियों से अधिक अपनी छवि को तो नहीं बचा रहे? हॉन्सलो की घटना ने इस सवाल को फिर जिंदा कर दिया है।
पिछले बीस वर्ष में ब्रिटेन में कम से कम तीन बड़ी जांचें हुईं- रोदरहैम, टेलफोर्ड और इंडिपेंडेंट इन्क्वायरी इन टू चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज। हर रिपोर्ट ने एक ही बात कही- संस्थागत विफलता। हर रिपोर्ट ने सिफारिशें दीं-बेहतर पुलिस ट्रेनिंग, फास्ट-ट्रैक कोर्ट। पीड़ितों के लिए सुरक्षित सहायता तंत्र, सोशल मीडिया पर निगरानी। लेकिन जमीन पर बदला क्या? अगर बदला होता, तो हॉन्सलो में यह सिख बच्ची इस हालत में न होती। और यही इस मामले की सबसे बड़ी त्रासदी है। अब बात भावनाओं की नहीं रह गई है। अब यह मामला संवेदना का नहीं, जवाबदेही का है, क्योंकि जब एक देश बार-बार यह साबित कर देता है कि वह अपने बच्चों की रक्षा नहीं कर पा रहा, तब सवाल यह नहीं रह जाता कि अपराधी कौन हैं, सवाल यह उठता है कि ‘सिस्टम’ किसके साथ खड़ा है?


ज्यादातर बलात्कारी पाकिस्तानी
गत वर्ष लंदन सहित अनेक शहरों में ब्रिटेन के लोगों ने लड़कियों के साथ हो रहे अपराधों को लेकर प्रदर्शन किया था। इनका समर्थन अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क ने भी किया था। मस्क ने ब्रिटिश लड़कियों के यौन शोषण के मामले में पर्याप्त कार्रवाई न करने के लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर की कड़ी आलोचना भी की थी। ब्रिटेन की एक जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में पुरुषों के कई गिरोह खासतौर से ब्रिटिश लड़कियों को अपने जाल में फंसाते हैं। गिरोहों में ज्यादातर पाकिस्तानी मूल के पुरुष हैं। हालांकि इनमें कुछ अरबी मूल के भी हैं। उनकी नजर गरीब, उपेक्षित लड़कियों पर रहती है।
कौन है जिम्मेदार है
लंदन की इस घटना के लिए जिम्मेदार कौन है! वह पुलिस, जिसने शिकायतों के बावजूद तुरंत कार्रवाई नहीं की! स्थानीय प्रशासन, जिसने इसे ‘संवेदनशील’ मामला कहकर टाल दिया! या फिर वह राजनीतिक नेतृत्व, जो हर बार बयान देकर पीछे हट जाता है! सच यह है कि इन सबकी सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। और जब जिम्मेदारी सामूहिक होती है, तो जवाबदेही भी सामूहिक होनी चाहिए। अब सिर्फ एक-दो अधिकारियों को निलंबित कर देने से बात नहीं बनेगी। अब सिर्फ ‘जांच के आदेश’ देकर अखबारों को शांत नहीं किया जा सकता। अब जरूरत है- संरचनात्मक बदलाव की। भारत तिब्बत संघ (अंतरराष्ट्रीय प्रभाग) के संयोजक सुखमिंदरपाल सिंह गरेवाल कहते हैं, “ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग्स ने आतंक मचा रखा है। हैरानी की बात यह है कि न तो वहां की सरकार इस पर खुलकर बोल रही है और न ही ‘खालिस्तान’ के नाम पर सिखों से पैसा इकट्ठा कर अपनी जेबें भरने वालों की ज़ुबान खुल रही है। यह आईएसआई द्वारा पोषित ‘कौर टू खान’ मुहिम की सबसे बड़ी साजिशों में से एक है, जिसने हजारों बेटियों का जीवन बर्बाद कर दिया है। कहां हैं वे तथाकथित नेता, जो हर समय सिखों के साथ कथित अत्याचार की बातें करते रहते हैं! कहां हैं वे मीडिया संस्थान, जिन्हें भारत अपने ही नागरिकों के लिए सुरक्षित नहीं दिखता! अब क्या वे इन सिख बेटियों से जुड़े मामलों पर कोई पॉडकास्ट या बहस नहीं करेंगे!”
सुखमिंदरपाल सिंह गरेवाल जैसे अनेक सिख हैं, जिनमें लंदन की घटना को लेकर बेहद गुस्सा है। इसलिए बाबा हरजीत सिंह रसूलपुर की बातों से सहमत होना होगा। वे कहते हैं, “आज सिख समाज को फैसला करना होगा कि हम किनके साथ खड़े हैं! जो लोग हमारी जड़ों, हमारी परंपराओं और हमारी पहचान के साथ नहीं खड़े हैं, उनसे दूरी बनाना मजबूरी और जरूरी है। क्योंकि अगर आज नहीं जागे तो कल ‘कौर टू खान’ जैसी सोच से अपनी बेटियों को बचाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।” उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हिंदू ही सिखों के साथ मुश्किल समय में भाईचारा निभा सकते हैं, क्योंकि हिंदुओं और सनातन के लिए जो कुर्बानियां सिख गुरुओं और सिख पंथ ने की है, उसके लिए हिंदू सदैव ही सिखों के ऋ णी हैं और रहेंगे। सिख समाज को चाहिए कि वह अपने असली मित्रों को पहचाने और फर्जी लोगों से सावधान रहे।”

















