मकर संक्रांति और पाञ्चजन्य: जब सूर्य के उत्तरायण होने के साथ शुरू हुआ राष्ट्र धर्म का नया अध्याय
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मकर संक्रांति और पाञ्चजन्य: जब सूर्य के उत्तरायण होने के साथ शुरू हुआ राष्ट्र धर्म का नया अध्याय

‘पाञ्चजन्य’ की सफलता का एकमात्र रहस्य यही हो सकता है कि उसका जन्म मुनाफाखोर, व्यावसायिकता के बजाय समाजनिष्ठ ध्येयवादी पत्रकारिता में से हुआ है। ध्येयवादी पत्रकारिता की यात्रा कभी सरल और सुगम नहीं हो सकती, इसलिए ‘पाञ्चजन्य’ की यात्रा स्वातंत्र्योत्तर ध्येय समर्पित और आदर्शवादी पत्रकारिता के संघर्ष की यशोगाथा है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Jan 15, 2026, 01:59 pm IST
inभारत

मकर संक्रांति के पावन दिन ही ‘पाञ्चजन्य’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति की प्राणवंत खुशियों के बीच, भगवान श्रीकृष्ण के शंखनाद के साथ इस साप्ताहिक का उद्घाटन हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी के संपादकत्व में यह पत्रिका न केवल स्वाधीन भारत के राष्ट्रनिर्माण के संकल्प का प्रतीक थी, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरक कहानियों और आदर्शों को जीवंत रखते हुए नए भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों की स्मृति दिलाती रही।

समर्पित पत्रकारिता का उदाहरण

‘पाञ्चजन्य’ केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता का प्रतीक है। अन्य प्रतिष्ठित साप्ताहिक जैसे ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ और ‘रविवार’ समय से पहले बंद हो गए, जबकि साधन कम होने के बावजूद ‘पाञ्चजन्य’ लगातार प्रकाशित होता रहा। इसका मुख्य रहस्य यह है कि यह मुनाफाखोरी और व्यावसायिकता से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित पत्रकारिता का उदाहरण है।

अविचलित निष्ठा, बदलते नाम

अटल बिहारी वाजपेयी के बाद इसके संपादक रहे- सर्वश्री राजीवलोचन अग्निहोत्री, ज्ञानेन्द्र सक्सेना, गिरीश चंद्र मिश्र, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, तिलक सिंह परमार, यादव राव देशमुख, वचनेश त्रिपाठी, रतन मलकानी, देवेन्द्र स्वरूप, दीनानाथ मिश्र, भानुप्रताप शुक्ल, रामशंकर अग्निहोत्री, प्रबल मैत्र, तरुण विजय, बल्देव भाई शर्मा और हितेश शंकर जी। भले ही नाम बदलते रहे, ‘पाञ्चजन्य’ की निष्ठा और स्वर अविचल रहे।

पाञ्चजन्य और पं. दीनदयाल का मार्गदर्शन

इस साप्ताहिक के जन्म और मार्गदर्शन का प्रेरक पं. दीनदयाल उपाध्याय थे। उन्होंने संपादक पद नहीं लिया, फिर भी स्वयं प्रूफ रीडर, कम्पोजिटर, मुद्रक और अन्य कार्य करते हुए इसे चलाया। 1968 में असामयिक मृत्यु तक वे इसके मार्गदर्शक रहे। उनके विचार और आदर्श ‘पाञ्चजन्य’ की ध्येय यात्रा का आधार बने। निर्भीक पत्रकारिता के कारण इसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। गांधी हत्या के बाद सरकार ने इसे रोकने की कोशिश की, संपादक और मुद्रक को जेल में डाला गया, लेकिन न्यायालय की मदद से प्रकाशन पुनः शुरू हुआ। 1959 में तिब्बत और 1962 में चीन युद्ध के समय सरकार की नीतियों की आलोचना की। 1972 में शिमला समझौते और 1975 के आपातकाल के दौरान यह अपने ध्येय पर अडिग रहा।

सत्य और निर्भीकता की प्रेरणा

लखनऊ से शुरू हुआ ‘पाञ्चजन्य’ 1968 में दिल्ली स्थानांतरित हुआ और यह राष्ट्रीय मंच पर अधिक प्रभावशाली बना। यह सामाजिक एकता, भौगोलिक अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण में प्रेरणा देता रहा। आज भी यह राष्ट्रहित, निर्भीक पत्रकारिता और समाज कल्याण के लिए अडिग है। ‘पाञ्चजन्य’ केवल पत्रिका नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी, सत्य और निर्भीकता की प्रेरणा है। इसकी ध्येयवादी पत्रकारिता ने इसे पाठकों का पसंदीदा और स्वतंत्र, साहसी पत्रकारिता का प्रतीक बना दिया है।

Topics: अटल जीPanchjanya Weeklyमकर संक्रांतिMakar SankrantiPt. Deendayal Upadhyayपाञ्चजन्य का इतिहासhistory of Panchajanyaमकर संक्रांति और पाञ्चजन्यअटल बिहारी वाजपेयीपाञ्चजन्य’की यात्रापाञ्चजन्यPanchajanya
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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