तुष्टिकरण की कीमत : वही भूल दोहरा रहा है पश्चिम, जानिए वैश्विक संकट की जड़ें और वर्षों की अनदेखी
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तुष्टिकरण की कीमत : वही भूल दोहरा रहा है पश्चिम, जानिए वैश्विक संकट की जड़ें और वर्षों की अनदेखी

भारत ने विभाजन और आतंक से जो सबक सीखा, वही गलती आज पश्चिम दोहरा रहा है। तुष्टिकरण, वैचारिक अंधापन और दोहरे मानदंड कैसे वैश्विक संकट बन रहे हैं— पढ़िए पूरा विश्लेषण।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Jan 14, 2026, 05:28 pm IST
in मत अभिमत

दुनिया आज जिस संकट से जूझ रही है, वह अचानक पैदा नहीं हुआ। यह वर्षों की अनदेखी, वैचारिक तुष्टिकरण और दोहरे मानदंडों का परिणाम है।

भारत का अनुभव और विभाजन की ऐतिहासिक भूल

भारत ने यह सच्चाई,हालांकि काफी देर से, पर सबसे पहले और सबसे भारी कीमत देकर सीखी। मुहम्मद अली जिन्ना का तर्क— कि परस्पर असंगत वैचारिक दृष्टियाँ एक ही राजनीतिक राष्ट्र में ज़बरन नहीं टिक सकतीं— “विभाजनकारी” कहकर खारिज कर दिया गया। गांधी का खोखला नैतिक सार्वभौमिकतावाद और नेहरू का पाखंडी संवैधानिक आदर्शवाद, विचारधारा की कठोर वास्तविकता को समझने में विफल रहे। नतीजा इतिहास है—विभाजन, रक्तपात, कश्मीर और दशकों का सीमापार आतंकवाद।

पश्चिमी लोकतंत्रों ने वही गलती दोहराई—बस देर से, और वैश्विक स्तर पर।

वैश्विक शहरों में उभरता समान पैटर्न

लंदन से पेरिस, न्यूयॉर्क से सिडनी तक, एक ही पैटर्न उभरता है। ऑस्ट्रेलिया के बॉन्डी बीच की हालिया हिंसा—जिसमें पाकिस्तान से आए पिता-पुत्र शामिल पाए गए—को “अलग-थलग घटना” बताना आत्म-धोखा है। यह नस्ल या सामान्य प्रवासन की नहीं, बल्कि वैचारिक अंधेपन की विफलता है।

चर्चिल की चेतावनी और आज की सच्चाई

सर विंस्टन चर्चिल ने दशकों पहले चेताया था कि जब इस्लामिक कट्टरता भाग्यवाद से जुड़ जाती है, तो वह सभ्य समाज को भीतर से खोखला कर देती है। आज उनकी बातों को “राजनीतिक रूप से गलत” कहा जाता है, लेकिन पश्चिमी देशों में घटती घटनाएँ उनकी चेतावनी को सही सिद्ध कर रही हैं।

कट्टरता का बदलता स्वरूप

खतरा अब रूप बदल चुका है। कट्टरता अब शोर नहीं मचाती—वह शिक्षित चेहरों के पीछे छिपती है। डॉक्टर, इंजीनियर, छात्र— समाज में घुले-मिले, पर वैचारिक रूप से कठोर।

शासन, सहिष्णुता और प्रवर्तन का द्वंद्व

शासन के निर्णयों ने स्थिति को और जटिल किया है। लंदन, मेयर सादिक़ ख़ान के नेतृत्व में, “पहले सहिष्णुता” वाले मॉडल का प्रतीक बन गया—जहाँ प्रवर्तन से अधिक छवि को प्राथमिकता दी गई। न्यूयॉर्क, अपने निर्वाचित मेयर के अधीन, आज उसी परीक्षा से गुजर रहा है: खुलेपन को बनाए रखते हुए वैचारिक जांच कैसे सुनिश्चित की जाए। जब कठिन सवालों को “आपत्तिजनक” बताकर टाल दिया जाता है, तो समानांतर समाज गहरे होते हैं और जन-विश्वास टूटता है।

आतंकवाद, दोहरे मानदंड और रणनीतिक पाखंड

यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास स्पष्ट होता है। अमेरिका और ब्रिटेन सार्वजनिक रूप से आतंकवाद की निंदा तो करते हैं, लेकिन उसी वैचारिक कारखाने को ईंधन देने वाले वित्तीय प्रवाह, कूटनीतिक नरमी और रणनीतिक निर्भरताएँ निर्णायक रूप से बंद नहीं करते—जिसका केंद्र लंबे समय से पाकिस्तान रहा है और जिसके दोहराव के संकेत अब अन्य जगहों पर दिख रहे हैं। नाम बदलते हैं, लेबल बदलते हैं, लेकिन व्यवस्था चलती रहती है।

हिंदू प्रवासी समुदाय और बढ़ता दोहरा मानदंड

इसके विपरीत, सबसे शांतिपूर्ण, कानून-पालन करने वाला और आर्थिक रूप से योगदान देने वाला हिंदू प्रवासी समुदाय बढ़ती संदेह-दृष्टि का सामना कर रहा है। मंदिरों पर हमले होते हैं, समुदाय की आवाज़ों पर निगरानी बढ़ती है, और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को चुपचाप “कट्टरता” के रूप में पेश किया जाता है। यह दोहरा मानदंड अब छिपा नहीं रह गया है।

तुष्टिकरण की कीमत और इतिहास की चेतावनी

तुष्टिकरण ने कभी कट्टरता को सभ्य नहीं बनाया। उसने टकराव को टालकर उसकी कीमत बढ़ाई है। जैसा कि चर्चिल ने चेताया था—मगरमच्छ को यह सोचकर खिलाना कि वह अंत में खाएगा, नीति नहीं, आत्म-भ्रम है। भारत यह सब पहले सीख चुका है।
पश्चिम अब सीख रहा है—देर से, भारी कीमत पर। इतिहास क्रूर नहीं होता; उसे अनदेखा करने वाले उसे दोहराने को मजबूर करते हैं।

Topics: दोहरे मानदंडChurchill warning radical Islamवैश्विक आतंकवादPakistan Terror Linksवैचारिक तुष्टिकरणपाकिस्तान फैक्टरचर्चिल चेतावनीहिंदू प्रवासीappeasement policy failurewestern democracies terrorismideological radicalismपश्चिमी लोकतंत्रHindu diaspora discrimination
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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