भारत में मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और दान-पुण्य का पावन संगम माना जाता है। यह पर्व नए सूर्य वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तभी मकर संक्रांति मनाई जाती है। इसी दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं, यानी उनका मार्ग दक्षिण से उत्तर की ओर हो जाता है। हिंदू धर्म में इस परिवर्तन को बेहद शुभ और कल्याणकारी माना गया है।
मकर संक्रांति पर खिचड़ी का विशेष महत्व- मकर संक्रांति के दिन तिल, गुड़, घी, अन्न और खिचड़ी का विशेष महत्व होता है। खासतौर पर उत्तर भारत में इस पर्व को खिचड़ी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घर-घर में खिचड़ी बनाई जाती है और गरीबों व जरूरतमंदों को दान दी जाती है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने और दान करने की परंपरा आखिर शुरू कैसे हुई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी को केवल साधारण भोजन नहीं, बल्कि महाप्रसाद माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन खिचड़ी का सेवन और दान करने से ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी, बुधवार को मनाया जाएगा।
खिचड़ी क्यों मानी जाती है शुभ- ज्योतिष शास्त्र में खिचड़ी की हर सामग्री का संबंध किसी न किसी ग्रह से बताया गया है। इसी कारण इसे संतुलित और शुभ भोजन माना जाता है। चावल को चंद्रमा से जोड़ा गया है, जो मन को शांत और स्थिर करता है। काली उड़द की दाल शनि देव से संबंधित मानी जाती है और शनि की साढ़ेसाती व ढैया के प्रभाव को कम करती है। हल्दी गुरु ग्रह का प्रतीक है, जो ज्ञान और शुभता में वृद्धि करती है। घी सूर्य देव से जुड़ा माना जाता है, जो शरीर को ऊर्जा देता है और स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है। हरी सब्ज़ियां बुध ग्रह से संबंधित हैं, जो बुद्धि और कार्यक्षेत्र में सफलता दिलाती हैं। एक खास मान्यता यह भी है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसके स्वामी शनि देव हैं। इस दिन खिचड़ी खाने और दान करने से सूर्य और शनि दोनों प्रसन्न होते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इससे पिता-पुत्र यानी सूर्य और शनि के बीच का वैमनस्य समाप्त होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
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खिचड़ी दान का महत्व- खिचड़ी की परंपरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा भी है। कहा जाता है कि इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर से हुई। खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगी भोजन के लिए भिक्षाटन में काफी समय लगा देते थे। इससे उन्हें अन्य कार्यों के लिए समय नहीं मिल पाता था। तब बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्ज़ियों को एक साथ पकाने की सरल विधि बताई, जिसे खिचड़ी कहा गया। यह जल्दी बन जाती थी और पौष्टिक भी होती थी। आज भी गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर भव्य खिचड़ी मेला लगता है, जहां लाखों श्रद्धालु खिचड़ी चढ़ाते हैं। इसी वजह से कई क्षेत्रों में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व कहा जाता है। मकर संक्रांति पर खिचड़ी दान का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन खिचड़ी दान करने से सूर्य और शनि देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन से दरिद्रता दूर होती है।

















