इस बार मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाएं या 15 जनवरी को संशय बना रहा। ऐसे ही दीपावली, रक्षाबंधन जैसे त्योहारों के समय भी इसी तरह का माहौल रहा। इस कारण पिछले दो-तीन साल से सोशल मीडिया पर भी कुछ बहस देखने में आती है कि पंचांग बनाने वाले सारे त्योहारों का मजा खराब कर रहे हैं। इससे युवा वर्ग का विश्वास भी पंचांग से उठता जा रहा है। जिनको हमारे पंचांग, तिथियों और खगोलीय घटनाओं की जानकारी नहीं है, उन्हें लगता है कि या तो हमारे पंचांग निर्माता ठीक नहीं हैं या फिर वे कुछ गड़बड़ी कर रहे हैं।
वैज्ञानिक कसौटी पर कसा है ज्ञान
परंतु हम यदि तथ्यात्मक रूप से इसके पीछे का कारण समझने का प्रयास करेंगे तो ध्यान में आता है कि अनंत काल से हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनि जिज्ञासु वृत्ति के रहे हैं। भारत में ज्ञान और विज्ञान एक—दूसरे के पूरक हैं। हमारे सारे तीज-त्योहार, हर धार्मिक अनुष्ठान का अपना एक वैज्ञानिक महत्व है। कौन-सा त्योहार किस तिथि को मनाया जाएगा, उस समय कौन-सी ऋतु होगी, उस तिथि में कौन–सा चौघड़िया शुभ है, कौन-सा व्यंजन बनेगा सब कुछ वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही तय किया गया है।
तिथियों का निर्धारण सूर्य-चंद्रमा की गति से किया
हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों ने तिथियों का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की परस्पर गति को आधार बनाकर किया है। वे जानते थे कि सूर्य की गति क्या है, चंद्रमा की गति, स्थिति और नक्षत्रों का समूह कैसा है। इसीलिए वे यह बता पाते थे कि कब पूर्णिमा होगी और कब अमावस्या। जब दुनिया यह भी नहीं जानती थी कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है तब हमारे पूर्वजों को यह पता था की चंद्रमा को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में लगभग 27 से 28 दिन का समय लगता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने चंद्र पथ के 27 दिन के होने के कारण चंद्र पथ में आने वाले तारा समूहों को 27 नक्षत्रों में बांटा है। इनके नाम हैं— अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मॄगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेशा, मघा, पूर्वा—फाल्गुनी, उत्तरा—फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती।
क्या है नक्षत्र मास
चंद्रमा के इस 27 दिन के समय को नक्षत्र मास भी कहते हैं। हर चंद्र मास में 30 निश्चित तिथियां होती हैं, जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में बंटी होती हैं। जब सूर्य और चंद्रमा एक स्थान या कहें कि एक ही अंश पर एक सीधी रेखा में होते हैं तब अमावस्या होती है। लगभग 27 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा पूरी कर लेने के कारण चंद्रमा का महीना अंग्रेजी कैलेंडर के महीने से लगभग 2 से 3 दिन छोटा होता है। अतः एक वर्ष में 11 दिन 3 घटी और 48 पल चंद्रमा का महीना सूर्य के महीने से छोटा होता है। इसी कारण हमारे पंचांग में हर 3 वर्ष में एक अतिरिक्त महीना आता है, जिसे हम अधिकमास कहते हैं।
सारे त्योहार पंचांग के अनुसार
हम सारे त्योहार पंचांग के अनुसार मनाते हैं। पंचांग पांच चीजों के मिश्रण से बना है— दिन, तिथि, नक्षत्र, करण और योग। इन्हीं पांच तत्वों का मिलान करके गणितीय गणना होती है और फिर पंचांग बनता है। पंचांग में समय गणना हेतु प्राण (4 सेकंड), विनाड़ी या पल (24 सेकंड), नाड़ी या घटी (24 मिनट) का उपयोग किया जाता है। इसमें 4,32,000 वर्ष का कलियुग, 8,64,000 वर्ष का द्वापर युग, 12,96,000 का त्रेता युग और 17,28,000 वर्ष का एक सतयुग होता है। इन चारों युगों को मिलाकर एक चतुरयुग होता है और ऐसे 71 चतुरयुगों का एक मन्वन्तर होता है और 14 मन्वंतरों का एक कल्प होता है और 1 कल्प जब पूरा होता है तो धरती पर प्रलय आती है।
कई वर्षों में विकसित हुई कालगणना
हमारी कालगणना श्रेष्ठ है, क्योंकि हमने कई वर्षों में इसे विकसित किया है। चंद्रमा पृथ्वी के जो चक्कर लगाता है उसे बराबर 30 भागों में हमने विभाजित किया है जिसके प्रत्येक भाग को हम तिथि कहते हैं। तिथि का समय कम या ज्यादा हो सकता है। चंद्र पथ पर चंद्रमा के हर 12 डिग्री दूरी तय करने पर एक तिथि हो जाती है। सूर्य और चंद्रमा द्वारा तय की गई दूरी के बीच का अंतर ही तिथि है। चूंकि सूर्य भी अपनी गति से चलता है। इसलिए कभी चंद्रमा यह 12 डिग्री का अंतर 24 घंटे में पाट देता है और कभी इससे अधिक या कम समय में भी पूरा कर लेता है और इसी कारण तिथि की वृद्धि या क्षय होता है।
तिथि में होती है वृद्धि
जब किसी तिथि में दो बार सूर्योदय हो जाता है तो उस तिथि की वृद्धि हो जाती है। जैसे किसी सोमवार को सूर्योदय प्रातः 5:48 मिनट पर हुआ और इस दिन सप्तमी तिथि सूर्योदय के पूर्व प्रातः 5:32 बजे प्रारंभ हुई और अगले दिन मंगलवार को सूर्योदय (प्रातः 5:47 बजे) के बाद प्रात: 7:08 बजे तक रही तथा उसके बाद अष्टमी तिथि प्रारंभ हो गई। इस तरह सोमवार और मंगलवार दोनों दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि होने से तिथि की वृद्धि मानी जाती है और दोनों दिन सप्तमी मनाई जाती है।
तिथि में होता है क्षय
जब किसी तिथि में एक बार भी सूर्योदय नहीं हो तो उस तिथि का क्षय हो जाता है। जैसे किसी बुधवार को सूर्योदय प्रातः 5:44 बजे हुआ और इस दिन द्वादशी तिथि सूर्योदय के बाद प्रातः 6:08 बजे समाप्त हो गई एवं त्रयोदशी तिथि प्रारंभ हो गई और त्रयोदशी तिथि अर्धरात्रि 3:52 बजे तक रही तत्पश्चात् चतुर्दशी तिथि प्रारंभ हो गई। त्रयोदशी तिथि में एक भी बार सूर्योदय नहीं हुआ। बुधवार को सूर्योदय के समय द्वादशी और गुरुवार को सूर्योदय (प्रातः 5:43) के समय चतुर्दशी तिथि रही, जिस कारण त्रयोदशी तिथि का क्षय हो गया। और इसी कारण अधिकांश अवसरों पर मूलतः सूर्य उदय के समय जो तिथि होती है उसी तिथि को दिन भर मनाया जाता है।
तिथि के अनुसार मनाएं त्योहार
इसलिए हमने तीज-त्योहारों पर जब तिथि एक साथ आती है तो अपने पंचांग और ज्योतिषियों पर शंका न करते हुए तिथि अनुसार त्योहार मनाना चाहिए और लोगों को भी इस विषय में जागृत करना चाहिए। क्योंकि पश्चिम का कैलेंडर केवल तारीखों तक सीमित है, जबकि हमारा कैलेंडर त्योहार, पूजा, काल, योग और खगोलीय गणना के साथ शुरू होता है। अंग्रेजी कैलेंडर में नया दिन रात को 12 बजे से शुरू हो जाता है, जबकि सनातन धर्म में सूर्य उदय के अनुसार दिन की शुरुआत होती है। और सूर्य उदय का समय हर दिन भिन्न होता है।
1952 में बनी पंचांग सुधार समिति
खंडित स्वतंत्रता के पश्चात नवंबर, 1952 में पंचांग सुधार समिति बनाई गई थी। इस समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और उन्होंने विक्रम संवत् को सरकारी काम-काज के लिए अपनाने की सिफारिश की थी, परंतु पंडित नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया और ग्रेगेरियन कैलेंडर को ही आधिकारिक रूप से अपनाया।
अब समय आ गया है कि हमें अपनी कालगणना के अनुसार हर कार्य करना चाहिए। इससे हमारी कालगणना को भी वही प्रतिष्ठा और पहचान मिल सकती ह्रै, जो अंग्रेजी कैलेंडर की है।
















