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दिल्ली दंगा : चित हुई चालाक चौकड़ी

नामचीन वकीलों की फौज, विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी उमर खालिद व शरजील इमाम जमानत नहीं दिला सके। सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपियों पर एक साल तक याचिका लगाने पर रोक लगाई। यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है, राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे पहले है

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Jan 10, 2026, 08:03 am IST
inभारत, विश्लेषण, दिल्ली
दिल्ली दंगे के षड्यंत्रकारी उमर खालिद और शरजील इमाम

दिल्ली दंगे के षड्यंत्रकारी उमर खालिद और शरजील इमाम

दिल्ली दंगे के षड्यंत्रकारी उमर खालिद और शरजील इमाम को सर्वोच्च न्यायालय ने दिखा दिया कि वकीलों की फौज, विपक्ष का विलाप, अंतरराष्ट्रीय जिहादी गिरोह का दबाव आदि उनके खूनी कारनामों और इरादों को ढक नहीं सकते। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों को जमानत नहीं दी और एक साल तक अपील करने पर भी रोक लगा दी। 53 लोगों की मौत का खून सिर पर लिए ये दोनों जिहादी विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय जिहादी गिरोह की जुगलबंदी से भारत की अदालतों में अब ‘बेल का गेम’ नहीं खेल सकेंगे। देश की कीमत पर इस्लामी तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले विपक्षी दलों के लिए यह सदमे जैसा है।

इन दंगाइयों को जेल से बाहर निकालने के लिए रचे गए चक्रव्यूह को समझिए। सर्वोच्च न्यायालय में देश के पांच सबसे बड़े वकील उनकी पैरवी के लिए उतरे। इतना ही नहीं, भारत में दंगे भड़काने वाले ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के सदस्यों की पैरवी अमेरिका तक से हो रही थी। न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित इस्लामवादी मेयर जोहरान ममदानी ने उमर खालिद को चिट्ठी लिखी। ‘तेरा-मेरा रिश्ता क्या’ तर्ज पर ममदानी ने खालिद के जेल में होने पर बहुत ‘दुख’ जताया था।

जेएनयू का माहौल बिगाड़ने का दुस्साहस

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उमर खालिद व शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज करने के बाद आधी रात को जेएनयू कैंपस में जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) और वामपंथी छात्र संगठनों ने प्रशासन व केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसमें ‘न्याय दो’, ‘रिहाई दो’, ‘मोदी-अमित शाह की कब्र खुदेगी जेएनयू की धरती पर’ जैसे नारे भी लगे।

इस पर विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री और अन्य को निशाना बनाने वाले भद्दे नारों से एक बार फिर जेएनयू की पवित्रता को नष्ट किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि अभियोजन के पास उमर खालिद व शरजील इमाम के खिलाफ दंगों में शामिल होने के सीधे, पुष्ट सबूत हैं। न्यायालय ने 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदुओं पर सुनियोजित हमलों के बड़े षड्यंत्र में उनकी ‘केंद्रीय और मुख्य भूमिका’ पर भी ध्यान दिया।

उमर-शरजील पर भारत की एकता व अखंडता के खिलाफ साजिश रचने का गंभीर आरोप है। यह जघन्य अपराध है। मुट्ठी भर लोगों ने सब्र रखने की बजाए आधी रात को जेएनयू कैंपस का माहौल खराब करने का दुस्साहस किया। यह दुर्भाग्यपूर्ण, शर्मनाक और कायरतापूर्ण कृत्य है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्राथमिकी दर्ज कराई है।

इसकी जांच हो और दोषियों को न्याय के कठघरे में लाया जाए। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी मनमानी करने का लाइसेंस नहीं देती। ‘कब्र खोदने’ जैसे नारे अभद्र, आपराधिक और अधिकारों का उल्लंघन हैं। ये नारे आंतरिक खतरों की याद दिलाते हैं, सतर्कता ही आजादी की असली कीमत है। सभी के लिए उचित होगा कि वे ट्रायल का इंतजार करें, जहां आरोपियों को बेगुनाही साबित करने का पूरा अवसर मिलेगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे पहले

5 जनवरी, 2026 का दिन भारत के न्यायिक इतिहास में याद रखा जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दिन जो फैसला सुनाया, वह कई मायनों में ऐतिहासिक है। देश के सबसे महंगे वकीलों की फौज सर्वोच्च न्यायालय में उमर खालिद, शरजील इमाम सहित कई अभियुक्तों की जमानत याचिकाओं पर पैरवी के लिए उतरी थी। कपिल सिब्बल और त्रिदीप पाइस जहां उमर खालिद की पैरवी कर रहे थे, वहीं, शरजील इमाम के पैरोकार सिद्धार्थ दवे थे। अन्य अभियुक्तों की पैरवी के लिए अभिषेक मनु सिंघवी और सलमान खुर्शीद मौजूद थे।
जितने भी दहशतगर्द जेल जाते हैं, उनके पैरोकार हमेशा अनुच्छेद-21 की ढाल लेकर खड़े हो जाते हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले इस संवैधानिक अनुच्छेद का इस्तेमाल राष्ट्र विरोधी गतिविधि की आड़ के लिए किया जाता रहा है। लेकिन इस बार शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यानी, यह हर सूरत में प्राप्त होने वाली चीज नहीं है।

जब किसी व्यक्ति (पढ़ें- उमर खालिद व शरजील इमाम) पर राष्ट्र की सुरक्षा, लोक-व्यवस्था और संप्रभुता को खतरा पहुंचाने वाले आरोप हों, तो राष्ट्र व समाज की सुरक्षा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी नहीं रह जाती। न्यायालय ने अपनी महत्वपूर्ण व्याख्या में कहा कि स्वतंत्रता को सामाजिक व्यवस्था व राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उमर खालिद और शरजील इमाम पर आरोप बड़ी साजिश (दिल्ली दंगें की) से जुड़े हैं। अभियोजन की यह बात बेमानी नहीं है कि ये दोनों केवल प्रदर्शनकारी नहीं थे, बल्कि वैचारिक, रणनीतिक, भीड़ जुटाने और समन्वय स्तर पर भी दिल्ली दंगों में कथित रूप से सक्रिय थे। न्यायालय ने दोनों अभियुक्तों के खिलाफ दाखिल चार्जशीट में व्हाट्सएप चैट, गवाहों के बयान, दिल्ली दंगे के सिलसिले में हुई बैठकों, इनके भाषणों और पूरी घटना की टाइमलाइन का उल्लेख करते हुए कहा कि ये आरोप निराधार व मनगढ़ंत नहीं लगते। इसलिए दोनों पर यूएपीए की धारा 43डी(5) लागू होती है, जो ऐसी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में जमानत के विरुद्ध है।

दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता

खालिद-शरजील जैसे मामलों में बचाव पक्ष की दलीलें अक्सर लंबी जेल अवधि, ‘जमानत एक नियम है’ और ‘बम-बंदूक का इस्तेमाल नहीं किया’ जैसे तथ्यों पर टिकी होती हैं। कई बार बचाव पक्ष मुकदमे को जान-बूझकर लंबा खींचता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कई साल जेल में रहना जमानत का आधार नहीं बन सकता। ऐसी गतिविधियों के लिए जब कानून में कठोर व्यवस्थाएं हैं, तो यह तर्क स्वीकार्य नहीं। न्यायालय ने यह भी कहा कि हिंसा में हथियार चलाने का प्रत्यक्ष प्रमाण न होना यूएपीए से बचाव नहीं देता। आतंकवादी गतिविधि की परिभाषा सिर्फ बम या बंदूक तक सीमित नहीं है। कोई भी गतिविधि, जो देश की एकता, अखंडता या लोक-व्यवस्था को नुकसान पहुंचाए, चाहे वह साजिश ही क्यों न हो, यूएपीए के दायरे में आती है। यूएपीए विशेष कानून है, जहां ‘जमानत एक नियम है’ का सिद्धांत लागू नहीं होता। यदि अभियोजन के आरोप प्रथम दृष्टया सही लगें, तो मुकदमा लंबा होने पर भी जमानत नहीं दी जा सकती। यदि परिस्थितियों में कोई बदलाव आता है, तो अभियुक्त एक साल बाद जमानत के लिए फिर आवेदन कर सकते हैं। इस फैसले से साफ है कि न्यायालय ने उमर खालिद व शरजील को अभी दोषी तो नहीं ठहराया, लेकिन यह मान लिया है कि इनके विरुद्ध दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता होने के पुख्ता सबूत हैं।

आरोपों में है दम

दिल्ली दंगों की मुख्य साजिश वाले आरोपपत्र में दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद पर निम्नलिखित आरोप लगाए हैं-

  •  आतंकी गतिविधियों में भागीदारी : यूएपीए धारा 15 के तहत दंगों को पूर्व-नियोजित आतंकी साजिश बताया है। उमर खालिद मुख्य साजिशकर्ता है।
  • आपराधिक साजिश : दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड था। इसने सीएए-एनआरसी के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार की और साजिश को अंजाम दिया।
  •  भड़काऊ भाषण : अमरावती, अलीगढ़ आदि जगहों पर हिंसा भड़काने वाले भाषण दिए, लोगों को हिंसा के लिए उकसाया।
  • चक्का जाम की साजिश : विभिन्न स्थानों पर चक्का जाम आयोजित कर आवश्यक सेवाओं को बाधित किया, जिससे हिंसा भड़की और आर्थिक सुरक्षा को खतरा हुआ।
  • गुप्त बैठकें : दंगे के अन्य आरोपियों ताहिर हुसैन, खालिद सैफी आदि के साथ गुप्त बैठकें कर दिल्ली दंगों की योजना बनाई।
  •  साजिश को अंजाम : व्हाट्सएप ग्रुप्स (जैसे दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप) के जरिए निर्देशन किया, लोगों को सड़क पर उतारा।
  • ट्रंप यात्रा का फायदा : अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा को खालिद ने अंतरराष्ट्रीय ध्यानाकर्षण का मौका बनाया, हिंसा की टाइमिंग तय की।
  • फंडिंग : विरोध प्रदर्शनों को हिंसा में बदलने के लिए संसाधन जुटाए।
    आरोपपत्र में व्हाट्सएप चैट्स, भाषण, लोकेशन डेटा और गवाहों के बयान शामिल हैं। दिल्ली दंगों (2020, उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा) की बड़ी साजिश वाले आरोपपत्र (एफआईआर 59/2020) में दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद का ताहिर हुसैन व अन्य आरोपियों से संबंध स्थापित किया है।
  •  8 जनवरी, 2020 : शाहीन बाग में उमर खालिद, ताहिर हुसैन और खालिद सैफी की गुप्त बैठक हुई।
  • दंगों की योजना : बैठक में ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान ‘बड़ा धमाका’ (बड़ी हिंसा) की साजिश रची गई, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम किया जा सके
  • ताहिर का बयान : पूछताछ में ताहिर हुसैन ने स्वीकार किया कि बैठक हुई थी और वह उमर खालिद के संपर्क में था।
  •  फंडिंग : पीएफआई के जरिए उमर खालिद ने ताहिर को फंडिंग व संसाधन मुहैया कराने का
    आश्वासन दिया।
Topics: पाञ्चजन्य विशेषअमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपमृदुल त्यागीसर्वोच्च न्यायालयसामाजिक व्यवस्थाशरजील इमामजेएनयू में विरोध प्रदर्शनउमर खालिददिल्ली दंगाकपिल सिब्बलराष्ट्रीय सुरक्षाअभिषेक मनु सिंघवीसलमान खुर्शीद
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