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भारतीय वैज्ञानिकों की क्वांटम छलांग, बिना छुए नापा जा सकेगा परमाणु घनत्व

भारतीय वैज्ञानिकों ने कोल्ड एटम्स का स्थानीय घनत्व बिना प्रभावित किए रियल-टाइम में मापने की तकनीक विकसित की। यह खोज क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम सेंसिंग में क्रांति ला सकती है।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Jan 8, 2026, 03:04 pm IST
inभारत, विज्ञान और तकनीक, दिल्ली

नई दिल्ली (हि.स.) । भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे ठंडे परमाणुओं (कोल्ड एटम्स) के स्थानीय घनत्व को वास्तविक समय में बिना उन्हें प्रभावित किए मापा जा सकता है। यह खोज क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम सेंसिंग जैसे भविष्य के अनुप्रयोगों के लिए बेहद अहम साबित हो सकती है, जहां परमाणुओं और उनके क्वांटम अवस्था का वास्तविक समय में पता लगाना बहुत जरूरी है। यह शोध दुनिया में क्वांटम भौतिकी में बड़ा बदलाव लाएगा।

कोल्ड एटम प्रयोगों की पारंपरिक तकनीक और सीमाएं

विज्ञान एवं प्रद्यौगिकी मंत्रालय के अनुसार परंपरागत कोल्ड एटम प्रयोगों में परमाणुओं को लेजर कूलिंग और ट्रैपिंग तकनीकों से लगभग शून्य तापमान तक ठंडा किया जाता है। इस अवस्था में उनके क्वांटम गुण अधिक स्पष्ट होते हैं। अब तक इन परमाणुओं की स्थिति जानने के लिए अवशोषण और फ्लोरेसेंस इमेजिंग जैसी विधियां प्रयोग में लाई जाती थीं लेकिन इन तकनीकों की सीमाएं हैं। घने परमाणु समूहों में अवशोषण इमेजिंग असफल रहती है, वहीं फ्लोरेसेंस इमेजिंग में अधिक समय लगता है और दोनों ही विधियां अक्सर परमाणुओं की अवस्था को बदल देती हैं।

आरआरआई वैज्ञानिकों द्वारा विकसित आरडीएसएनएस तकनीक

रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (आरआरआई) के वैज्ञानिकों ने रमन ड्रिवन स्पिन नॉइज स्पेक्ट्रोस्कोपी (आरडीएसएनएस) नामक तकनीक प्रदर्शित की है। यह तकनीक स्पिन नॉइज़ स्पेक्ट्रोस्कोपी को रमन बीम्स के साथ जोड़ती है। इसमें लेजर प्रकाश के ध्रुवीकरण में होने वाले प्राकृतिक उतार-चढ़ाव से परमाणुओं के स्पिन का पता लगाया जाता है और दो अतिरिक्त लेजर बीम्स परमाणुओं को समीपवर्ती स्पिन अवस्थाओं के बीच ले जाते हैं। इस तकनीक से सिग्नल लगभग दस लाख गुना तक बढ़ जाता है।

अत्यंत सूक्ष्म क्षेत्र में सटीक घनत्व मापन

मात्र 0.01 मिमी³ के क्षेत्र में, जहां लगभग 10,000 परमाणु होते हैं, स्थानीय घनत्व का सीधा मापन संभव हो जाता है। आरआरआई की टीम ने पोटैशियम परमाणुओं पर यह तकनीक आजमाई और पाया कि परमाणु समूह का केंद्रीय घनत्व एक सेकंड में स्थिर हो गया, जबकि फ्लोरेसेंस से कुल परमाणु संख्या मापने में लगभग दोगुना समय लगा।

गैर-आक्रामक और उच्च सटीकता वाली तकनीक

आरआरआई की शोध सहायक बर्नाडेट वरशा एफजे और भाग्यश्री दीपक बिदवाई ने बताया कि यह तकनीक गैर-आक्रामक है, क्योंकि इसमें प्रयुक्त प्रोब बीम कम शक्ति पर और दूर-डिट्यून पर काम करता है। इससे माइक्रोसेकंड स्तर पर भी कुछ प्रतिशत की सटीकता हासिल की जा सकती है।

क्वांटम सेंसिंग और कंप्यूटिंग के लिए नई राह

पीएचडी शोधार्थी सयारी ने कहा कि वास्तविक समय में गैर-विनाशकारी इमेजिंग विधियां क्वांटम सेंसिंग और कंप्यूटिंग के लिए बेहतरीन हैं। यह तकनीक सूक्ष्म घनत्व उतार-चढ़ाव को पकड़कर कई-बॉडी डायनेमिक्स को उजागर करती है और सैद्धांतिक मॉडलों को परखने में मदद करती है।

फ्लोरेसेंस इमेजिंग से तुलना में बेहतर परिणाम

टीम ने आरडीएसएनएस से प्राप्त स्थानीय घनत्व प्रोफाइल की तुलना फ्लोरेसेंस इमेज पर लागू इनवर्स एबेल ट्रांसफॉर्म से की और पाया कि दोनों में उल्लेखनीय समानता है। खास बात यह है कि जहां एबेल ट्रांसफॉर्म अक्षीय समरूपता पर निर्भर करता है, वहीं आरडीएसएनएस असममित या गतिशील परमाणु समूहों में भी कारगर है।

क्वांटम तकनीकों में व्यापक उपयोग की संभावना

इस खोज का व्यापक महत्व है। क्वांटम तकनीकों में तेज, सटीक और गैर-आक्रामक घनत्व मापन ग्रैविमीटर, मैग्नेटोमीटर और अन्य सेंसरों के लिए बेहद उपयोगी है। यह तकनीक माइक्रोन स्तर पर स्थानीय जांच की सुविधा देती है और प्रणाली को बिना बाधित किए घनत्व तरंगों, क्वांटम ट्रांसपोर्ट और अन्य घटनाओं का अध्ययन संभव बनाती है।

क्वांटम कंप्यूटिंग में क्रांतिकारी उपयोग

आरआरआई के क्वांटम मिक्सचर्स लैब के प्रमुख प्रो. सप्तऋषि चौधुरी ने कहा कि यह तकनीक न्यूट्रल एटम आधारित क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम सिमुलेशन और परिवहन घटनाओं के अध्ययन में व्यापक उपयोगी होगी।

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