तमिलनाडु: 31 साल बाद वापस मिली 110 करोड़ की मंदिर भूमि, कोर्ट ने कहा-निजी संपत्ति की तरह नहीं बेच सकते
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तमिलनाडु: 31 साल बाद वापस मिली 110 करोड़ की मंदिर भूमि, कोर्ट ने कहा-निजी संपत्ति की तरह नहीं बेच सकते

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मंदिर की भूमि को निजी संपत्ति की तरह बेचा नहीं जा सकता। इसे देवता और भक्तों के लाभ के लिए संरक्षित रखना आवश्यक है।

Written byLalit FularaLalit Fulara
Jan 8, 2026, 01:36 pm IST
inभारत

नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की 3.93 एकड़ भूमि की बिक्री को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि 1990 के दशक में हुई इस भूमि की बिक्री अवैध थी। मंदिर भूमि की इस बिक्री में कई खामियां थीं। इस भूमि की वर्तमान कीमत 110 करोड़ रुपये के करीब आंकी जा रही है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मंदिर की भूमि को निजी संपत्ति की तरह बेचा नहीं जा सकता। इसे देवता और भक्तों के लाभ के लिए संरक्षित रखना आवश्यक है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह भूमि मंदिर को वापस लौटाई जाए। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ करीब 31 साल से चल रहा विवाद समाप्त हो गया। आइए जानते हैं कि क्या था यह पूरा मामला और इस पर फैसला सुनाते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मंदिर भूमि मनमाने ढंग से बेची जाने वाली संपत्ति नहीं…
अदालत ने कहा कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग (HR&CE) के तहत काम करने वाले ट्रस्टी और अधिकारी मंदिर की संपत्ति के मालिक नहीं होते हैं। वे सिर्फ उसके संरक्षक होते हैं। अगर कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन किया गया हो तो बाद में सरकार के आदेश भी ऐसी अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकते। अदालत ने कहा कि मंदिर भूमि को विशेष कानूनी दर्जा प्राप्त है। इन्हें मनमाने ढंग से बेची जाने वाली व्यावसायिक संपत्ति नहीं माना जा सकता। ये धार्मिक संपत्तियां हैं जिन्हें कानून, परंपरा और सार्वजनिक विश्वास से संरक्षण मिला है। ऐसी भूमि बेचने का फैसला जरूरत, पारदर्शिता और मंदिर को स्पष्ट लाभ के सख्त परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।

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1990 में 10.17 लाख में बेच दी थी मंदिर भूमि, 90 मुस्लिम भी केस में पक्षकार
यह भूमि मंदिर की दान में दी गई संपत्तियों का हिस्सा थी। 1990 के शुरुआती वर्षों में मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी वी सुब्रमण्या अय्यर ने मंदिर की कुछ भूमि बेचने का फैसला लिया। बिक्री का तर्क दिया गया कि पैसा जमा कराया जाएगा और उसका ब्याज मंदिर के खर्चों के लिए इस्तेमाल होगा। ट्रस्टी द्वारा भूमि बेचने का फैसला लेने के बाद साल 1995 में एक सार्वजनिक नीलामी कराई गई। कागजों में यह प्रक्रिया नियमों के अनुसार दिखाई गई। जिसमें सबसे अधिक बोली लगाने वाला आर सुब्रमणियम निकले। जो मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी के भतीजे थे। जिसके बाद उन पर हितों के टकराव के आरोप लगने लगे।

उस समय यह मंदिर भूमि 10.17 लाख रुपए में बेच दी गई। मंदिर भूमि की बिक्री में कई प्रक्रियागत खामियां थीं। नियमों के अनुसार मंदिर की संपत्ति की नीलामी को अंतिम रूप देने से पहले भक्तों, किराएदारों और अन्य हितधारकों से आपत्तियां मांगी जानी चाहिए थीं। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। पहले इस भूमि की नीलामी कर दी गई और बाद आपत्तियां मांगी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नीलामी के बाद आपत्तियां बुलाना कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है। जिस कारण मंदिर भूमि की बिक्री प्रक्रिया को अवैध और कानून के खिलाफ माना गया। इस मामले में करीब 90 लोग मुस्लिम थे और इसमें कम से कम दो मस्जिदें भी शामिल थीं।

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मद्रास हाईकोर्ट ने कहा- मंदिर की भूमि मंदिर के पास रहेगी
अदालत ने कहा कि कोई भी कार्यपालिका या सरकारी प्राधिकारी न्यायालय के फैसले के ऊपर अपील की तरह काम नहीं कर सकता। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ट्रस्टियों को मंदिर की संपत्ति बेचने की खुली छूट नहीं है। मंदिर की जमीन धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए ट्रस्ट के रूप में रखी जाती है। इसलिए उसके प्रबंधन पर सख्त कानूनी नियंत्रण होता है। बिना किसी ठोस और अनिवार्य आवश्यकता के ऐसी संपत्ति को बेचना, जिससे उसका स्थायी नुकसान हो, ट्रस्ट की जिम्मेदारी का उल्लंघन माना जाएगा।

मामले के रिकॉर्ड से पता चलता है कि जिन लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था, वे वही थे जिन्होंने मूल बिक्री के बाद जमीन खरीदी थी या बाद में खरीद के जरिए कब्जे में आए थे। कार्यवाही में दर्ज नामों से यह भी सामने आया कि इनमें से अधिकांश लोग स्थानीय मुस्लिम समुदाय से थे और विवादित भूमि पर कम से कम दो मस्जिदें भी मौजूद थीं। जिन्हें भी मुकदमे में पक्षकार बनाया गया था। अदालत ने साफ कहा कि संबंधित भूमि मंदिर के पास ही बनी रहेगी। साथ ही उन सरकारी आदेशों को भी रद्द कर दिया जिनके माध्यम से अवैध लेन-देन को दोबारा जीवित करने की कोशिश की गई थी।

इस मंदिर भूमि को 1994 में गलत तरीके से बेचा गया था। 19 अगस्त 1992 को मंदिर के ट्रस्टियों ने  मंदिर की भूमि बेचने का प्रस्ताव पास किया। यह प्रस्ताव HR&CE विभाग के तहत मंदिर प्रशासन बोर्ड (TAB) को सौंपा गया। बोर्ड ने 21 जुलाई 1994 को नीलामी की अनुमति दी। नीलामी प्रक्रिया औपचारिक रूप से 23 अगस्त 1994 को शुरू की गई। मंदिर भूमि की इस बिक्री में कई खामियां थी। जिसे देखते हुए कोर्ट ने इसे बिक्री को अवैध करार दिया।

Topics: Tamil NaduMadras High Courttemple land
Lalit Fulara
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास' में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 12 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय. करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से हुई और उसके बाद ज़ी न्यूज़, न्यूज़18, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और इंडियाडॉटकॉम होते हुए वर्तमान में पांचजन्य डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. पत्रकारिता में एम.ए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से किया है. [Read more]
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