महमूद गजनवी का भारत पर क्रूर हमला: जयपाल से सोमनाथ तक, लूटपाट और नरसंहार की कहानी
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महमूद गजनवी का भारत पर क्रूर हमला: जयपाल से सोमनाथ तक, लूटपाट और नरसंहार की कहानी

वर्ष 997 में सबुक्तिगिन का निधन हो गया. मरने से पहले उसने अपने छोटे बेटे इस्माइल को उत्तराधिकारी नियुक्त किया. किन्तु उसके दूसरे बेटे महमूद ने इस्माइल को गृहयुद्ध में हराकर गद्दी पर कब्जा कर लिया. गजनी के सिंहासन पर बैठने के समय उसकी आयु 27 वर्ष की थी.

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
Jan 7, 2026, 02:58 pm IST
in भारत
सोमनाथ मंदिर

सोमनाथ मंदिर

वर्ष 997 में सबुक्तिगिन का निधन हो गया. मरने से पहले उसने अपने छोटे बेटे इस्माइल को उत्तराधिकारी नियुक्त किया. किन्तु उसके दूसरे बेटे महमूद ने इस्माइल को गृहयुद्ध में हराकर गद्दी पर कब्जा कर लिया. गजनी के सिंहासन पर बैठने के समय उसकी आयु 27 वर्ष की थी.

महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण

महमूद अत्यंत महत्वाकांक्षी था. कहा जाता है कि जब खलीफा ने उसके पास मान्यतापत्र भेजा तो उस समय महमूद ने प्रतिज्ञा की कि मैं हर साल भारत के काफिरों पर आक्रमण करूँगा. महमूद ने 1030 में अपनी मृत्यु तक उत्तर भारत भारत पर कई हमलें किये. इतिहासकारों के अनुसार महमूद को 17 बार भारत के राजाओं के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा. महमूद के इन हमलों में से भारत विशेषरूप से पंजाब में मुहम्मदन प्रभाव स्थापित किया कर दिया.

महमूद का क्रूर अभियान

महमूद के शुरूआती भारतीय अभियानों में सबसे महत्वपूर्ण उसका जयपाल के खिलाफ युद्ध था. 1000-01 में उसने पेशावर के निकट अपने डेरा डाल लिया. जयपाल ने बहादुरी के साथ उसका सामना किया लेकिन अंत में उसे पराजय मिली. मुस्लिम इतिहासकार अल-उत्बी इस युद्ध का वर्णन करते हुए लिखता है, “अभी दोपहर भी नहीं हुई थी कि मुसलामानों ने अल्लाह के शत्रु (जयपाल) के विरुद्ध बदला लिया और उसमें से 15,000 लोगों को काटकर जमीन पर कालीन की भांति बिछा दिया ताकि शिकारी जंगली जानवर और पक्षी उन्हें अपना भोजन बना ले. अल्लाह की कृपा से हमें लूट का इतना माल मिला है कि उसकी गिनती भी संभव नहीं है. इसमें अनगिनत पुरुष और महिलायें भी गुलाम के रूप में शामिल है.”

सोमनाथ मंदिर

इस युद्ध में महमूद ने जयपाल को बंदी बना लिया और उन्हें छोड़ने के बदले 50 हाथियों की मांग की. जयपाल के बेटे आनंदपाल ने उसकी इस मांग को पूरा कर अपने पिता को स्वतंत्र करवा लिया. इस पूरे घटनाक्रम से जयपाल को गहरा सदमा लगा और मुसलमान यानि एक मलेच्छ का स्पर्श होने के चलते उन्होंने दोबारा शासन चलाना नैतिक रूप से स्वीकार नहीं किया. अतः उन्होंने अपने केश कटवाकर स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया.

यह भी पढ़ें- नाथों के नाथ सोमनाथ: 17 आक्रमण सह कर भी जीवंत रही आस्था

आनंदपाल और उत्तराधिकारियों का महमूद से संघर्ष

जयपाल के बाद उनके बेटे आनंदपाल गद्दी पर बैठे. उधर महमूद ने भी पंजाब के आसपास के इलाकों पर धावा बोलकर उन्हें अपने अधीन कर लिया जिससे आनंदपाल के सामने पहले की अपेक्षा अधिक खतरा मंडराने लगा था.
आनंदपाल ने महमूद का कई वर्षों तक सामना किया. दोनों के बीच कई बार संघर्ष भी हुए. हमेशा की तरह महमूद लूटमार करके वापस गजनी लौट जाता था. आनंदपाल के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने कई वर्षों तक महमूद को पंजाब के सीमाओं से आगे बढ़ने नहीं दिया. मगर इन लगातार हमलों के बाद एक समय ऐसा आया कि यह हिन्दुशाही साम्राज्य संकुचित होने लगा और गजनी को पंजाब के आखिरी छोर यानि गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों तक जाने का रास्ता मिल गया.

इस अवधि में महमूद ने नगरकोट, भटिंडा और थानेश्वर में भयंकर उत्पात मचाया. उसने इतना धन लूटा कि उसे लादकर गजनी भेजने के लिए भी जानवर कम पड़ गए. जिस हिन्दू ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया उसे तलवार से मार डाला गया. थानेश्वर में एक प्रसिद्द चक्रस्वामी (संभवतः भगवान श्री कृष्ण) का मंदिर था. महमूद ने इस नगर को लूटा और भगवान चक्रस्वामी की मूर्ति को अपने साथ गजनी ले गया जिसे उसने एक सड़क के किनारे फेंक दिया.

थानेश्वर में नरसंहार और गजनी में बंदी बनाए गए लोग

अलउत्बी थानेश्वर के सन्दर्भ में लिखता है, “थानेश्वर के सरदार ने अल्लाह को स्वीकार नहीं किया. सुलतान की आज्ञा से गैर-मुसलमानों – हिन्दू और बौद्धों का रक्त इस प्रकार बहा कि नदी के पानी का रंग भी परिवर्तित हो गया. वह अब पीने योग्य भी नहीं बचा था. यदि रात्रि न हुई होती और प्राण बचाकर भागने वाले हिन्दुओं को पद चिह्न भी न गायब होते तो न जाने कितने लोगों का नरसंहार हो जाता.” थानेश्वर के इस नरसंहार पर एक अन्य मुस्लिम इतिहासकार फ़रिश्ता लिखता है, “महमूद की सेना, दो लाख लोगों को गजनी में बंदी बनाकर ले लायी. इसके कारण गजनी भी किसी भारतीय नगर की तरह लगने लगा था.

लूटपाट, नरसंहार, जबरन धर्मान्तरण

अपने भारत के खिलाफ लूटपाट, नरसंहार, जबरन धर्मान्तरण के इस अभियान में महमूद ने मथुरा और कन्नौज जैसे भारतीय वैभवशाली नगरों का इतिहास भी जमीन में मिला दिया. इस दौरान उसका अजमेर में चौहान, अन्हिलवाड़ (पश्चिम भारत) में चालुक्य, और कन्नौज के गहड़वार राजाओं से सामना भी हुआ.

महमूद का सोमनाथ पर हमला

महमूद ने सबसे विध्वंसकारी हमला कठियावाड़ स्थित सोमनाथ मंदिर पर किया. 17 अक्टूबर 1024 को वह एक विशाल सेना लेकर गजनी से निकला और 20 नवम्बर को मुल्तान पहुँच गया. आगे राजपूताना का विशाल मरुस्थल था इसलिए उसने सावधानी से काम लिया. अनेक पड़ाव और रुकते हुए वह 6 जनवरी 1926 को सोमनाथ मंदिर पर हमला करने करने पहुँच गया.

महमूद ने सबसे विध्वंसकारी हमला कठियावाड़ स्थित सोमनाथ मंदिर पर किया. 17 अक्टूबर 1024 को वह एक विशाल सेना लेकर गजनी से निकला और 20 नवम्बर को मुल्तान पहुँच गया. आगे राजपूताना का विशाल मरुस्थल था इसलिए उसने सावधानी से काम लिया. अनेक पड़ाव और रुकते हुए वह 6 जनवरी 1926 को सोमनाथ मंदिर पर हमला करने करने पहुँच गया.

सोमनाथ विजय और महमूद की वापसी

महमूद ने मूर्तियों को गलियों और मस्जिद की सीढियों पर डलवा दिया जिससे नमाज के लिए जाने वाले मुसलमान उन्हें अपने पैरों से रौंद सके. इस मूर्ति की गिनती संसार की महान आश्चर्यजनक वस्तुओं में की जाती थी. वह मंदिर के बीच में (गर्भगृह) में स्थित थी और नीचे अथवा ऊपर बिना किसी सहारे के टिकी हुई थी.

महमूद की इस जीत का ठीक से आनंद भी नहीं उठा सका और उसे जल्दी ही वहां से भागना पड़ गया. दरअसल, महमूद को एक हिन्दू राजा परम देव का खतरा था. महमूद काठियावाड में फंस गया था. एक तरफ राजा परम देव थे तो दूसरी तरफ समुद्र. हालाँकि, जैसे-तैसे महमूद 2 अप्रैल 1926 को गजनी पहुँच गया और उसके बाद उसने भारत के खिलाफ अपने लूटपाट के अभियान रोक दिए.

Topics: जय सोमनाथसोमनाथ मंदिरमहमूद गजनवीMahmud Ghaznavi invades Indiaclashes between JayapalaAnandpala and Mahmud Ghaznaviplunder of the Somnath Templeमहमूद का सोमनाथ पर हमला
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