काैन है अल्पसंख्यक!
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भारत में काैन है अल्पसंख्यक!

संविधान में अल्पसंख्यक की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। संविधान सभा ने संख्या के आधार पर मुसलमानों को विधायिका में आरक्षण का प्रस्ताव खारिज कर दिया, पर अनुच्छेद 29-30 में विशेष वर्गों को संस्कृति संरक्षण व शिक्षा संस्थान स्थापित करने का विशेषाधिकार दिया। लेकिन कांग्रेस सरकार ने तुष्टीकरण की राजनीति के तहत मुसलमानों को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया

Written byआशीष रायआशीष राय
Jan 6, 2026, 05:04 pm IST
inविश्लेषण

हाल ही में पाकिस्तान ने फिर दावा किया कि ‘भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले’ बढ़ रहे हैं। इसके बाद से बहस छिड़ गई है कि भारत में अल्पसंख्यक कौन हैं? अंग्रेजों की ‘फूट डालो, राज करो’ नीति के तहत मुस्लिम लीग की अलग देश की मांग पर 1947 में भारत का बंटवारा हुआ। माउंटबेटन योजना के तहत हिंदू-सिख बहुल भारत और मुस्लिम बहुल पाकिस्तान अलग-अलग देश बने। बंटवारे के बाद ऐसी परिस्थितियां बना दी गईं कि लाखों हिंदुओं-सिखों को पाकिस्तान से पलायन कर भारत आना पड़ा, जबकि मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था, पर बड़ी संख्या में मुसलमान यहीं रह गए। 1951 की जनगणना में भारत की कुल आबादी में मुसलमान 9.8 प्रतिशत थे, जो आज बढ़कर 14 प्रतिशत से अधिक हो गए हैं।

स्वतंत्रता के बाद भारत ने संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा गठित की, जिसमें सभी वर्गों-क्षेत्रों के विद्वान शामिल थे। संविधान सभा में अल्पसंख्यकों की परिभाषा पर गहन चर्चा हुई। सरदार पटेल की अध्यक्षता में बनी अल्पसंख्यक समिति ने 1948 में सुझाव दिया कि विधायिका में अल्पसंख्यकों के लिए 10 वर्ष तक कुछ सीटें आरक्षित हों। बंटवारे के समय अनुमान था कि अधिकांश मुसलमान पाकिस्तान जाएंगे, लेकिन अनुमान से कहीं अधिक मुसलमान भारत में रहे, जो कई हिस्सों में मजबूत स्थिति में थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए संविधान सभा में अल्पसंख्यकों पर आम सहमति नहीं बनी। अंततः 1949 में विधायिका में आरक्षण का प्रस्ताव खारिज हो गया और संविधान में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं की गई।

संविधान सभा संख्या के आधार पर अल्पसंख्यक के निर्धारण के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। तब सदस्यों में इस बात पर सहमति बनी कि स्वतंत्र भारत में ‘उत्पीड़ित वर्गों’ के उत्थान के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। व्यापक बहस के बाद पाया गया कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को विशेष सुविधाओं की आवश्यकता है। इसलिए सरकारी नौकरियों व विधायिका में एससी/एसटी के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। खास बात यह रही कि संविधान सभा ने मुसलमानों को पीड़ित समाज मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप, उत्पीड़ित समाज को ही अल्पसंख्यक मानकर संविधान में संबंधित प्रावधान जोड़े गए।

संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का कई बार प्रयोग होने के बावजूद इसकी स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। किसी समूह को अल्पसंख्यक मानने के लिए दो आवश्यक तत्व हैं। पहला, उसकी विशिष्ट पहचान हो, जो उसे बहुसंख्यक समुदाय से अलग करती हो। यह पहचान भाषा, लिपि या संस्कृति पर आधारित हो सकती है। यह विशिष्टता मात्र औपचारिक या सतही नहीं, बल्कि ठोस व ऐतिहासिक होनी चाहिए, जो समुदाय के सामूहिक जीवन, आचार-विचार व परंपराओं में परिलक्षित हो। दूसरा, संबंधित समुदाय विशेष क्षेत्र या इकाई में संख्यात्मक रूप से बहुसंख्यक से कम और कमजोर हो। दोनों तत्वों का समग्र विचार अनिवार्य है।

संविधान सभा ने जनजातीय क्षेत्रों में सुविधाओं की कमी देखते हुए उन्हें अल्पसंख्यक मानकर व्यापक चिंतन किया। इसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 29-30 जैसे प्रावधान जोड़े गए। अनुच्छेद 29 कहता है-भारत के किसी भाग के निवासियों को, जिनकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार है। यह केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं, बल्कि सभी नागरिकों पर लागू है। वहीं, अनुच्छेद 30 में कहा गया है कि पंथ और भाषा आधारित अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शिक्षा के लिए स्कूल-कॉलेज स्थापित और संचालित करने का अधिकार है। लेकिन 1956 में संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 350(अ) और (ब) जोड़े गए, जो केवल भाषाई अल्पसंख्यकों से संबंधित हैं।

1993 तक भारत में किसी समुदाय को विधिक रूप से अल्पसंख्यक घोषित नहीं किया गया था। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 में भी ‘अल्पसंख्यक’ की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत केंद्र सरकार को समुदायों को अल्पसंख्यक के रूप में अधिसूचित करने का अधिकार है। 17 मई, 1993 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने विशुद्ध राजनीतिक मंशा से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। फिर 23 अक्तूबर, 1993 को इस आयोग ने मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया। 27 जनवरी, 2014 को इसमें जैन समुदाय को शामिल किया गया। इस तरह 6 अल्पसंख्यकों की संख्या 6 हो गई। लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अल्पसंख्यक दर्जा देने के पीछे मानदंड क्या है?

1991 की जनगणना के अनुसार, भारत में मुसलमानों की जनसंख्या 10.1 करोड़ थी, जो कुल जनसंख्या का 12.6 प्रतिशत थी। यह समुदाय न तो संख्या की दृष्टि से पीड़ित था, न भाषाई-सांस्कृतिक रूप से हाशिए पर। फिर भी, तत्कालीन कांग्रेस सरकार का उद्देश्य मुसलमानों सहित कुछ समुदायों को राजनीतिक रूप से संतुष्ट करना और अपने घटते जनाधार को संभालना था। 1993 तक मुसलमान और मजबूत हो चुके थे, ऐसे में उन्हें अल्पसंख्यक श्रेणी में रखना विशुद्ध राजनीतिक फैसला था।

इस तरह, अल्पसंख्यक निर्धारण का अधिकार केंद्र में समेट कर राज्यों को कमतर किया गया, जो संघीय ढांचे के विपरीत है। वर्तमान में कई राज्यों में संख्या की दृष्टि से हिंदू अल्पसंख्यक हैं, जबकि कई राज्यों में ईसाई और मुस्लिम बहुसंख्यक। पिछड़ापन अल्पसंख्यक आधार हो सकता है, किंतु संख्या को आधार नहीं बनाया जा सकता। संविधान सभा का यही मत था। टी.एम.ए. पई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 30 के प्रयोजनों के लिए ‘अल्पसंख्यक’ की पहचान राज्य को इकाई मानकर की जानी चाहिए, न कि संपूर्ण राष्ट्र को। इसका अर्थ यह है कि कोई समुदाय एक राज्य में अल्पसंख्यक और दूसरे राज्य में बहुसंख्यक हो सकता है। इस सिद्धांत की पुनः पुष्टि बाल पाटिल बनाम भारत संघ (2005) में की गई। न्यायालय ने दोहराया कि पांथिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की पहचान राज्य-विशिष्ट होनी चाहिए। यह पहचान जनगणना जैसे वस्तुनिष्ठ आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए।

भारत की भौगोलिक-जनसांख्यिकीय विविधता के बावजूद एकरूप राष्ट्रीय मानक लागू किया गया। भारत एक संघीय देश है, क्योंकि संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। किसी विशेष अल्पसंख्यक समूह द्वारा झेली जाने वाली चुनौतियां राज्यों और क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होती हैं। वस्तुत: राज्य ही अपनी जनसंख्या की वास्तविक आवश्यकताओं और हितों का बेहतर आकलन कर सकते हैं। इसलिए अल्पसंख्यकों की पहचान और प्रमाणीकरण की शक्ति राज्य सरकारों के पास होनी चाहिए, ताकि क्षेत्रीय वास्तविकताओं का सही प्रतिबिंब उभर सके। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु और महाराष्ट ने यहूदी समुदाय को अपने स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा दिया है।

दरअसल, पाकिस्तान ने ‘अल्पसंख्यकों पर हमले’ का शिगूफा इसलिए छेड़ा है, ताकि बांग्लादेश में कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं पर लगातार हो रहे हमलों से ध्यान भटकाया जा सके। वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। हिंदू, ईसाई, सिख, अहमदी और पारसी जैसे समुदाय ईशनिंदा कानूनों, जबरन कन्वर्जन, हिंसा और भेदभाव के शिकार हैं। वहां राज्य-प्रायोजित कट्टरता बढ़ी है और अल्पसंख्यकों की न तो पुलिस में सुनवाई है और न ही उन्हें अदालत तक पहुंचने दिया जाता है। आलम यह है कि पाकिस्तान में हर वर्ष अल्पसंख्यक समुदाय की 12-25 वर्ष की लगभग 1,000 लड़कियों का जबरन कन्वर्जन, निकाह और अपहरण होता है। ईशनिंदा कानून के तहत मौत की सजा दी जाती है।

Topics: पारसीपाञ्चजन्य विशेषसांस्कृतिक संरक्षणसर्वोच्च न्यायालयअधिसूचितमुस्लिमउत्पीड़ित वर्गईसाईसंघीय ढांचाreservationसंवैधानिक अस्पष्टताआरक्षणराज्य बनाम राष्ट्रसिखबौद्धsc-st
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