परमहंस योगानंद आधुनिक विश्व के वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत के प्राचीनतम योग विज्ञान से अमेरिका और यूरोप के पश्चिमी समाज को लाभान्वित किया। उस दौर में जब हमारा भारत गुलामी की जंजीरों में बंधा हुआ था। बीसवीं सदी के इस महानतम वैश्विक योगी ने तीस वर्ष से अधिक समय तक अमेरिका और यूरोप में रह कर भारत की सनातन धर्म-संस्कृति की विजय पताका लहरायी थी। राष्ट्र की महानतम आध्यात्मिक विभूतियों में शुमार इस महामानव का जीवन और शिक्षाएं आज भी सभी धर्म-संस्कृतियों के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
जन्म और संन्यास दीक्षा
इस महामनीषी का जन्म 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में भगवती चरण घोष और ज्ञान प्रभा घोष की चौथी संतान के रूप में हुआ था। उनका बचपन का नाम मुकुंद घोष था। उनके माता-पिता मूलतः बंगाल के 24 परगना जिले के निवासी थे; किन्तु रेलवे विभाग में अधिकारी पद पर होने के कारण बालक मुकुंद के जन्म के समय वे गोरखपुर में तैनात थे। उनके माता पिता काशी के सिद्ध संत श्यामाचरण लाहिड़ी उर्फ लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे और उन्होंने उनसे श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ‘’क्रियायोग’’ की दीक्षा ली थी। जिसकी दीक्षा हिमालय की अमर विभूति महावतार बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय को दी थी और उन्हें आधुनिक मानव समाज को इस पुरातन क्रियायोग से अवगत कराने का निर्देश लाहिड़ी महाशय को दिया था।
‘’योगी कथामृत’’ में वर्णित विवरण के अनुसार बालक मुकुंद शैशवकाल से ही सत्यान्वेषी प्रवृत्ति के थे। वे पथ-प्रदर्शक की खोज में थे। तब महावतार बाबाजी के आदेश पर लाहिड़ी महाशय के शिष्य बंगाल स्थित श्रीरामपुर निवासी युक्तेश्वर गिरि ने मुकुंद को शिष्य रूप में स्वीकार किया। स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि ने किशोर मुकुंद को क्रियायोग की दीक्षा देकर नया नाम योगानंद दिया और ‘परमहंस’ की उपाधि दी थी।
क्रियायोग का तत्वदर्शन
महायोगी श्री श्री योगानन्द जी के मुताबिक क्रियायोग शरीर के स्नायुओं को शांत और शुद्ध कर, शरीर और मन को ऊर्जस्वित कर, श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करनेवाले प्राणायाम और ध्यान की वह तकनीक है जो मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार की स्थिति में पहुंचा देती है। इसकी साधना से साधक सेवा और सहयोग की ओर उन्मुख होता है और उसकी सोच सकारात्मक बनती है। उनके अनुसार द्वापर युग में पूर्णावतार श्रीकृष्ण ने शरणागत अर्जुन को ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग का ज्ञान देते समय सर्वप्रथम “क्रियायोग” की जानकारी दी थी। श्रीकृष्ण ने महासमर में उनको समझाया था, ”योगी को शरीर पर नियंत्रण करने वाले तपस्वियों, ज्ञान के पथ पर चलने वालों से भी अथवा कर्म के पथ पर चलने वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो!” ( ईश्वर-अर्जुन संवाद, श्रीमद्भगवद्गीता: 6:46) ।
श्रीकृष्ण ने ही अपने पूर्व अवतार में इस अविनाशी क्रियायोग की जानकारी वैवस्वत मनु को दी थी और मनु से यह विद्या भारतभूमि के महानतम सूर्यवंशी सम्राट मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वंशज महाराज इक्ष्वाकु तक और योगशास्त्र के महानतम विशेषज्ञ महर्षि पतंजलि तक पहुंची थी। महर्षि पतंजलि के अनुसार ‘’क्रियायोग’’ प्रणायाम के जरिए शारीरिक अनुशासन, मानसिक नियंत्रण और ॐ पर ध्यान केंद्रित करके श्वास व प्रश्वास के क्रम को तोड़कर मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। प्राचीन भारत में “क्रियायोग” काफी लोकप्रिय था लेकिन धीरे-धीरे इस विद्या के विशेषज्ञों की से गोपनीय रखने की नीतियों और लोगों की उदासीनता के चलते यह योग क्रिया धीरे धीरे विलुप्त होती गयी। कालांतर में परमहंस योगानंद ने अपने गुरु से प्राप्त इस अनुपम योग विद्या को देश दुनिया में लोकप्रिय बनाया।
क्रियायोग का वैश्विक प्रचार
योग के आनंद की सहज व्याख्या करते हुए योगानंद जी ने मानव समाज को बताया था कि प्रत्येक मानव की मूल इच्छा मानसिक शांति और सहज आनंद प्राप्त करने की होती है और परम सत्ता की अनुभूति का यह सहज आनंद ‘’क्रियायोग’’ की साधना से ही मिल सकता है। श्रीमद्भगवदगीता एवं पतंजलि के योगसूत्रों में वर्णित भारत की पुरातन योग सम्पदा से आधुनिक विश्व को लाभान्वित करने वाले महामनीषी परमहंस योगानन्द ने अपने अनुभवों से बताया कि गृहस्थ जीवन बिताते हुए भी आत्मा को परमात्मा से जोड़कर अखंड आनंद की प्राप्ति की जा सकती है। क्रियायोग की इस अद्भुत यौगिक साधना का प्रशिक्षण देकर उन्होंने बीसवीं सदी के प्रथमार्ध में, जब पूरब और पश्चिम में घोर असामंजस्य की स्थिति बनी हुई थी; तब दोनों के मध्य सामंजस्य बैठाया। उन्होंने तदयुग के अमरीकी व यूरोपीय समाज को सिखाया था कि ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ-साथ मनुष्य की अनियंत्रित होती इच्छाएं उसकी बेचैनी बढ़ाती चली जाती हैं। किन्तु ऐसे माहौल में भी सांसारिक सुख भोगते हुए शांति और परम आनंद की अनुभूति की जा सकती है। इसका एकमात्र उपाय है शरीर, मन और आत्मा के विज्ञान से परिचित होना। यह परिचय क्रियायोग से ही संभव है। क्रियायोग वह यौगिक पथ है जो किसी भी सत्यान्वेषी को आत्म-साक्षात्कार कराता है। आत्म-साक्षात्कार होने पर आत्मा और परमात्मा का विभेद मिट जाता है, मुनष्य परम सुख की प्राप्ति कर लेता है।
रांची में योग विद्यालय और योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना
अमेरिका जाने के तीन साल पहले 1917 में उन्होंने वर्तमान झारखंड की राजधानी रांची में योग विद्यालय और योगदा सत्संग सोसाइटी की स्थापना की। अमेरिका के लॉस एंजिलिस में उन्होंने सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की। इन्हीं दो संस्थाओं के माध्यम से पूरी दुनिया में क्रिया योगियों की लड़ी लग गयी। यह सुखद आश्चर्य की बात है कि स्थापना काल के सौ वर्षों बाद भी इन संस्थाओं की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है और वैसे ही क्रियायोगियों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी तथा अमेरिका में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप नाम की संस्थाएं स्थापित कीं। आज इन संस्थाओं से जुड़े देश-दुनिया के हजारों केद्रों में वही क्रियायोग सिखाया जाता है जिसे काशी के महान संत लाहिड़ी महाशय ने अपने गुरु महावतार बाबा जी से सीखा था।
बेस्ट सेलर बनी परमहंस योगानंद की जीवनी ‘’योगी कथामृत’’
और तो और परमहंस योगानंद द्वारा 1946 में पूरी की गई अपनी जीवनी ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ अ योगी’ (योगी कथामृत) आज की तारीख में 13 भारतीय भाषाओं और विश्व की 52 भाषाओं में अनूदित होकर बेस्ट सेलर आध्यात्मिक ग्रन्थ बन चुकी है। प्रकाशन के सात दशक बाद भी इस पुस्तक की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। 1999 में इसे शताब्दी की 100 सर्वोत्तम आध्यात्मिक पुस्तकों की सूची में शामिल किया गया था। इसके अलावा उनकी अन्य लोकप्रिय कृतियों में “द साइंस ऑफ़ रिलीजन”, “साइंटिफिक हीलिंग”, “कास्मिक चैट्स” तथा “एमेटाफिजिकल मेडिटेशंस” आदि हैं। परमहंस के जीवन पर आधारित “अवेक” नाम की एक फिल्म भी रिलीज हो चुकी है।













